Skip to main content

थके हारे बेमजा सिपाही की तरह



किसी ने आवाज़ दी- जाखड़ साहब.
मैंने बालकनी से सर नीचे किया. उदघाटन समारोह का कार्ड. इतनी सुबह. मैं आँखें मीचे हुए कहता हूँ आओ चाय पीकर जाना. कहते हैं नहीं नहीं फिर कभी.

रसोई में खड़े हुए मुझे देखकर वो कहती है मालूम ही नहीं चलता कि आदमी है कहाँ? इस इंटरनेट ने सत्यानाश कर दिया सुकून का. मैं ऐसे देखता हूँ जैसे तुमको मुझ पर विश्वास नहीं. वह ऐसे देखती है कि पक्का अविश्वास ही है.

विस्की की बू से भरे हुए चहरे को उठाये हुए सोचता हूँ कहाँ गए रात को, किस घोड़े पर चढ़े, किस सांप को बाँहों में भरा.

परसों रात किसी ने ज़रा कांपते हाथों से ग्लास आगे बढ़ाया- 'सर लीजिए एक बचा रह गया.' जैसे किसी दुश्मन का सर था और बेखयाली में कलम करने से रह गया. सहरा-सहरा, बस्ती-बस्ती अपनी तेग के किनारे खून से भरे हुए थके हारे बेमजा सिपाही की तरह मैंने उसे हलक के नीचे कर दिया.

कुदरत ने बदन बनाया. लोच और गर्मी से भरा हुआ. यही खूब था. इसके आगे रूह जैसी आफत बनायीं. जैसे असल नशे का खयाल आते ही शराब पानी हो जाती है. उसी तरह बदन से उकता गया हूँ.

साहेब. इधर देखो तो.

दीदे हैं तो फाड़ने को थोड़े ही हैं.

या तो मुसलमान रहो या काफ़िर हो जाओ, खच्चर कहीं के. ना कोई मुसल इमान हैं न बे इमान.

सुबह सुबह भक्त पूरी ले लेते हैं. कोई बेसुरा बच्चा पकड़ कर कुछ रिकार्ड कर लिया है. रेलवे स्टेशन के आस पास कहीं टेप बजने लगता है. मैं कहता हूँ सर्दियाँ अच्छी हैं गधों के रेंकने की आवाज़ तो नहीं सुनाई पड़ती बंद कमरों में. या फिर हाय तौबा वाली गर्मी हो कि कमरा बंद करें और ऐसी में रजाई लेकर सोयें. पागल दुनिया, बाहर गर्मी का तमाशा अंदर ठंडी.

जान ज़रा पास आओ तो

मीलों के फासले और लाखों के खर्चे को लात मार कर दुनिया एक हो गयी है. अलग अलग होते हुए भी नैनो तकनीक के आने से पहले ही साथ सो जाती है. सोते हुए पूछती है मजा आया.

हाँ कल फिर बाय

एक ही आदमी और औरत में कितने सलीके छुपे हैं. जिस दिन खुद के पास होता है डर जाता है. अचानक एक खौफनाक खयाल आता है कि मैं अपनों से दूर हो गया. इस अपराधबोध में चूमता चाटता है. कुछ एक लोग सिनेमा दिखा लाते हैं.

मेरे चार दिन बरबाद हुए. पर अच्छा हुआ कि इसी बहाने फोन पर कुछ लोगों से बात कर ली.

मेरे दोस्त व्हाट्स एप पर मेरी वैसे ही बारह बजाते हैं जैसे कि सुबह बेसुर सिंधी गायक बच्चा. रब कहीं है तो इन दोनों को देख ले कृपया. कि ऋ प या करके ज़रूर.

जनवरी डूब रहा था तो सोचा कि गयी भैंस पानी में कि फिर वही दीवानापन. जाने कैसे कहीं से लौट आया. दुनिया के जियादातर लोगों का हाल यही है कि दो टके के फर्ज़ी इश्क का बिल भरने में अनमोल ज़िंदगी तबाह. सोचा नहीं कि कब जागे हैं, क्या सचमुच जागे हैं, क्या करेंगे जाग कर... और ज्यादा सोचना भी अच्छा नहीं.

आह सर फिरा हुआ है. मुआ फूल गेंदे का लगाया था और खुशबू गुलाब की आ रही है. पी रात को रम थी और ख़याल विस्की का ही तारी है. नकली लोगों की संगत में सबकुछ नकली कि जो चाहिए वह कहते नहीं हैं जो कहते हैं वह और भी नहीं चाहिए.

वो याद है, अरे वही कुम्हारों की लड़की भरे गदराए बदन वाली और इससे भी बड़ी बात कि जिससे अक्ल मुंह फेरकर बैठी थी. जिसे देखकर मुल्ला नसरुदीन के ज़माने की कमसिन लड़कियां याद आ जाये. गधों की पीठ का सहारा लिए खड़ी मुस्कुराती हुई. वही सिटी कोतवाली का इलाका जहाँ गलियां पानी की तरह नीचे की ओर बहती रहती हैं. लोग सीढियाँ चढ चढ कर ऊपर आते हैं और ढलान उनको वापस जोधपुर शहर में बहा ले जाती है.

कुल जमा, आज की सुबह बहुत अच्छी थी. विविध भारती ने गाना बजाया- सौतन के संग रात बितायी... चाय की प्याली हाथ में लिए बच्चों को स्कूटर पर स्कूल जाते देखकर हिदायतें बरसाई. आहिस्ता गाड़ी चलाने वाला आहिस्ता से गिरता है. खयाल रखना अपना. चाय हाथ में लिए सोचा विस्की गा रही है कि तुम मेरी सौतन रम के साथ सोकर उठे हो.

Popular posts from this blog

मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…