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दुछत्ती से उलटा लटका मकड़ा


बेरी पर खिले हैं कच्चे हरे पत्ते और कोमल कांटे। तुम्हारे बदन के अनछुए कच्चे रंगों की नक़ल उतारी है कुदरत ने। वक़्त के सितम तक के लिए। इस सुबह की किनारी पर लिखे हुये हैं तुम्हारी आलस भरी अंगड़ाई से पहले के मेरे बोसे। बासी मुंह मगर दम-ताज़ा आत्मा की पक्की मुहर वाले। ऐसा क्यों है कि तुमने गिरा रखा है खिड़की पर पर्दा, मैं पलट रहा हूँ याद के एल्बम से कई तस्वीरें। सूने रास्ते, नए मकान, और शाम। 
मैं तुम्हारे इंतज़ार के धागे से बंधा हुआ इस वक़्त दुछत्ती से उलटा लटका हुआ मकड़ा हूँ। तुम अदृश्य हवा की तरह दे रही हो मेरी ज़िंदगी को झूला। मैं तुम्हें न पाकर घबरा जाता हूँ। जबकि सुबह के इस वक़्त मेरी माँ पौंछ रही है उदासी, पिता की याद की। मैं सोचता हूँ कि पिता हमेशा के लिए जाने की जगह यहीं रह कर माँ को रुलाते तो भी अच्छा था। जैसे तुम नए बहाने से रुलाते जाते हो हर दिन मगर तुम होते हो इसी बात से खुशी आ जाती है। 
मैं क्या करूँ कि गिर रहे हैं परिंदों के कोमल पंख हवा में तैरते हुये। दिन की तपन बढ़ती ही जा रही है। रेगिस्तान का मौसम जाने किस उदास आदमी ने लिखा था। यहाँ वक़्त की सबसे बड़ी मंडी में खूब तंगी हैं इन दिनों कि तुम्हारी याद के ज़रूरी काम में डूबा हुआ हूँ। 
पानी के मटके से टपकती है बूंद। हर आवाज़ के साथ मेरा दिल डूबता जाता है। समय छीज रहा है। 
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पतनशील पत्नियों के नोट्स

फरवरी का पहला सप्ताह जा चुका है मगर कुछ रोज़ पहले फिर से पहाड़ों पर बर्फ गिरी तो रेगिस्तान में भी ठण्ड बनी हुई है. रातें बेहिसाब ठंडी हैं. दिन बेहद सख्त हैं. कमरों में बैठे रहो रजाई-स्वेटर सब चाहिए. खुली धूप के लिए बाहर आ बैठो तो इस तरह की चुभन कि सबकुछ उतार कर फेंक दो. रेगिस्तान की फितरत ने ऐसा बना दिया है कि ज्यादा कपड़े अच्छे नहीं लगते. इसी के चलते पिछले एक महीने से जुकाम जा नहीं रहा. मैं बाहर वार्मर या स्वेटर के ऊपर कोट पहनता हूँ और घर में आते ही सबको उतार फेंकता हूँ. एक टी और बैगी पतलून में फिरता रहता हूँ. याद रहता है कि ठण्ड है मगर इस याद पर ज़ोर नहीं चलता. नतीजा बदन दर्द और कुत्ता खांसी. 
कल दोपहर छत पर घनी धूप थी. चारपाई को आधी छाया, आधी धूप में डाले हुए किताब पढने लगा. शादियों का एक मुहूर्त जा चुका है. संस्कारी लोगों ने अपनी छतों से डैक उतार लिए हैं. सस्ते फ़िल्मी और मारवाड़ी गीतों की कर्कश आवाज़ हाईबर्नेशन में चली गयी है. मैं इस शांति में पीले रंग के कवर वाली किताब अपने साथ लिए था. नीलिमा चौहान के नोट्स का संग्रह है. पतनशील पत्नियों के नोट्स. 
तेज़ धूप में पैरों पर सुइयां सी चुभती …

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एक लड़की की कहानी

कहानी कहना एक अच्छा काम है. मैं कुछ सालों तक लगातार ड्राफ्ट तैयार करता रहा फिर अचानक से सिलसिला रुक गया और मैं अपने जाती मामलों में उलझ कर कुछ बेवजह की बातें लिखने लगा. मुझे यकीन है कि मैं एक दिन अच्छी कहानी लिखने लगूंगा... मेरा समय लौट आएगा.

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