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खून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बाद

सेना युद्ध के मैदान में लड़ रही हो और सेनापति अफीम के नशे में किसी का सहारा लिए आखिरी पंक्ति के पीछे कहीं पड़ा हो। घुड़सवारी सिखाने वाला प्रशिक्षक खुद घोड़े की पीठ में सुई चुभोता जाए। तैराकी सिखाने वाला गुरु खुद बीच भंवर में डूबता हुआ छटपटा रहा हो। ये कैसा होगा? मैं सप्ताह भर की प्रमुख खबरें सूँघता हूँ और मितली आने के डर से अखबार फेंक देना चाहता हूँ, टीवी को ऑफ कर देना चाहता हूँ। मेरी आत्मा पर बार बार चोट कर रही खबरों से घबराया हुआ, मैं सबसे मुंह फेर लेना चाहता हूँ। वैसे हम सबने मुंह फेर ही रखा है। हम सब सड़ी हुई आदर्श रहित जीवन शैली को अपनानाते जा रहे हैं। लालच और स्वार्थ ने हमारे मस्तिष्क का इस तरह अनुकूलन किया है कि हमने स्वीकार कर लिया है कि ऐसा होता रहता है। हम चुप भी हैं कि आगे भी ऐसा होता रहे। विडम्बना है कि नैतिकता और उच्च आदर्शों से भरे सुखी जीवन का पाठ पढ़ाने वाला खुद चरित्रहीनता के आरोप से घिर जाए। ये निंदनीय है। ये सोचनीय है। विवादास्पद प्रवचन करने वाले आसूमल सीरुमलानी उर्फ आसाराम पर एक नाबालिग लड़की के यौन उत्पीड़न का आरोप है।

जोधपुर के आश्रम में यौन उत्पीड़न किए जाने का सोलह वर्षीय द्वारा आरोप लगाए जाने के बाद आसाराम के खिलाफ इस संबंध में मामला दर्ज किया गया है। खबरों में आते ही उनके प्रवक्ता ने इस आरोप का खंडन ये कहते हुये किया कि बताए गए दिन आसाराम जोधपुर में ही नहीं थे। लेकिन प्राथमिक अनुसंधान में ही ये पुख्ता जानकारी मिल गयी कि ये बयान झूठा है। सत्य का प्रवचन करने वाले कथित संत के प्रवक्ता दारा दिया गया बयान, झूठ अथवा स्मृतिदोष का कड़ा उदाहरण है। आसाराम उस दिन जोधपुर में ही थे। जांच एजेंसी ने कहा कि जांच के दौरान उन्होंने पाया कि लड़की जोधपुर के मनाई आश्रम में एक धार्मिक कृत्य के लिए आसाराम से मिलने की इच्छुक नहीं थी लेकिन उसके माता-पिता ने उसके वहां जाने पर जोर दिया था। उसके माता-पिता की आसाराम में अंध भक्ति थी। छिंदवाड़ा में गुरुकूल से लड़की के माता-पिता को सेवादारों ने बताया कि उसे किसी बुरी आत्मा ने अपने कब्जे में ले लिया है। उन लोगों ने उन्हें झाड़फूंक के नाम पर विशेष अनुष्ठान के लिए बापू के पास ले जाने के लिए कहा। लड़की ने इनकार कर दिया था। लेकिन उसके माता-पिता ने बापू के पास जाने पर जोर दिया, जो उस वक्त जोधपुर में थे। एजेंसी का कहना है कि लड़की के पैतृक स्थल शाहजहांपुर में की गई जांच के बाद पाया गया कि लड़की के पिता की आसाराम में अंध भक्ति थी। शाहजहांपुर में यह परिवार आश्रम में नियमित जाया करता था। अंध भक्ति के खिलाफ अभियान चलाने वाले डॉ नरेंद्र दाभोलकर की हत्या के महज सप्ताह भर बाद ही अंध भक्ति का एक नया सबक हमारे सामने आया है। इसमें पिता की अंध श्रद्धा के कारण एक मासूम लड़की को कथित रूप से प्रताड़ित होना पड़ा है।

हम जिस भारतवर्ष के गुणगान करते हैं, वह किस दशा से गुज़र रहा है। इसे भली भांति हर कोई जानता है। जयपुर के एक बालिका आवासीय छात्रावास में हुये दुष्कर्मों की पड़ताल और नतीजे के बारे में हम सब भूल गए हैं। राष्ट्रीय राजधानी में चलती बस में बलात्कार और निर्ममता पूर्वक की गई ह्त्या के आरोपियों पर लंबित फैसले का अभी तक इंतज़ार ही कर रहे हैं। इसी इंतज़ार में उत्तर पूर्व से एक और बुरी खबर आती है। हमारे जेहन में है कि पहाड़ी और खासकर उत्तर पूर्व के राज्यों में महिलाओं की समाज में स्थिति मैदानी भागों की स्त्रियॉं से बहुत बेहतर है लेकिन वेस्ट सियांग जिले के लिकाबाई में एक निजी स्कूल में होस्टल वार्डन को चौदह बच्चियों के साथ कथित रूप से बलात्कार के सनसनीखेज मामले में हिरासत में लिया गया है। आरोप है कि चार से तेरह साल की बच्चियों के साथ वार्डन तीन साल से अधिक समय तक बलात्कार करता रहा। इस घटना के सामने आने के बाद स्थानीय लोगों ने सड़कों पर विरोध प्रदर्शन किया। उन्होंने दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग करते हुए लिकाबाली पुलिस थाने का घेराव भी किया। स्कूल के कुछ छात्रों ने लिकाबाली पुलिस थाने में कल शिकायत दर्ज करायी। नामित आरोपी को पुलिस गिरफ्तार कर लिया। वह स्कूल में अध्यापक के साथ ही होस्टल वार्डन भी था। इस संबंध में पूछताछ के लिए स्कूल के प्रिंसीपल और दो अन्य कर्मचारियों को भी हिरासत में लिया गया है। प्राथमिक जानकारी के अनुसार स्कूल में पिछले तीन साल से छात्राओं का यौन उत्पीड़न और बलात्कार जारी था। अपराध को अंजाम देने के बाद आरोपी ने छात्राओं को इसकी जानकारी अपने माता पिता को देने पर कड़ा अंजाम भुगतने की धमकी दी थी। इस तरह नाबालिग बच्चियों के मासूम मन को रोंद डाला गया है। ये कोई नवीन घटना नहीं है। ऐसा देश के लगभग सभी हिस्सों में होता आया है। इस तरह हम अपने देश के लिए भयभीत और स्त्री होने के नकली अपराधबोध से पीड़ित दुनिया की ओर बढ़ रहे हैं। 

