Skip to main content

क़ैदख़ाने में सुंदर पीठ वाली लड़की

मैदान में हरे रंग के पत्ते एक दूसरे की बाहें थामें हुए ऊँचे झांक रहे थे, यहीं कुछ महीने पहले धूल उड़ा करती थी. छत डालने के काम आने वाले सीमेंट के चद्दरों से दुपहिया वाहनों के लिए शेड बना हुआ है. यहाँ बैठा हुआ, सेटेलाईट डाटा रिसीविंग डिश के पार नीले आसमान में तैरते हुए बादलों के टुकड़ों को देखता हूँ. सप्ताह भर से लगातार बारिश हो रही है. अक्सर फाल्ट होने से पावर कट हो जाया करता है फिर स्टूडियोज़ के बंद कमरों में सीलन और ठहरी हुई हवा भारी होने लगती.

नाउम्मीद बैठे हुए अचानक तेज बारिश होने लगी. शेड के तीन तरफ पानी, फुहारें, एक लयबद्ध शोर, किनारे पर अटका एक भीगा हुआ पंख. दुनिया सिमट गयी है. यहीं बैठ कर इंतज़ार करो. सहसा आभास हुआ कि बारिश अपने साथ बहा ले जा रही है. मन की सतह का रंग बदल रहा है. अभी एक आवाज़ सुन रहा था. ताज़ा सीलन से भरी दोशीज़ा आवाज़. टूटती, बेदार और हिचकियों से भरी हुई... बारिश भी ऐसे ही गिरती है.

* * *
परसों रात
उस बंदीगृह के फर्श का बनना अभी बाकी था. सीमेंट मिली बजरी की रेतीली सूखी परत पर कई जगह बिछाने के लिए बारदाने या फ़िर फटी हुई कम्बलें रखी थी. उसकी पीठ मेरे हाथ के बहुत करीब थी. मैंने उसे छूकर देखा. अचानक सपनों में आने वाला समझदारी भरा सवाल सामने आया कि ऐसा कैसे हो सकता है कि इस बंदीगृह में स्त्रियाँ और पुरुष दोनों को एक साथ रखा गया है.

अगले पल मुझे अपने पड़ोस का एक लड़का दिखाई दिया. वह किस जुर्म में यहाँ बंद था. यह मालूम होने से पहले एक आदमी उस लड़की के बारे में बताने लगा. "हाँ वो लड़की जो अस्पताल में मर गयी थी." मुझे नहीं मालूम कि उस लड़की के मरने के पीछे की असली वजह क्या थी. मैंने कयास लगाया कि संभव है इस लड़की ने उसे ज़हर दे दिया होगा. इस सुडौल चिकने कंधों वाली लड़की का मुंह उसकी पीठ से मेल नहीं खाता था.

बंदीगृह के दरवाज़े और खिड़कियाँ किसी भी सूरत में कैदख़ाने की शक्ल नहीं बुन पा रहे थे. उस आधे खुल सकने लायक दरवाज़े से कोई बाहर निकल गया. मैंने खिड़की की ओर देखा. उसमें लगी लोहे की ग्रिल आम तौर पर बाज़ार निर्मित और भद्र घरों में लगने वाली सी थी. उसमें लगे शीशे के कुछ पल्ले खुले थे. मैं खड़ा हुआ सोच रहा था कि इसके बीच से निकल कर भागा जा सकता है. मुझे उन लोगों पर अफ़सोस हुआ जिन्होंने इतनी कमजोर जगह को चुना था.

बंदीगृह में. मैं अपने आपको अपराधी ठहराए जाने को मान नहीं पा रहा था. मुझे एक खास किस्म की जल्दी थी. मेरा कोई काम बाकी था जिसे किया जाना जरुरी था. मुझे लगता था कि इस बंदीगृह में मेरा वक़्त जाया हो रहा है. दृश्य बदल गया. अब मैं सड़क पर चल रहा था. वही पडौस का लड़का जो कैदख़ाने में बंद था सामने आता दिखाई दिया. मैंने उससे पूछा. "तुम कैसे आये ?" वह बोला. "आपको मालूम नहीं कि माँ के नाम पर वहाँ से छूट सकते हैं. मैंने यही किया."

लड़का चला जा रहा था. मैंने पाया कि शाम घिर आई है. सड़क की वह ट्यूबलाईट जल चुकी है जिसके नीचे भीलों के लड़के अक्सर रात बारह बजे तक खेला करते हैं.

* * *

कल रात
बहुत पुराना समय है. ऐसा कि जिसमें किताबों के पन्नों का रंग काफी काला हो चुका हो. कोई इंगलिश्तानी लेखिका है. जिसके जूड़े में गुंथे हुए बालों का आकार उसके पूरे उपरी भाग को ढक रहा है. कंधों तक फैला हुआ जूड़ा किसी मछली पकड़ने के जाल में कसा हुआ है. वह अपना सर झुकाए हुए है. दो पन्नों पर छपे हुए गध्य से मेरा कुछ वास्ता है जबकि इसी सिलसिले में मुझसे कोई बात करना चाह रहा है.

वह मुझसे कोई बात नहीं करती वरन उसकी मौजूदगी भी एक तस्वीर की ही शक्ल में हैं.

मैं समझने की कोशिश करता हूँ कि मैंने किया क्या है ? किस तरह मेरा वास्ता उसके लिखे से हो सकता है. मगर यहाँ भी अपराधी हूँ और इससे बाहर आने को बेचैन हूँ. यह बहुत मंद गति का सपना है. चलता ही नहीं. बस वही दो पन्ने और वही तस्वीर सामने आती रहती है.

* * *
जब उस शेड के नीचे बारिश को देख रहा था तब मैं तुम्हें फोन करना चाह रहा था कि अब घर के लिए निकल रहा हूँ. आज याद आया कि कैदख़ाने में जो लड़की थी. उसकी शक्ल एन (Anne Bronte) से मिलती थी. जो सिर्फ़ उन्नतीस साल की उम्र में दुनिया और हमारे लिए बहुत सी खूबसूरत कविताएं छोड़ गयी.

Popular posts from this blog

मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…