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रेगिस्तान में रिफायनरी की आधारशिला

सुबह अच्छी हवा थी लेकिन बारह बजते ही उमस ने घेर लिया। पचपदरा के नमक के मैदानों पर तने हुये आसमान में हल्के बादल आने लगे। मैं सवेरे छह बजे घर से निकला था। रेत के मैदान से नमक भरी जगह पर आ गया था। विशिष्ट व्यक्तियों की सुरक्षा के लिए तैनात जांच दल और प्रवेश पास बनाने वाली एजेंसी के पास जाते ही मालूम हुआ कि हमारे पास जिला मुख्यालय पर पीआरओ के पास हैं। ये बेहद उदास करने वाली बात थी। तीन दिन पूर्व पास बनाने के लिए किए गए निवेदन के बावजूद वे समय पर मिल नहीं पाये। मैं कार में अनमना बैठा था कि इंतज़ार करने के सिवा दूजा कोई रास्ता न था। इस तरह के वीआईपी दौरों के समय कई तरह की असुविधाएं होती हैं इससे मैं वाकिफ हूँ। लेकिन लापरवाही भरे तरीके से प्रवेश पास का गैरजिम्मेदार लोगों के पास होना और समय पर पहुँचकर भी सभा स्थल पर रिकार्डिंग के लिए अपने उपस्करणों को स्थापित न कर पाना अफसोस की बात थी।

सुबह जब हमारी टीम वहाँ पहुंची तब तक सब खाली था। कुछ देर पहले लगाए गए होर्डिंग्स और बैनर रस्तों को नया लुक दे रहे थे। ज़्यादातर होर्डिंग अपने नेता के प्रति वफादारी या अपनी सक्रिय उपस्थिती दिखाये जाने के लिए लगे थे। मैं इन सब से बेपरवाह बैठा रहा। अचानक मैंने देखा कि कुरजां का एक झुंड ऊपर से गुज़रने लगा। ये दृश्य मनोहारी था। मैंने कुरजां को संबोधित लोकगीत अनगिनत बार सुना है। सुना कहना ठीक न होगा वरन ये लोकगीत रेगिस्तान के हर बाशिंदे के मन में रचा बसा है। किसी विरहन की आर्द्र पुकार है कुरजां ऐ म्हारों भंवर मिलाय दो। उनके सलेटी रंग के डेने हवा में तैर रहे थे। वे नीचे से कुछ कम सलेटी दिख रही थी, जैसे काली स्याही पर खूब सारा पानी गिर जाने से रंग हल्का होकर छितरा गया है। एक विशेष ज्यामिती में उनके उड़ने का सलीका सम्मोहन से भरा था। मेरी उदासी को इन प्रवासी पंछियों ने एक बार भुला दिया।

लोगों के काफिले आने लगे और मेरी बेचैनी बढ़ने लगी। दो घंटे के इंतज़ार के बाद जिला मुख्यालय से आए पत्रकार साथी के साथ हमारा प्रवेश पत्र भी आया। सुरक्षा के कई चक्रों के पार एचपीसीएल कंपनी के अधिकारी ने मीडिया को प्रवेश दिये जाने वाले गेट पर हमें रोक लिया। उन्होने कहा कि आप ये पास अपनी जेब में रखिए और लौट जाईए। हम आपको प्रवेश नहीं दे सकते हैं। मैंने पूछा कि क्या इसकी कोई वजह है। वे कहते हैं कि इतने सारे लोगों को बैठने की जगह नहीं है। मैं कहता हूँ कि हम आकाशवाणी से आए हैं और इस कार्यक्रम को रिकर्ड करना एक ऐतिहासिक काम है। वे कुछ नहीं सुनते। पुलिस वाले कहते हैं वापस जाईए। वहाँ न तो कोई स्थानीय प्रशासन का अधिकारी होता है और न ही कोई पुलिस का अधिकारी जिनसे ये निवेदन किया जा सके कि आकाशवाणी जनता का सरकारी माध्यम है और इस अवसर की रिकार्डिंग करना लोक प्रसारण का दायित्व है। मैं पीआरओ को फोन लगाता हूँ लेकिन सुबह दो बार नो आनस्वर हुआ फोन इस बार लगता ही नहीं है। जाने क्या सोच कर एचपीसीएल का हठी और दंभी अधिकारी मुझे कहता है- तुम अंदर चले जाओ।

