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करने से होने वाली चीज़ें

कोई पल जो बेहद भारी लगता है, वह कुछ समय के बाद एक गुज़री हुई बात भर रह जाता है. 

रात की हवा में शीतलता थी. दिन गरम था. साँझ के झुटपुटे में मौसम जाने किससे गले मिला कि सब तपिश जाती रही. हवा झूलने की तरह झूल रही थी. रह-रहकर एक झोंका लगता. आसमान साफ़. तारे मद्धम. कोलाहल गुम. रात का परिंदा आसमान की नदी में बहता जाता है. इसी सब के बीच आँखें अबोध सी शांत ठिठकी हुई. 

बदन के रोयों पर शीतल हवा की छुअन से लगता कि हरारत भर नहीं तपिश भी है. जिसे बहुत सारी शीतलता चाहिए. नींद की लहरें आँखों को छूने लगतीं. धीमे से सब बुझ जाता. 

एक बेकरारी की मरोड़ जागती है. करवट दर करवट. रात की घड़ी से एक हिस्सा गिरा. दूसरी करवट के बाद दूसरा. तीसरी करवट के समय अचानक उठ बैठना. सोचना कि हुआ क्या है? क्यों नींद ठिठकी खड़ी है. किसलिए बदन करवटें लेता जा रहा है. समय का पहिया आगे नहीं बढ़ता. 

बिस्तर ठंडा जान पड़ता है. हाथ सूती कपडे से छूते हैं तो सुहाना लगता है. बुखार अपने चरम पर आता. जहाँ सबकुछ एक सामान तपिश से भर जाता है. दवा लेकर आँख बंद किये सोचता हूँ. होठ गुलाबी हो गए हैं. कच्चे, एकदम कच्चे. वे जगह जगह से फट गए हैं. जैसे किसी ने नन्हे बच्चे के होठों को बार-बार काट खाया हो. जीभ घुमाता हूँ. होठों पर पपड़ियाँ उभर आई हैं. होठों में दर्द भी है. अचानक बुखार में अध दिमाग बहक गया है. गुलाबी होठ भूलकर दूर तक एक गुलाबी रंग देखने लगता हूँ. जैसे किसी ने बेहद कच्चे गुलाबी रंग के खेत उगाये हैं. मैं उनके भीतर जाने के ख़याल भर से डर जाता हूँ. कि ये गुलाबी खेत भी मेरे होठों की तरह नाज़ुक और कटे-फटे हो गए होंगे. इनको छूते ही दर्द की कच्ची सी लहर उठेगी. 

नींद खुलती है तो पाता हूँ कि पसीने ने मुझे भिगो दिया है. एक लाल रंग का टी पहने हुए हूँ. इसे कई महीनों तक बचाए हुए रखा था. इसलिए कि बेहद प्यारा था. फिर इसे जाने कब से घर में पहनना शुरू कर दिया याद नहीं. वही टी इस तरह भीग चुका था जैसे पानी की बाल्टी से निकाला है. जरा घबराया हुआ ज़रा चौंक से भरा समझता हूँ कि दवा लेते ही मुझे गहरी नींद आ गयी थी. इसी नींद में पसीना हुआ है. बिस्तर भीग गया है. बड़ा पलंग है इसलिए भीगी जगह से दूर सरक कर फिर से सो जाता हूँ. 

बुखार की चौथी रात है. इसकी सुबह होने वाली है.
मैं अकसर नहीं समझ पाता हूँ कि मन कहाँ गया है? ये क्यों नहीं लिखना चाहता? इसे क्या ऐसा चाहिए कि लिखने की गत पकडे. किसी से दिल लगा लो. कोई नशा कर लो. कोई तलब जगा लो. मगर करने से होने वाली चीज़ें ज्यादा बेअसर ठहरती हैं. इसलिए इस शांति को भोगो. कुछ न करने को जीयो. जीवन यूं भी जा ही रहा है. 

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चुड़ैल तू ही सहारा है

रेगिस्तान में चुड़ैलों के कहर का मौसम है. वे चुपके से आती हैं. औरतों की चोटी काट देती हैं. इसके बाद पेट या हाथ पर त्रिशूल जैसा ज़ख्म बनाती हैं और गायब हो जाती हैं.
सिलसिला कुछ महीने भर पहले आरम्भ हुआ है. बीकानेर के नोखा के पास एक गाँव में चोटी काटने की घटना हुई. राष्ट्रीय स्तर के एक टीवी चैनल ने इस घटना को कवर किया. पीड़ित और परिवार वालों के इंटरव्यू रिकॉर्ड किये. कटी हुई चोटी दिखाई. बदन पर बनाया गया निशान दिखाया. गाँव के बाशिंदों की प्रतिक्रिया दर्ज की. पुलिस वालों के मत लिए. इसके बाद इसे एक कोरा अंध विश्वास कहा. घटना के असत्य होने का लेबल लगाया. टीवी पर आधा घंटे का मनोरंजन करने के बाद इस तरह सोशल मिडिया के जरिये फैल रही अफवाह को ध्वस्त कर दिया.
इसके बाद इस तरह की घटनाओं का सिलसिला चल पड़ा. बीकानेर के बाद जोधपुर जिले की कुछ तहसीलों में घटनाएँ हुईं. जोधपुर से ये सिलसिला बाड़मेर तक आ पहुंचा. सभी जगहों पर एक साथ पांच-सात स्त्रियों के साथ ऐसी घटनाएँ हुईं. उनकी कटी हुई चोटी का साइज़ और काटने का तरीका एक सा सामने आया. शरीर पर बनने वाले निशानों की साइज़ अलग थी मगर पैटर्न एक ही था.
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मैं कितना नादान था।

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पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
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उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
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मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।