ये धुंआ सा कहाँ से उठता है.

जीवन सरल होता है. वास्तव में जीवन परिभाषाओं से परे अर्थों से आगे सर्वकालिक रहस्य है. युगों युगों से इसे समझने की प्रक्रिया जारी है. हम ये ज़रूर जानते हैं कि हर प्राणी सरलता से जीवन यापन करना चाहता है. मैं एक किताब पढते हुए देखता हूँ कि कमरे की दीवार पर छिपकली और एक कीड़े के बीच की दूरी में भूख और जीवन रक्षा के अनेक प्रयास समाये हुए हैं. जिसे हम खाद्य चक्र कहते हैं वह वास्तव में जीवन के बचने की जुगत भर है. एक बच जाना चाहता है ताकि जी सके दूसरा उसे मारकर अपनी भूख मिटा लेना चाहता है ताकि वह भी जी सके. जीवन और मृत्य की वास्तविक परिभाषा क्या हुई? कैसे एक जीवन के मृत्यु के प्राप्त होने से दूसरे को जीवन मिला. इस जगत के प्राणियों का ये जीवन क्रम इसी तरह चलता हुआ विकासवाद के सिद्धांत का पोषण करता रहा है. विज्ञानं कहता है कि हर एक जींस अपने आपको बचाए रखने के लिए समय के साथ कुछ परिवर्तन करता जाता है. कुछ पौधों के ज़हरीले डंक विकसित हो जाने को भी इसी दृष्टि से देखा जा रहा है. ऐसे ही अनेक परिवर्तन जीवों में चिन्हित किये गए हैं और उन पर वैज्ञानिक सहमती बनी हुई है. क्या एक दिन कीड़ा अपने शरीर पर ज़हर की परत चढा लेगा. क्या छिपकली को अपने पाचन तंत्र में उसी ज़हर का असर खत्म करने का हुनर चाहिए होगा? बस ऐसे ही ख्यालों में मनुष्य के श्रेष्ठ होने की याद दिलाती हुई कहानियां मनुष्य के शोषण, उत्पीडन और पतन की भी याद दिलाती हैं. अमेरिका साम्राज्यवाद का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है. इसी अमेरिका के दो लेखक मार्क ट्वेन बीहड़ों के जीवन और मनुष्य के जीवट को उकरने वाले रहे हैं. उन्हीं के समकालीन थे जैक लंडन. अट्ठारह सौ छिहत्तर में जन्मे जैक लंडन को जिजीविषा का कथाकार कहा जाता है. जिजीविषा का अर्थ होता है जीवन जीने की इच्छा. जीवन को मिटने से रो़कने के सतत प्रयास करने की कामना. एक मामूली कीट-पतंगे से लेकर एक जंगल के राजा कहलाने वाले जीव शेर को भी अपने जीवन की रक्षा के लिए अंतिम समय तक प्रयास करते हुए देखा जाता है. हम सब जीवों में कुदरत की दी हुई एक जैविक क्रिया होती है कि हम अपने जीवन की रक्षा करें. लेकिन अब हमारा मन हार मानने से इंकार करे वाही वास्तव में जिजीविषा है.

