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वो जाने क्या शै थी?



छतरी के जैसे खिले हुए दो फूल याद आते रहे.

रात चाँद था. खुली छत पर गरम मौसम की सर्द हवा थी. बदन की हरारत पत्थरों की तरह टूटती रही. भारीपन और बेअसर करवटें. दवा नाकाम. जाग में नींद का इंतज़ार. इंतज़ार में कुछ करने की चाह. इस चाह में कुछ न कर पाने की बेबसी. जैसे किसी योद्धा का का गर्व चूर होता है. सब कुछ ठोकरों पर रखे हुए. जीवन के उड़नखटोले पर बेखयाली में गुजरते दिनों पर कोई प्रेत का साया गिरा. मन एक भीगा हुआ फाहा होकर सब उड़ना भूल गया.

क्यों और अच्छा लगता जाता है आपको?

फिर इसी सवाल पर बहाने बनाते हुए. झूठी दलीलें देते हुए. सोचना- "तुम कह क्यों नहीं देते कि कई बार वहीँ होने का मन होता है. जहाँ छुअन एक सम्मोहन से परे बड़ी ज़रूरत हो." इधर आ जाओ. ये सुनकर मैं कहता हूँ- "आज मैं खुद मुझे अच्छा नहीं लग रहा" सुबह से बिस्तर पर पड़े हुए कभी सीधे कभी औंधे लेटे हुए. ये देखते हुए कि क्या बजा है. ये सोचकर हताश होते हए कि समय रुक गया है.

बहुत दूर कहीं. किसी जगह जहाँ गायों के गले में बंधी घंटियों का हल्का स्वर सुनाई देता है. जहाँ शाम ढले एक अलाव हर मौसम में जलाता है. जैसे असमाप्य बिछोह की अमरजोत जलती हो. उसी बहुत दूर की जगह के बारे में ख़याल आता है. क्या सचमुच हम कभी ये सोचते हैं कि ज़िन्दगी में क्या कुछ कहाँ रखा है. क्या हम दूरियां देखते हैं? क्या हम समय के लम्बे रास्ते पर कोई ऐसा विश्राम स्थल सोचते हैं जहाँ दूरियां एक बार के लिए मिट जाती हों. शायद नहीं. 

रेगिस्तान के वीराने में हवा गाती रहती है एक गीत तुम्हारे आने तक.

बादलों की छतरी तले
सोने जैसी रेत पर
खिल उठता है बैंगनी फूल.

जैसे
एक रात का मुसाफिर
सोया न हो रात भर.

हल्का उजास होने को होता है. मुरकियों और गिरहों से भरे शब्द समझ नहीं आते. एक ही पंक्ति सुनकर उसी के साथ आँख मूंदे देखना कि रौशनी बढती जा रही है. गली में आवाज़ें तेज़ हो रही हैं. मैं उठकर बाहर जाता हूँ. बालकनी से देखता हूँ कि सामने के घर का एक बच्चा दरवाज़े के आगे बनी सीढी पर बैठा है. वह बुद्ध की तरह शांत है. रात पीछे छूट गए जीवन से बेख़बर जाने क्या सोचता है.

मैं तेज़ी से घर के सब काम करता हूँ. आभा मंडी से बहुत सी सब्जियां ले आये तब तक सब गर्द पौंछ दूँ. घर की चीज़ें करीने से रख दूँ. वे चीज़ें जो पिछले तीन दिन में बिखर गयी थीं. पीठ में अचानक एक सेंटीपीड रेंगता है. मैं रुक कर उसे महसूस करता हूँ और अगले काम पर लग जाता हूँ.

क्यों किया है इतना सारा काम?

इसलिए कि प्रेम केवल बाँहों में भर लेने को नहीं कहते हैं.

एक गीत अचानक जाने किस वजह से याद आया, मैं समझ नहीं पाता हूँ. तेईस साल की उम्र में जब रेडियो की नौकरी करने लगा था तब इसे ख़ूब प्ले किया करता था. आज सोचा है कि इसे फिर से खोजूंगा. एक छोटे से रेडियो स्टेशन पर गीत कम होते हैं मगर वे इतने होते हैं कि आप जी भरके प्रेम में डूबे रह सकते हैं.

गुंचे लगे हैं कहने, फूलों से भी सुना है, तराना प्यार का... 
* * *

[Doodle courtesy : http://weeklydoodles.blogspot.in]

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नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

मन में छुपे बुलावे

टूटे पंख की तरह  कभी दाएं, कभी बाएं  कि कभी हवा में तैरता मन। 
आँखें पास की दीवार, छत, पेचदार सड़क या खुले आसमान की ओर रह जाती है जबकि मन चुपके से कहीं दूर निकल जाता है। मैं उसी जगह बैठा हुआ पाता हूँ कि खोया हुआ मन जहां गया है, वह कोई चाहना नहीं है। मन का जाना ऐसा है जैसे वह निरुद्देश्य भटक रहा है। 
मैं उसे पकड़कर अपने पास लाता हूँ। उसी जगह जहां मैं बैठा हूँ। वह लौटते ही मुझे उकसाता है। अब क्या करें? मैं भी सोचता हूँ कि क्या करें? कुछ ऐसा कि नींद आ जाए। थकान आँखें बुझा दे। कोई मादक छुअन ढक ले। कोई नशा बिछ जाए। ये सब हो तो कुछ ऐसा हो कि जागने पर नींद से पहले का जीवन भूल सकें। 
यही सोचते, मन फिर बहुत दूर निकल जाता है। * * *
पर्दा हल्के से उड़ता है  जैसे कोई याद आई और झांककर चली गयी। 
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कभी-कभी हम इस चाहना से शीघ्र मुक्त हो जाते हैं और कभी हम सोचने लगते हैं कि किस तरह उसे बुला लिया जाए और साथ ही ये भी न लगे कि हमने बुलाया ह…

सपने में गश्त पर प्रेम

होता तो कितना अच्छा होता कि हम रेगिस्तान को बुगची में भरकर अपने साथ बड़े शहर तक ले जा पाते पर ये भी अच्छा है कि ऐसा नहीं हुआ वरना घर लौटने की चाह खत्म हो जाती. 
अक्सर मैं सोचने लगता हूँ कि
क्या इस बात पर विश्वास कर लूँ?

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* * *

मैं बहुत देर तक सोचकर
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कैसे उग आई उस पर शाखाएं
कैसे खिले दो बार फूल
कैसे वह सूख गया अचानक?
* * *

कभी मुझे लगता है
कि मैं एक प्रेम का बिरवा हूँ
जो पेड़ होता जा रहा है.

कभी लगता है
कि मैं लकड़हारा हूँ और पेड़ गिरा रहा हूँ.
मुझे ऐसा क्यों नहीं लगता?

कि मैं एक वनबिलाव हूँ
और पाँव लटकाए, पेड़ की शाख पर सो रहा हूँ.
* * *

प्रेम एक फूल ही क्यों हुआ?
कोमल, हल्का, नम, भीना और मादक.

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* * *

जब हम बीज बोते हैं
तब एक बड़े पेड़ की कल्पना करते हैं.

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* * *

प्रेम
उदास रातों में तनहा भटकता
एक काला बिलौटा है.

उसका स्वप्न एक पेड़ है
घनी पत्तियों से लदा, चुप खड़ा हुआ.

जैसे कोई मह…