Skip to main content

सबसे छोटी दोपहर

जिस वक्त उदघोषकों की कांफ्रेंस में कागज़ के प्यालों में ठंडी हो चुकी चाय थी। ठीक उसी वक़्त सबसे पिछली कतार में बैठे एक शायर को महबूब के गरम-गरम बुलावे आ रहे थे।

उसकी आवाज़ से लगता था कि इंतज़ार में एक पींपा बीयर पी जा चुकी होगी। ये सच ही था कि उससे होटल का नाम ही भूल गया था। होटल के उस कमरे तक जाने को जब हम निकले तब जयपुर पर अप्रेल की कड़ी धूप थी। ऐसी ही धूप उस बरस भी थी। जिस बरस अम्बर टॉवर से एमआई रोड की ओर एक लड़की को थके कदम जाते हुए देखा था।

उस होटल के रास्ते मे एक ऑटो वाले ने पूछा- सर वुड यू... हमने उसकी बात को नज़र अंदाज़ कर दिया।

होटल के कमरे की एक कुर्सी में फंसा महबूब उठ सकने के हाल में न था। इसलिए उसने आंखे और हाथ उठाकर आह्वान किया। आओ प्यारे इस ज़िन्दगी को मार गिराएं।

मैं अचानक चौंक उठा कि मेरी ज्यादातर महबूबाओं के नाम आर अक्षर से शुरू होते हैं और ये भी कैसी बात ठहरी कि उस कमरे में जो दो लोग थे। उनके नाम राजू याग्निक और राजेश चड्ढा थे।

उस कमरे में बीयर की इतनी बोतलें थी कि हर हरकत पर वे आपस मे टकराने लगतीं। टकराने पर ऐसी आवाज़ आती। जैसी शायर हरमन के कहे किसी शेर में, दिल मे आती थी।

रेगिस्तान की कुख्यात लम्बी दोपहरों में ये सबसे छोटी दोपहर थी।
***

कल उसने मुझे कहा।

सफेद कुर्ता पहने तुम
विश्व पुस्तक मेला दो हज़ार सोलह में
उस लड़की को चूम रहे थे बेहिसाब।

हरा कुर्ता पहने तुम
उसी बरस के अक्टूबर माह में
हो गए थे सर्वांग नग्न।

नीला कुर्ता पहने तुम
मेरे साथ सोये रहते थे हर तीन महीने बाद।

मैं अपना कुर्ता उतारने के लिए
नहीं कर रही हूं दोबारा बात
मैं वह सब नहीं चाहती हूं अब तुमसे।
तुम ऐसा कुछ मत समझना।

घर लौटते हुए अचानक मुझे ख़याल आया है
कि बैग बेहद हल्का हो गया है
मेरे सब कुर्ते शायद उन औरतों ने पहन लिए हैं
जिनको अक्सर मुझसे कोई लज्जा न थी।

सफ़र हालांकि कोई भी आसान न था मगर
आज का सफ़र बड़ा खराब है
रेल की खिड़की से धूल उड़ उड़कर आ रही है
मेरी आंखों में गिरने को।

कि रेगिस्तान की धूल जानती है
साल भर से रोया नहीं हूँ मैं
साल भर से मैंने थूका भी नहीं है किसी के नाम पर
* * *

Popular posts from this blog

चुड़ैल तू ही सहारा है

रेगिस्तान में चुड़ैलों के कहर का मौसम है. वे चुपके से आती हैं. औरतों की चोटी काट देती हैं. इसके बाद पेट या हाथ पर त्रिशूल जैसा ज़ख्म बनाती हैं और गायब हो जाती हैं.
सिलसिला कुछ महीने भर पहले आरम्भ हुआ है. बीकानेर के नोखा के पास एक गाँव में चोटी काटने की घटना हुई. राष्ट्रीय स्तर के एक टीवी चैनल ने इस घटना को कवर किया. पीड़ित और परिवार वालों के इंटरव्यू रिकॉर्ड किये. कटी हुई चोटी दिखाई. बदन पर बनाया गया निशान दिखाया. गाँव के बाशिंदों की प्रतिक्रिया दर्ज की. पुलिस वालों के मत लिए. इसके बाद इसे एक कोरा अंध विश्वास कहा. घटना के असत्य होने का लेबल लगाया. टीवी पर आधा घंटे का मनोरंजन करने के बाद इस तरह सोशल मिडिया के जरिये फैल रही अफवाह को ध्वस्त कर दिया.
इसके बाद इस तरह की घटनाओं का सिलसिला चल पड़ा. बीकानेर के बाद जोधपुर जिले की कुछ तहसीलों में घटनाएँ हुईं. जोधपुर से ये सिलसिला बाड़मेर तक आ पहुंचा. सभी जगहों पर एक साथ पांच-सात स्त्रियों के साथ ऐसी घटनाएँ हुईं. उनकी कटी हुई चोटी का साइज़ और काटने का तरीका एक सा सामने आया. शरीर पर बनने वाले निशानों की साइज़ अलग थी मगर पैटर्न एक ही था.
बाड़मेर के महाबा…

मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।