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साया दीवार पे मेरा था, सदा किसकी थी ?

उस ऐसी डिब्बे में मेरे पास रात गुजार देने के अलावा एक ही काम था, बीते हुए दो सालों को याद करना. हम बस ऐसे ही मिले थे और घंटों बातें करते रहते थे. सुबहें अक्सर अख़बारों के बारे में बात करते हुए खिला करती थी, यदाकदा इसमें अपने बिछड़े हुए प्रियजनों की सीली स्मृतियों की बरसातें हुआ करती थी. मैंने लिखना बरसों पहले छोड़ दिया था. इसकी वजहें गैर मामूली थी जैसे मुझे उस समय के छपने वालों से सख्त नफ़रत थी. वे निहायत दोयम दर्ज़े के लेखक थे. उनका व्यक्तित्व चापलूसी, घटियापन, लफ्फाजी से बना हुआ था. ऐसे लोगों के साथ अपना नाम देखने से बेहतर था कि फुटपाथ पर उबले हुए अंडे बेचने वाले के ठेले के पीछे खाली छूट गई जगह पर रखी बेंच पर बैठ कर एक पव्वा पी लेना. न लिखने की एक और भी खास वजह थी कि दुनिया के हर कोने में बेहद सुंदर कहानियां मौजूद थी.

रेल कोच के भीगे से मौसम में रूखे और बेढब देहयष्टि वाले सह यात्रियों में किसी भी तरह का आकर्षण नहीं था. मेरी उत्सुकता और स्मृतियां ही निरंतर साथ देती रही. मैं कई सालों के बाद इस तरह अकेला सफ़र पर था. रेगिस्तान के एक छोटे क़स्बे में रेडियो पर बोलते हुए, कहानियां पढ़ते और शराब पीते हुए बच्चों को बाँहों में भरते और जया के साथ खट्टे मीठे पल बिताते हुए जीवन की बैल गाड़ी चल रही थी लेकिन मेरी ऊंट जैसी ऊँची गर्दन के ऊपर वाले खाने में कुछ कुलबुलाता रहता था. ये जब हद से अधिक बढ़ जाता तो मैं मनो चिकित्सक से परामर्श ले रहा होता कि मरने का भय कितना बड़ा फोबिया हैं ? डॉ रांका हंसते हुए कहते शाम को दो पैग लेकर सो जाया करो. मैं फिर उन्हें कहता कि मैं सीरियस हूँ तो वे कोई सेडेटिव लिखते. मैं उसे कई दिनों तक लेता और फिर मेरी चिंताएं छंट जाती.

रेल की खटर-खटर के संगीत से बाहर आने के बाद सुबह ग्यारह बजे आवाज़ सुनाई दी. इधर से लिफ्ट है. मैं तीसरे माले पर ही उतर गया. ऊपर से फिर आवाज़ आई. आप नीचे रह गए हैं लेकिन कोई बात नहीं सीढियों से आ जाईये. जिस सोफा पर मैं बैठा था उसके सामने महान चित्रकार की पेंटिग रखी थी. पेंटिंग पर एक आत्मीय संदेश लिखा था. जैसे किसी पिता ने अपने प्यारे बच्चे के लिए पेंट कर के उसे तोहफा दिया हो. पिछले चौदह घंटों से जिन यांत्रिक आवाज़ों में खोया हुआ था वे शांत हो गई थी. मेरी आँखें भीगने को थी. उस दोस्त को सामने बैठे देखना ऐसा था जैसे किसी पवित्र धर्मगुरु के एकांत में प्रवेश कर लिया हो और अब तक सुनी गई दुआओं की विनम्र स्मृतियों के फाहे आस पास बिखर रहे हों.

धूप निकल आई थी. रसोई में गेहूं के सिकने की खुशबू थी. खिड़कियों के पार फैला हुआ शहर कुछ दूर जान पड़ता था. नीचे गली में बकरियों के झुण्ड के साथ गुजरती हुई लड़कियाँ लोक सुर में गाते हुए फाल्गुन की गंध को गाढ़ा कर रही थी. इस मौसम में अपनी बेढब बातें, शिकवे और अर्ज़ियाँ याद आने लगी. वे सब बेहिसाब थी. उनके सैलाब से बचना भी मुमकिन न था और उसका सामना भी आसान न था. सीढ़ियां पीछे रह गई थी. मेरे सन-ग्लासेज के पार दिखते हुए दृश्यों में बेसबब छू गए उसके कंधों के साथ सब पीछे छूटता जाता. ओटो वाले तक पहुँचने की याद के सिवा कोई याद न थी. मैं ठहर जाना चाहता था. मैंने खुद को इतना भारी कभी महसूस न किया. मुझको किसी नशे ने इस तरह नहीं घेरा था कि आँख खुली थी और कुछ सूझता न था.

मेरे पास हंगारी कहानियों का संग्रह था, उड़न-छू गाँव.

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…