मैं टूटे हुये तीर-कमां देख रहा हूँ।

ब्रूस स्प्रिंगटीन्स ने कहा कि अपने नेताओं या किसी भी चीज़ के प्रति अंध विश्वास आपको खत्म कर देगा। कुछ रोज़ पहले जाने माने सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की पुणे में दो अज्ञात हमलावरों ने गोली मार कर हत्या कर दी।वे अंधविश्वास का विरोध करते हुये अपना जीवन समर्पित कर गए। हादसों की इस सदी में नित नूतन और हृदय को दुख से भर देने वाले समाचारों के बीच ये दुखद घटना भी संभव है कि काल की धूसर परछाई में भुला दी जाए। किन्तु ऐसा इसलिए न होगा कि उनका लक्ष्य बेहद ज़रूरी था और वह कोरा भाषण न होकर सक्रियता से किया जा रहा सामाजिक कार्य था। ये याद रखने की बात है कि अंध विश्वास के विरुद्ध लड़ना मनुष्यता की भलाई के लिए किया जाने वाला एक महत्वपूर्ण काम है। श्री दाभोलकर उनहत्तर साल के थे। वे लंबे समय से अंधविश्वास विरोधी अभियान चला रहे थे। उनकी हत्या से अंधविश्वास विरोधी आंदोलन को तगड़ा झटका लगा है। उनके बेशकीमती जीवन का कोई मूल्य न चुकाया जा सकेगा। ‘अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति’ के प्रमुख दाभोलकर सुबह टहलने निकले थे तभी ये घटना शहर के ओंकारेश्वर मंदिर के पास पुल पर हुई। घटनास्थल ‘साधना’ पत्रिका के कार्यालय के पास है। दाभोलकर इस पत्रिका के संपादक थे।

समूचे विश्व में मनुष्य के ज्ञानवान होने का सहज अनुमान इसी बात से लगाया जाता है कि उसने कुदरत को कितना जाना है और अपने अज्ञान के प्याले में ज्ञान का कितना आसव भर चुका है। हम सब कोरे जन्मते हैं। यानि हमारे मस्तिष्क में कुछ भी ऐसा नहीं होता जो दुनिया के बारे में कोई विशेष धारणा रखता हो। हम अपने जीवन की रक्षा के लिए होने वाली नैसर्गिक प्रतिक्रियाओं के अतिरिक्त किसी भी तरह का ज्ञान साथ लेकर नहीं आते हैं। हमारे लिए ये दुनिया और इसकी तमाम जटिलताएँ अजानी और अभेद्य हुआ करती हैं। लेकिन हम अपने विवेक और पुरखों के ज्ञान से इस दुनिया की गति को जानते समझते हैं। अन्वेषी मनुष्य सदा सत्यकामी हुआ करता है। वह परखता है, वह जाँचता है और इसके बाद प्राप्त नतीजे से अपना ज्ञान रचता है। जो ज्ञान हमें हमारे पुरखों से मिला है, वह बेशकीमती है। उस ज्ञान का तिरस्कार नहीं किया जाना चाहिए कि किसी भी अकेले मनुष्य के पास इतना जीवन नहीं होता कि वह सारी दुनिया को जान समझ ले। पुरखों का ये बेशकीमती ज्ञान पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ता ही जाता है। जिस सभ्यता में ज्ञान को एक से दूसरे को सौंपने का प्रचलन न था वे सभ्यताएं ही समूल नष्ट हो गयी। लेकिन चिंता की बात वहाँ होती है जहां हम अपने पुरखों के दिये ज्ञान को आँखें मूँद कर मान लेते हैं। हम ये चेष्टा नहीं करते कि पुरातन की परंपरा और आवरणबद्ध ज्ञान को नए जमाने की रोशनी में अनावृत किया जाए।