किसी आदमी को मारना, जैक लंडन की एक कहानी है. ये कहानी कई अर्थों में साम्राज्यवाद के उदय और उसकी नीयत के बारे में बात करती है. कथा का नायक एक अच्छे खाते पीते घर में घुस आया है. रात के वक्त इस हवेलीनुमा घर में हल्के अंधियारे में वह मकान मालकिन से टकराता है. अजनबी को सामने पाकर ज़रा डर गयी मालकिन उससे पूछती है तुम कौन हो और यहाँ किस तरह आये? मैं इस भूल भुलैया में भटक गया हूँ और अगर आप कृपया करके मुझे बाहर का रास्ता दिखा दें तो मैं कोई गदबा नहीं करूँगा और चुपचाप फूट लूँगा. महिला ने उससे पुछा कि तुम यहाँ कर क्या रहे थे? वह आदमी कहता है- चोरी करने आया था मिस जी और क्या? देख रहा था कि यहाँ से क्या क्या बटोरा जा सकता है. इसके बाद चोरी करने के लिया आया आदमी और घर की मालकिन के बीच कई तरह की चालबाजियां और बातें होती हैं. मालकिन अपने ही घर में हैं और चोर को दयालु पाकर ज़रा अकड जाती हैं. वे हर समय एक ही सपना देख रही होती हैं कि इस चोर को पकडवा देने से कल उनका नाम बहादुर और श्रेष्ठ महिला के रूप में लिया जायेगा. इसलिए वे हर संभव प्रयास करती हैं कि चोरी करने आये आदमी को पकड़ा जा सके. आदमी के हाथ में एक रिवाल्वर है. लेकिन आदमी के दिल में अभी भी स्त्रियों के प्रति सम्मान है. जब मालकिन पूछती है कि क्या तुम मुझे गोली मार दोगे तब वह कहता है नहीं मुझे आपकी ठुकाई करनी पड़ेगी. आदमी अपनी जान को बचाने के लिए उसकी जान लेने तक नहीं जाना चाहता है. औरत पूछती है क्या तुम एक स्त्री पर हाथ उठाओगे? वह कहता है इसके सिवा कोई रास्ता नहीं है कि मैं आपका मुंह कसकर बंद कर दूं.

इसी कहानी में आगे मकान मालकिन उसको शराब पीने का ऑफर देती है और उस बहुत सारी बातें करते हुए समय को गुज़ारती हैं ताकि आलसी नौकर या पुलिस तक खबर की जा सके. वह आदमी अपने बारे में पूरा अहतियात बरतते हुए वाहन से निकल पाने के बारे में सोचता रहा है. इसी बातचीत में वह आदमी कहता है कि मैं कोई चोर नहीं हूँ वरन सताया हुआ आदमी हूँ. कहानी का एक संवाद कुछ इस तरह है- देखिये मैम, मेरे पास एक छोटी सी खदान थी. ज़मीन में ज़रा सा छेद भर समझ लीजिए. एक घोड़े से चलने वाली मशीन थी. उस इलाके में इस्पात की भट्टियों का सारा कारोबार काबू में कर लिया गया और उसी जगह पर एक कारखाना बैठा दिया गया तो मैं चें बोल गया. मुझे घाटे से जूझने और बचने की कोशिश का मौका ही नहीं मिला. इस कहानी में सत्य कितना और कल्पना कितनी है ये समझ पाना कठिन है. लेकिन हम ये समझ सकते हैं कि लघु उद्योगों पर बड़े कारखानों की मार किस तरह एक आदमी को तोड़ देती है. किस तरह हम आने जीवन यापन के साधनों को खो देने से बदहवास हो जाते हैं. हमें ये भी समझ आया है कि ज़मीन और जंगल से बेदखल किये हुए लोग किस रास्ते को चुनने को मजबूर किये जा रहे हैं. आज जंगल में कानून को चुनौती देने वाली आवाजें हैं. उन आवाजों के पीछे भी एक हारे हुए टूटे हुए आदमी की व्यथा को सुना जा सका है. जैक लंडन आज से सौ साल पहले के कथाकार हैं. हम आज जिस हाल में जी रहे हैं वह सौ साल बाद भी वैसा ही है. शोषण और उत्पीडन का सिलसिला कुछ ऐसा है कि लोग अपने ही घर, ज़मीन और जंगल से बेदखल कर दिए जा रहे हैं. किसी आदमी को मारना, कहानी का नायक उस औरत को इसलिए नहीं मारता कि वास्तव में वह इंसान होने की कद्र करता है. बाहर जाते हुए उस आदमी पर वह औरत इसलिए गोली नहीं चलाती कि एक जान लेते हुए उसके हाथ कांपने लगते हैं. लेकिन अब किसी के हाथ नहीं कांपते. मीर तकी मीर कहते हैं- देख तो दिल की जां से उठता है, ये धुआं सा कहाँ से उठता है.

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