मार गिराता हूँ दिन और रात


बम वर्षक विमान गुज़रता है 
रेगिस्तान के ऊपर से
और ढह जाता है रेत का किला
लकड़ी के उम्रदराज़ पुराने लट्ठों के बीच
मकड़ा झूलने लगता है टूटे जाल पर।

मैं घिसटता हुआ आता हूँ बाहर
और सूरज को टटोल कर देखता हूँ
कि समय के घड़ियाल में चल रहा है कौनसा साल।
* * *

एक मरा हुआ आदमी
चहलकदमी करता है अतीत में।

डॉक्टर पौंछता है पसीना
मैं हँसता हुआ कहता हूँ अपने हाथों को सूँघिए ज़रा
इनमें एक लड़की की खुशबू है।

डरा हुआ आदमी नहीं सूंघ सकता अपने हाथ
मगर सच है कि
एक मरा हुआ आदमी चहलकदमी करता है अतीत में।

वही अतीत जिसमें से तुम, सब चीज़ें ले गए बुहार कर। 
* * *

मैं खाने की मेज पर बैठा हुआ
मुस्कुराने लगता हूँ
कि इस कांटे को
काली मिर्च वाली फूल गोभी की जगह
चुभोया जा सकता है आँख में।

मेरी डरी हुई बीवी को
डॉक्टर देता है सांत्वना
मैं डॉक्टर की शक्ल देख कर फिर मुसकुराता हूँ
कि इसको कौन करता होगा प्यार।

डॉक्टर की मेज पर रखा है पेपरवेट
मैं फिर दोबारा मुसकुराता हूँ
कि काश इसे खाया जा सकता पकी हुई फूल गोभी की तरह। 
* * *

मैं एक आभासी दीवार पर बनाता हूँ
सहवास की कामना से भरा मस्तिष्क

फिर

उम्मीद की दुनाली बंदूक में भरता हूँ
गुलाबी, सफ़ेद, पीली, गुलाबी, सफ़ेद, पीली गोलियां
उनको दागता जाता हूँ एक नियत अंतराल से
इस तरह मार गिराता हूँ दिन और रात।

हर सातवें दिन डॉक्टर थपथपाता है मेरी पीठ
मैं ज़िंदगी की लड़ाई के लिए 
लौट आता हूँ अपने सीने पर कारतूसों वाला पट्टा बांधे 
फिर से सात दिन और रात के लिए। 
* * *

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