अमानवीय सामाजिक रीतियों के खिलाफ दो दशक से जारी अपने अभियान के लिए जाने जाने वाले दाभोलकर महाराष्ट्रराज्य विधानसभा में ‘अंधविश्वास एवं काला जादू रोधी’ कानून पास कराने के लिए जनमत बनाने में जुटे थे। वे इस मसले पर महाराष्ट्र सरकार के साथ लगातार चर्चाएं कर रहे थे। दाभोलकर ने हाल में इस विधेयक के पास होने में हो रही देरी को लेकर उन्होने सत्तासीन लोगों के प्रति कई बार सार्वजनिक रूप से विरोध प्रकट किया था। अंधविश्वासों के खिलाफ सख्त कानून न लाने को राज्य के प्रति धोखा कहते थे। अंधविश्वास और रूढ़ियों के विरुद्ध काम करते हुये दाभोलकर ने हाल में जात पंचायत के खिलाफ भी अभियान शुरू किया था और नासिक में कार्यशाला आयोजित की थी। इस कार्यशाला में समाज को पुरातन की अंधी पटरी से उतार कर विज्ञान और नए जमाने के रास्ते पर लाने की हिमायत की थी। खाँप पंचायतों के फैसलों पर देश भर के प्रगतिशील और बुद्धिजीवी तबके के बीच खूब चर्चा हुआ करती है लेकिन कहीं से किसी भी तरह के सामाजिक और सामूहिक कार्यक्रमों का आयोजन होने की खबर कम ही मिलती है। इसलिए भी दाभोलकर जी द्वारा आयोजित ये कार्यशाला महाराष्ट्र के प्रगतिशील होने का एक मजबूत आह्वान थी।

हम ऐसा नहीं कह सकते कि उनकी हत्या के साथ प्रगतिशील आंदोलन से एक पहचान छिन गई। इसलिए कि मनुष्य के गुणसूत्र प्रगतिशील हैं। उनको सही रास्ता और माहौल मिल सके इसी बात की ज़रूरत है। लेकिन हम ये कह सकते हैं कि उनकी ह्त्या से इस संभावित माहौल को गहरा सदमा पहुँच है। दाभोलकर अपने आंदोलन के माध्यम से समाज में जागरूकता फैलाने का काम कर रहे थे। उनके काम से महाराष्ट्र की प्रगतिशील विचारधारा लाभान्वित हो रही थी। सतारा के रहने वाले दाभोलकर ने मिराज मेडिकल कालेज से चिकित्सा विज्ञान की पढ़ाई की थी और करीब एक दशक तक चिकित्सक के रूप में सेवा देने के बाद समाजिक कार्यों से जुड़ गए थे। दाभोलकर जिस ‘साधना’ नाम की एक पत्रिका के संपादक उसकी शुरूआत साने गुरुजी ने की थी। दाभोलकर सामाजिक कार्यकर्ता बाबा आधव के ‘एक गांव एक कुआं’ आंदोलन और अखिल भारतीय अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति से भी जुड़े थे। दाभोलकर मूर्तियों के विसर्जन के भी खिलाफ थे। उनका कहना था कि इससे पानी प्रदूषित होता है। इस तरह से उन्होने अपना जीवन अंधविश्वासों के खिलाफ और आम आदमी की भलाई को समर्पित कर रखा था। ये हमारे लिए बड़ी क्षति है किन्तु उनके लिए सबसे सच्ची श्रद्धांजलि ये हो सकती है कि हम अपने मन की बेड़ियों को काटें, रूढ़ियों और अंधविश्वासों से खुद को दूर रखें और अपने बच्चों को उनके प्रति जागरूक बनाएँ। हम एक दिन ज़रूर अंधविश्वासों से दूर हो जाएंगे लेकिन इस वक़्त यही हाल है कि उनके जाने का दुख असीम है। बाल स्वरूप राही साहब का एक शेर है- वो सोच में डूबे हैं निशाना है कहाँ पर, मैं टूटे हुये तीर-कमां देख रहा हूँ।

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