एक बड़े भूभाग में तने हुये लोहे के विशाल तम्बू के नीचे लोग जुट रहे थे। बारह बजे तक कोई सत्तर अस्सी हज़ार के आस पास लोग थे। लेकिन असल कारवां का आना तभी शुरू हुआ था। भव्य मंच के आस पास सत्तासीन जनप्रतिनिधि बेचैन कदमों से जायजा ले रहे थे। समय आहिस्ता गुज़र रहा था और कोलाहल बढ़ता जा रहा था। मुझे खुशी थी कि सौंपे गए काम के आधे अधूरे पूरे हो जाने का जुगाड़ हो गया था। हमें वहाँ तक नहीं जाने दिया गया, जहां से पत्रकार ऑडियो का आउटपुट ले सकते थे। जन प्रसारण की बात अब पीछे छूट गयी थी। हमें जनता को सुनने के लिए लगे हुये स्पीकर्स से ही कुछ रिकर्ड करना था। अचानक एक हल्की फुहार आई। नमक के मैदान पर तैर रहे बादल बरसने लगे थे। एक हल्की घरघराहट की आवाज़ आई और बादलों के बीच एक सफ़ेद और केसरिया रंग का चॉपर उतरता हुआ दिखने लगा। हेलिकॉप्टर के रंग को देखकर मेरे चहरे पर हल्की मुस्कान आई। मैंने खुद को याद दिलाया कि इस उड़ने वाले यान से पक्का संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की अध्यक्ष सोनिया गांधी ही उतरने वाली हैं। वे बाड़मेर के पचपदरा में देश की एक बड़ी रिफायनरी और पेट्रो केमिकल कॉम्प्लेक्स के शिलान्यास का अनावरण करने आई थी। पेट्रोलियम मंत्री, राजस्थान के मुख्य मंत्री सहित कई ऊंचे नेता और मंत्री इस काफिले में शामिल थे। भाषणों के दौरान समय की कीमत रेखांकित थी। अपार जनसमूह में सबसे अधिक उत्सुकता सोनिया गांधी को देखने की थी।

केंद्र की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार की जन कल्याणकारी योजनाओं के बारे में बात करने से पहले मुख्य वक्ता ने इस रिफायनरी से होने वाले विकास के बारे में लंबी बात की। और आधे भाषण के बाद वही बात आई कि आज़ादी के इतने बरसों बाद भी जो सपना हमने देखा था वह अभी अधूरा है। लेकिन इस उद्बोधन में पुनः विश्वास दिलाया गया कि ये काम हम ज़रूर पूरा करेंगे। नेता और जन प्रतिनिधियों का काम डेढ़ घंटे में पूरा हो गया। केसरिया पीठ वाला चॉपर फिर से हवा में उड़ गया। भीड़ अपने घरों की ओर लौटने लगी। मैंने सोचा कि जिन अधिकारियों के कारण आकाशवाणी की रिकार्डिंग टीम को बेशुमार व्यवधान उठाने पड़े उनके बारे में उचित जगह पर एक शिकायत दर्ज़ करवाऊँगा लेकिन मैं भी लगभग भारतीय ही हूँ। मैंने दो दिन बाद इस तकलीफ को भुला दिया। हम सब अपनी मुश्किलों को कुछ ही देर याद रख पाते हैं और अक्सर हालत को बेहतर बनाने के लिए अपना योगदान देने की जगह खुद को हालत के अनुकूल ढालते हुये चुप रहना पसंद करते हैं। लौटते समय भी मुझे बहुत सारे प्रवासी पक्षी दिखे। उनका कलरव भेड़ों की आवाज़ों से अलग एक समूह गान सा प्रतीत हो रहा था। मैंने खुद को यकीन दिलाया कि एक दिन हम भी समूह स्वर में कोई गान गाते हुये जाग जाने का अहसास कर सकेंगे।

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
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नष्ट होती चीज़ों के प्रति

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मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…