March 31, 2010

एक लम्हे के बाद

कुम्हार के चाक सी नहीं होती है ज़िन्दगी कि सब कुछ उपयोगी और सुन्दर बनाते हुए ठीक वहीं आकर चक्का रुक जाये जहाँ से शुरू हुआ था. इससे से तो हर पल कुछ छीजता जाता है, किसी अल्पव्यय हानि की तरह जिसकी भरपाई कभी संभव नहीं होती. मैं सुबह घर से निकला हुआ शाम होते ही दिन पर फतह हासिल करने के जश्न को किसी के साथ नहीं बांटता क्योंकि जिस तरह से इन दिनों मैं ज़िन्दगी को देखता हूँ. उसे मनो चिकित्सक नकारात्मक समझते हैं. हिसाब इसका भी कुछ खास नहीं है कि जो सकारात्मक माने जाते हैं वे आधी रात को नींद आने से पहले क्या सोचते होंगे ?

रात को एक पुराने दोस्त और सहकर्मी मेरे साथ थे. हमने 'ज़िन', आलू चिप्स, खीरा और नीम्बू के साथ बीत चुके दिनों की जुगाली की. जो मालूमात हुई वह भी ख़ास उत्तेजित नहीं करती है कि हम जब पहली बार मिले थे तब से अब तक अपने सत्रह साल खो चुके हैं. घर लौटा तो हवा तेज थी. घर का पिछवाडा जिसे मैं बैकयार्ड कहता हूँ वहीं परिवार सोया करता है. दीवार के सहारे लकड़ी के बड़े भारी पार्टीशन खड़े किये हुए हैं. रात तीन बजे आस पास उनमे से एक पार्टीशन हवा के तेज झोंके के साथ जमींदोज हो गया. उसके नीचे कोई सो नहीं रहा था इसलिए राहत रही मगर बाद की रात इसी सोच में बीती कि मेरी कल सुबह का मंजर क्या हो सकता था ? हवा केउस एक झोंके बाद का एक पल मेरे लिए ज़िन्दगी भर भारी हो सकता था, बुतों में यकीन नहीं है तो सोचता हूँकिसका शुक्रिया अदा करूँ ?

सुबह का जायका वाकई स्वादिष्ट नहीं था. पार्टीशन को तरतीब से रख कर बाँधने के काम के दौरान बाएं हाथ की पहली अंगुली का मुंह काला हो गया. चोट से एक बार का मैं परेशां हो गया कि आखिर ये सिलसिला क्या है ? मेरी समझ कई बार नहीं वरन अक्सर जवाब दे जाती है कि चीजें ठीक क्यों नहीं है ? एक वजह हो सकती है कि मैं इन दिनों शायद अवचेतन में जी रहा हूँ. वजहें सोचने को आज की शाम तय है.

मुश्किलें और भी हैं मगर राहतें नहीं. नसीम देहलवी के शागिर्द सैय्यद फज़ल उल हसन जिनको हसरत मोहानी के नाम से जानते हैं आज उन्हीं का एक शेर नए हौसले के लिए

दर्द मोहताज़ - ए- दवा हो ये सितम भी है या रब
जब दिया था तो कुछ इससे भी सवा देना था

उसकी आमद का ख़याल

शाम और रात के बीच एक छोटा सा समय आता है। उस समय एक अविश्वसनीय चुप्पी होती है। मुझे कई बार लगता है कि मालखाने के दो पहरेदार अपनी ड्यूटी क...