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मरक़दों पे तो चिरागां है शब-ओ-रोज़

मैं एक अजनबी की तरह पार्क में दाखिल हुआ.
वहां कुछ जगहों पर दूब नहीं थी और खास तौर से जिस जगह पर कसरत करने के लिए दो 'बार' लगी थी वहां बिलकुल भी नहीं थी. उस नौजवान आदमी ने बार पर टिकी हुई हथेलियों पर अपने शरीर को सीधा उठाये हुए मेरी तरफ देखा. जबकि उसकी पीठ मेरी ओर थी. उस आदमी की उम्र कोई पच्चीस साल रही होंगी. इसके बाद मैंने एक नन्हे बच्चे को देखा जो ज़मीन और बार के बीच जाने किस चीज़ पर बैठा था. वह बच्चा चूँकि बैठा हुआ था इसलिए उसके कद और उम्र के बारे में कुछ कहना मुश्किल होगा किन्तु वह चार साल की उम्र से छोटा ही रहा होगा. उसके पास एक लड़की खड़ी थी. इन तीनों को एक साथ देखने से लगा कि वह निश्चित ही एक परिवार है. अर्थात पति, पत्नी और उनका बेटा.

सूखी हुई घास की तरफ बढ़ते समय मेरी चाल निरुद्देश्य सी दिखती होगी लेकिन जल्द ही उन सब के पास पहुँच गया. जैसे अभी अभी बिना मकसद के चल रहा था और अभी अभी लगता है कि किसी ख़ास काम के सिलसिले में इन्हीं से मिलने आया हूँ. वह लड़की निरंतर मेरी ओर देख रही है, ऐसा मुझे लगता है. इसलिए कि मैं निरंतर उस नौजवान को देख रहा हूँ. जो वर्जिश में लगा है.

"हाँ मुझे बताया." ऐसा कहते हुए उस नौजवान ने किसी का नाम नहीं लिया, ना ही किसी ओर देखा. मगर मुझे लगा कि वह पास खड़ी युवती के बारे में कह रहा था. जो अब बिना किसी संशय के उसकी पत्नी समझ आने लगी. इस बागीचे से मेरा घर साफ़ दीखता है. मैं यहाँ बहुत कम आता हूँ. उसने थोड़ी देर में कहा. "आपके लिए जरुर करेंगे." मैं उसको धन्यवाद तक नहीं कह पाया.

मैंने करवट ली होगी, शायद करवट... कि जगह बदल गयी.
अब एक उंची आलीशान बिल्डिंग के आगे की चौड़ी सड़क थी. बिल्डिंग ऐसी कि किसी महानगर के संभ्रांत रिहायशी इलाके में खड़े शोपिंग मॉल सरीखी. उसके आगे की चौड़ी सड़क के पार एक पतली गली में घरों की कतार है. उनके आगे से गुज़रते हुए एक दोमंजिला मकान को मुड कर देखता हूँ. मकान के पास खाली छूटी हुई ज़मीन है. इस पर एक घर बनाया जाना अभी बाकी है. मकान वाली पंक्ति के सामने के घर के आगे लगे पेड़ के पास वही नौजवान बैठा है और लड़की खड़ी है.

अगले पल लड़की उस दोमंजिला घर के अन्दर दिखाई देती है जबकि नौजवान जा चुका होता है. शायद फ़िर करवट ली.

खुले मैदान जैसी जगह है. जो व्यस्त शहर के उसी मॉल की ओर जाती है. भारी भरकम सामान ढ़ोने वाला एक विशालकाय वाहन अचानक मुझे अपने सर के ऊपर दिखाई देता है. इसमें स्टील के चद्दर है. जो किसी झाड़ू की तरह रगड़ खाते हुए पीछे आ रहे हैं. मैं उनके बीच ख़ुद को इस तरह पाता हूँ जैसे किसी विशाल स्तम्भों पर खड़ी छत के नीचे हूँ. मैं अपनी ओर बढ़ते आते चद्दरों से कट जाने से बचने के लिए आखिरी प्रयास करता हूँ.

मैं चूमने जितने फासले से बाहर आ जाता हूँ. अब रौशनी है. एक रुकी हुई साँस है. मैं अपने पांवों पर खड़ा हूँ. वहां एक सड़क बन रही है...

कल रात की नींद में सपनों के सिनेमाघर की ये तीसरी फ़िल्म थी. इससे पहले की दो फ़िल्में मैंने जानबूझ कर याद नहीं रखनी चाही कि वे खास उत्साह नहीं जगाती थी. इसमें ऐसा लगता था कि वो लड़की तुम हो !

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…