कोई चरवाहा भी न रखे

लोग पड़े हैं जाने कहाँ और जाने कहा अपने दिलों को छोड़ आये हैं.
समझते हैं खुद को दिल के बादशाह और सोचो तो ऐसे लोगों को कोई चरवाहा भी न रखे.
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अनजाने अँधेरे की गिरहों से बेढब, बेहोशियारी की बातें करके रात कहीं चली गयी है. पुल नीचे, एक पिलर के पास उसका बोरिया समेट कर रखा हुआ है.

पुरानी ज़िंदगी की कलाई में फिर एक नया दिन है, रात की तलाश में निकला हुआ.
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जिनको जीवन ने अस्वीकार कर दिया था हमारे हाथ के उन चार दानों को मृत्यु कैसे स्वीकार कर सकती है. इसलिए तुम दुनिया में कहीं भी रहो, मैं तुम्हारे पीछे हूँ.
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पहाड़ो में रहने वाले चूहों से अलग हैं रेतीले मैदानो के चूहे, बाज़ की चोंच मगर असफल है उनके स्वाद को अलग अलग परख पाने में.
मैं कैसे भी भूगोल पर चला जाऊं एक याद बीनने लगती है, मेरा रेशा रेशा.
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कुछ दिन पहले उन्होंने ईश्वर के बारे में कुछ पता करने को सदी का भयानकतम प्रयोग किया था. कुछ दिन बाद एक नन्हीं लड़की रेल में सफ़र कर रही थी.
कुछ दिन बाद नहीं, ठीक उसी दिन कवि ने कविता लिखी.
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धूप ने दीवारों को साये खिड़कियों को रौशनी के फाहे बख्शे हैं. हवा में बर्फ की खुशबू है.
एक उसका नाम न हो तो तन्हाई कुछ नहीं होती.
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हमने तो आवाज़ों को फूलों की गंध में पिरोया
प्रेम का दरवाज़ा बनाया जो खुलता हो उदासी के आँगन में
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स्वप्न, प्रेम की धूसर परछाई है.

सोते हुए बच्चे की बंद आँखों के नीचे होठों पर मचल कर बिखर जाती खुशी की तरह. जवान होने की बारीक रेखा के आस पास किसी सीढ़ी से पैर चूक जाने पर नींद में ही औचक संभल जाने की तरह.

सीवान, सिलीगुड़ी, कोलकाता, कानपुर, बाड़मेर जैसे किसी शहर की यात्रा पर गए बिना ही उस शहर के रास्तों की यात्रा पर होना प्रेम है.

प्रेम, खुशी और भय से भरा हुआ स्वप्न है.
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स्मृति एक पारदर्शी आईना है. विगत को आगत के बीच उकेरता है.
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कच्ची धूप उस जानिब पांवों से लिपटी पड़ी है, इस तरफ रेगिस्तान में, मगर सर पर खड़ी है.
हम ही नहीं, मौसम का हाल भी है जुदा जुदा.
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