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गिर पड़ना किसी पुराने प्यार में


जब आप वक़्त का टूटा हुआ आईना देखते हैं तब पाते हैं कि आपके माथे की सलवटों में तकलीफ़ों के निशान कम और उन नेक इन्सानों के नाम की लकीरें ज्यादा है। वे इंसान जो आपको बचा कर ज़िंदगी के इस मुकाम तक लाये हैं। मगर मुहब्बत और ऐसी ही दूसरी बरबादियों की लकीरों के पार जाकर वे नाम पढ़ने के लिए चाहिए एक उम्मीद की रोशनी।

वे मजे मजे के सात आठ दिन
गुच्छे में बंधे हुये फूल गुलाब के
किसी फोन के बहाने बार बार, सूरत चुपके से देख लेना चाँद की।

सुबह नंगे पाँव फर्श पर चलते हुये सुनना
रात की चादर में गुम, सब लड़ाइयाँ
कि फिर से गिर पड़ना किसी पुराने प्यार में।
* * *

ये दुनिया इसीलिए इतनी सुंदर है
कि इसके भीतर छिपे
रहस्यों को आप कभी जान नहीं पाते हैं।

मनुष्य का मन
राख़ के नीचे छिपा हुआ अघोरी का बदन है
जादू और भय से भरा हुआ।
* * *

प्रेम डरता रहता है,
एक रात की सुकून भरी नींद से
और सुबह आती है किसी खोये हुये ज़माने की
चादर के नीचे से निकल कर अजनबी की तरह।

मगर हम करते जाते हैं, प्रेम।
* * *

वह इतना स्ट्रेट फारवर्ड था
कि उसके तरीकों से क्रूरता की बू आती
हालांकि उसने सिर्फ ये तय कर रखा था
कि ज़िंदगी को फीलिंग्स के गारे से नहीं भर कर रखना चाहिए।

उसकी बार में मुझे खुद ही सर्व करना पड़ता था प्रेम
हालांकि वह भी था किसी कामगार की तलाश में
कि मुख्य दरवाज़े की हत्थी पर लटका हुआ था एक छोटा बोर्ड।

बीयर बार के लिए ज़रूरत है कुछ रूहों की
जो अदृश्य होते हुये भी बन सके बेहतरीन साकी।
और उनको चाहिए कि वे ऊंची फ्रिल वाली स्कर्ट पहने होने के बावजूद
मार्क्स के मजदूरों की तरह न उतर आए हड़ताल पर।

आवेदन करने से पहले
ईश्वर के लिए हमारी हालत के बारे में भी ज़रूर सोचिएगा
कि हमें नहीं चाहिए अपमान जैसी रोज़ रोज़ की ओछी शिकायतें।

जिस तरह अमेरिका सबका बाप है, उसी तरह ग्राहक हमारे लिए देवता है।
* * *
[तस्वीर सौजन्य : नवीन जाजुन्दा] 

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मैं कितना नादान था।

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नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

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* * *
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