सुरक्षा का खतरा सिर्फ अबोध बच्चियों और बच्चों को ही नहीं है वरन वाणिज्यक राजधानी मुंबई में एक नौजवान फोटो पत्रकार के साथ पाँच लोग सामूहिक बलात्कार करते हुये तनिक भी नहीं घबराते। वे उसके साथी को पीटते हैं, बेल्ट से बांधते हैं और लड़की के साथ बलात्कार करते हैं। अंग्रेजी पत्रिका के साथ इंटर्नशिप कर रही इस तेईस वर्षीय फोटो पत्रकार से कथित रूप से सामूहिक बलात्कार एक सुनसान पड़ी मिल में किया गया। वह अपने पुरूष सहकर्मी के साथ फोटो खींचने गयी थी। जिस देश में काम के सिलसिले में घर से बाहर जाने वाली स्त्रियॉं के साथ दुर्व्यवहार करते हुये लोगों के मन में भय न हो, सत्य और नेकी का पाठ पढ़ाने वाले खुद चरित्रहीनता के आरोपी हों उस देश का भविष्य क्या होगा?हमारी जो उम्मीद है वह राज से है। मध्य प्रदेश में राज में बैठे हुये अस्सी बरस के वयोवृद्ध नेता अपने नौकरों के साथ कुकृत्य करने के दोष और उत्तर प्रदेश के निर्वाचित सत्ता दल के विधायक समुद्री किनारों पर अनैतिक आचरण करते हुये पकड़े जाए। और हम ये भी न भूल सकें कि विधानसभा में बैठे हुये जनप्रतिनिधि अपने मोबाइल फोन में अश्लील वीडियो देखते हुए दिखते हैं। कानून के इन पालकों के साथ क्या सलूक होना चाहिए। ये किससे पूछा जाए। देशभक्ति और धार्मिक चेतना से भरे हुये दलों का स्वरूप वास्तव में राष्ट्रभक्त होने का है या जो खबरों में दिखाई देता है, वह है। संत होने की उच्च प्रतिष्ठा पर लगी हुई कालिख, पुलिस थानों में अपना मुंह छिपाये हुये बैठे जनप्रतिनिधि और शिक्षा के मंदिरों में कुंठित यौन दुराचारी। खबरें यहीं हैं, और खबरें समाज का आईना भी हैं। फ़ैज़ पूछते हैं तो हमें भी यही पूछना याद आ रहा है। 

कब नज़र आएगी बेदाग़ सब्ज़े की बहार,
खून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बाद।

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चुड़ैल तू ही सहारा है

रेगिस्तान में चुड़ैलों के कहर का मौसम है. वे चुपके से आती हैं. औरतों की चोटी काट देती हैं. इसके बाद पेट या हाथ पर त्रिशूल जैसा ज़ख्म बनाती हैं और गायब हो जाती हैं.
सिलसिला कुछ महीने भर पहले आरम्भ हुआ है. बीकानेर के नोखा के पास एक गाँव में चोटी काटने की घटना हुई. राष्ट्रीय स्तर के एक टीवी चैनल ने इस घटना को कवर किया. पीड़ित और परिवार वालों के इंटरव्यू रिकॉर्ड किये. कटी हुई चोटी दिखाई. बदन पर बनाया गया निशान दिखाया. गाँव के बाशिंदों की प्रतिक्रिया दर्ज की. पुलिस वालों के मत लिए. इसके बाद इसे एक कोरा अंध विश्वास कहा. घटना के असत्य होने का लेबल लगाया. टीवी पर आधा घंटे का मनोरंजन करने के बाद इस तरह सोशल मिडिया के जरिये फैल रही अफवाह को ध्वस्त कर दिया.
इसके बाद इस तरह की घटनाओं का सिलसिला चल पड़ा. बीकानेर के बाद जोधपुर जिले की कुछ तहसीलों में घटनाएँ हुईं. जोधपुर से ये सिलसिला बाड़मेर तक आ पहुंचा. सभी जगहों पर एक साथ पांच-सात स्त्रियों के साथ ऐसी घटनाएँ हुईं. उनकी कटी हुई चोटी का साइज़ और काटने का तरीका एक सा सामने आया. शरीर पर बनने वाले निशानों की साइज़ अलग थी मगर पैटर्न एक ही था.
बाड़मेर के महाबा…

मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।