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मौत से भी ख़त्म जिसका सिलसिला होता नहीं.

अभी कुछ दिन पहले पेरू की राजधानी लीमा से कुछ ही दूरी पर एक बस पहाड़ी से नदी में गिर गई. जिससे तेरह बच्चों सहित बावन लोगों की मौत हो गई. ये बस पिछले शनिवार की रात सांता तेरेसा की प्रांतीय राजधानी से चला थी. अपने गंतव्य तक पहुँचने से पहले नदी में करीब छः सौ पचास फीट की गहराई में गिरी. इस दुखद समाचार को पढ़ते हुए मुझे सिलसिले से अनेक दुर्घटनाएं याद आने लगी. हमारे देश में हर महीने कहीं न कहीं इसी तरह बस खाई या नदी में गरती है और बड़ी जनहानि होती है. हम हादसे के समय उदास और दुखी हो जाते हैं लेकिन आदतन उसे जल्दी ही भूल भी जाते हैं. पेरू में जो बस नदी में गिरी थी उसमें सवार कोई भी यात्री ज़िन्दा नहीं बच सका. पेरू और हमारे देश सहित दुनिया भर के गरीब और विकासशील देशों के लोग बेहतर सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था न होने के कारण ज्यादातर ट्रक और ट्रेक्टर में सफर करते हैं. इन वाहनों से भी इसी तरह की दुर्घटनाएं होना आम बात है. गाँव के गरीब लोग ब्याह शादियों जैसे अवसरों के लिए भी अच्छे वाहनों का बंदोबस्त नहीं कर पाते हैं. उनकी बारातें ट्रेक्टर ट्रोलियों और जुगाड़ जैसे साधनों से सफ़र तय करती हैं. यात्री परिवहन के लिए अनुपयुक्त इन साधनों के साथ हादसे और मौत भी सफ़र करते रहते हैं. हम अपनी सीमित और बेदम परिवहन व्यस्था की बड़ी कीमतें चुकाने को मजबूर हैं.
 
धार्मिक यात्राओं पर जाने के दौरान इस तरह के हादसों की झड़ी लग जाती हैं. बहुत सारे हादसे इसलिए भी होते हैं कि यात्रियों के भारी दबाव में टूर ओपरेटर अपने ड्राइवरों के लिए पूरी नींद का इंतजार नहीं करते. वे ज्यादा मुनाफे के फेर में सीजन के हर दिन को कैश करना चाहते हैं. ईश्वर की आराधना के लिए कोई खास वक़्त का होना मुझे कभी समझ नहीं आता है. जो आपका प्रिय है, जो आपका आराध्य है उसका स्मरण हर समय किया जाना चाहिए. वह सर्वशक्तिमान कोई आम आदमी थोड़े ही है कि जिन दिनों उसका मूड अच्छा होगा तभी आराधना करने से प्रसन्न हो सकेगा. वह को सर्वव्यापी है, सभी कुछ उसी का है. हर क्षण भी. फिर क्यों हम कभी इस बात को नहीं समझ सकते कि उसकी हाजिरी के लिए खास वक़्त की दौड़ एक गैर ज़रूरी काम है.

लेकिन हमारा आराध्य हमारी परवाह नहीं करता है कि सुबह का अख़बार पढ़ते हुए और भयावह ख़बरों से निरंतर सामना होता रहता है. आन्ध्र प्रदेश के महबूबनगर जिले में एक निजी लग्जरी बस में आग लग जाने के कारण यात्री जिंदा भस्म हो गए. इस बस से पैंतालीस लोगों के जले हुए शवों को निकाला गया. हैदराबाद से करीब एक सौ चालीस किलोमीटर दूर राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या चौवालीस पर तड़के पांच बजकर दस मिनट पर बेंगलूर से हैदराबाद जा रही यात्री बस के ईंधन की टंकी पलेम गांव के समीप एक पुलिया से टकरा जाने के कारण फट गई. जिसके बाद उसमें आग लग गयी. इस आग ने कुछ ही क्षणों में पूरी बस को अपनी चपेट में ले लिया. हादसे के समय इस बस में पचास यात्रियों समेत कुल बावन लोग सवार थे. शव इस कदर जल चुके थे कि उनकी पहचान कर पाना मुमकिन न था. यह पता लगाना मुश्किल हो गया कि पीड़ित महिला है या पुरूष. इस तरह की ग़मगीन कर देने वाली खबर को पढ़ते जाते हुए हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं. हम कल्पना नहीं कर सकते कि बस की सीट पर सोया हुआ आदमी अचनाक से आग के फंदे में फंस जाये. वह असहाय इस हादसे में ज़िन्दा भुन जाये.
 
साल उन्नीस सौ अठ्ठासी में अमेरिका के केरोल काउंटी अंतरराष्ट्रीय सड़क मार्ग पर महबूबनगर वाले हादसे जैसा ही हादसा घटित हुआ था. इस बस हादसे का कारण था सामने से एक शराबी द्वारा अपनी गाड़ी भिड़ा देना. इस बस में सवार आधे से अधिक यात्री दुर्घटना स्थल पर ही मृत्यु के ग्रास बन गए थे. सामने से गाड़ी टकराने के कारण बाहर निकलने के लिए आगे का दरवाज़ा क्षतिग्रस्त होकर बंद हो गया था. इस बस में एक आपतकालीन निकासी की खिड़की थी. उसी खिड़की से बच्चों को बाहर निकला जा सका था. बचाए गए चौतीस यात्री भी बाकि यात्रियों की तरह ज़िन्दा जल कर खाक हो जाते अगर ये निकासी द्वार न होता. महबूबनगर की घटना और इस घटना में बड़ा सामंजस्य है. दोनों ही बसें इंधन की टंकी फटने के कारण लगी आग में भस्म हुई. इस बार की दुर्घटना सबसे भयानक है. सभी यात्री अपनी जान से हाथ धो बैठे. ये कैसी मृत्यु है, इसके दुःख को सोचना भी असंभव है. अमेरिका के बस हादसे के बाद एक संगठन से जन्म लिया. उसका नाम है मदर्स अगेंस्ट ड्रंक ड्राइविंग. इस संगठन को बनाने वाले सभी लोग बस हादसे में मारे गए लोगों के परिजन हैं. ये संगठन शराब पीकर गाड़ी चलाने के विरुद्ध सक्रियता से काम करने लगा. मेरी जानकारी के अनुसार इस हादसे के जिम्मेदार को दस साल और ग्यारह महीने जेल में बिताने पड़े. लेकिन हमारे देश में माना जाता है कि सड़क दुर्घटना का कानून बहुत लचीला है. अक्सर सड़क हादसों के दोषियों को उतनी सख्त सजा नहीं मिलती जितनी कि इन्सान की जान लेने वाले अन्य अपराधों के लिए दी जाती है. हमारी जान बहुत कीमती हैं. नागरिक राष्ट की धरोहर है. राष्ट्र की सबसे बड़ी पूँजी भी. इनकी सुरक्षा राष्ट्र का सबसे बड़ा ज़िम्मा है. जिगर मुरादाबादी कहते हैं- ज़िन्दगी एक हादसा है और ऐसा हादसा/मौत से भी ख़त्म जिसका सिलसिला होता नहीं.

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
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उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
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नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
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मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…