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उधर बकरे क़ुरबान, इधर बारूद

यहाँ से रेलगाड़ी मुनाबाव और फिर उससे आगे पाकिस्तान जाती है. मैं रेलवे स्टेशन पर एक लम्बे सन्नाटे के बीच दुबका हुआ बैठा था. एक काले रंग का कुत्ता किसी जासूस की तरह रेलवे ट्रेक की छानबीन करके एक ही छलांग में स्टेशन के प्लेटफार्म पर चढ़ आया. उसने मुझे पूरी तरह इग्नोर किया और पास से गुज़र गया. इसी तरह एक बच्चे ने छलांग लगायी और मेरी तरफ बढ़ने लगा. मैं उसे अपलक देख रहा था. बच्चे को ये अच्छा नहीं लगा इसलिए उसने इशारे से पूछा क्या?

एक ही छलांग में प्लेटफोर्म पर कैसे चढ़ जाते हो?
आराम से

मैं उसकी शान में ऐसा मुंह बनाता हूँ जैसे उसने कोई बहुत बड़ा काम कर लिया हो. वह मेरे पास रेलवे स्टेशन की बैंच पर बैठ जाता है. स्टेशन खाली. रेल महकमे के कामगार टहलते रहते हैं. पुलिस का जवान आधी नींद में स्टेशन को नापता हुआ गुज़र जाता है.

क्या नाम है?
मोहम्मद शोएब अख्तर
किसको लेने आये?
बकरे को
अच्छा कहाँ से आ रहा है?
नागौर से

मैं उसके हुलिए को देखने लगा. वह मेरे बेटे की उम्र का था. उसकी पेंट पर चीकट लगा हुआ था. उसके हाथों पर खुश्की थी. बाल उलझे हुए थे. पाँव के स्लीपर घिसे हुए थे.

तुम कैसे आये?

मैं चौंक गया कि एक बारह साल का लड़का मुझको तुम कहते हुए बात करता है. मैंने अपनी चौंक को छुपा लिया और कहा- मैं अपनी माँ को लेने आया हूँ.
और कौन आ रहा है ?
कोई नहीं
अकेली है?
हाँ अकेली
डोकरी को अकेले क्यों आने दिया, कहीं खो जाएगी

मैंने चाहा कि उसे बताऊँ इस डोकरी के बेटे पुलिस में अफ़सर, विश्वविध्यालय में अध्यापक और रेडियो पर बोलने का काम करने लायक हैं. ये इसी डोकरी के जाए हुए हैं. लेकिन मैं बात को बदलते हुए पूछता हूँ.

आप स्कूल जाते हो?
हाँ
कौनसी क्लास में
छठी
कौनसी स्कूल
राय कॉलोनी में पांच बत्ती के पास
खूब पढ़ते हो?
मैं सुबह दुकान जाता हूँ, फिर वापस घर, फिर स्कूल और शाम को फिर दुकान
इतना काम क्यों करते हो
मेरे पापा दारू बहोत पीते हैं इसलिए चाचा उनको दुकान पर नहीं आने देते तो मैं जाता हूँ
दारू पीना बुरा है?
ख़राब ही है
कैसे
पैसा डुबो देते हैं और काम करते नहीं
आप पियोगे
नहीं मैं नहीं पियूँगा... तुम पीते हो
हाँ मैं पीता हूँ
मत पिया करो घर बरबाद हो जाता है

मैंने सोचा कि बीवी की आत्मा इस नन्हे लड़के में प्रवेश कर गयी है. लेकिन तुरंत ही इसे ख़ारिज कर दिया कि बीवी कैसे किसी को हलाल करने का ख़याल लिए हुए, रेल में आ रहे बकरे का इंतज़ार कर सकती है. ये शोएब अख्तर ही है.

जोधपुर से आने वाली लोकल रेल आई. कुछ चहल पहल हुई और ज़रा सी देर में बुझ गयी. हम जिस रेलवे की बैंच पर बैठे थे उसकी पीठ वाली साइड में दो नार्थ ईस्ट के बीएसएफ के जवान आकर टिक गए. उनको रात ग्यारह बजे की गुवाहाटी जाने वाली रेल पकड़नी थी. उनके लिए ये रेगिस्तान अजूबा रहा होगा. इसी रेगिस्तान के रेलवे स्टेशन पर रेगिस्तान के दो लोग बातें कर रहे थे. एक मैं और दूसरा शोएब अख्तर.

दुकान में क्या करते हो ?
मुर्गा और मटन बेचता हूँ
आप मुर्गा काट लेते हो?
हाँ इसमें क्या है
इसमें एक बेक़सूर की जान चली जाती है
ये सब सोचने की चीज़ है, उसको खुला छोड़ो तो बिल्ली खा जाएगी

इसके बाद मैं चुप हो जाता हूँ. मैं उससे दूसरी तरह के सवाल करता हूँ. जैसे बहन अलग स्कूल में क्यों पढ़ती है. पापा जब काम नहीं करते तो क्या करते हैं. माँ कैसी है. वह कितना काम करती है. तुम जानते हो कि अच्छा पढने लिखने से मुर्गा काटने से आज़ादी मिल सकती है. अच्छे नए साफ कपड़े पहने जा सकते हैं.

वह कहता है मेरे नाना नागौर में रहते हैं. वहां पर पाडे यानि भैंसे काटने का बाज़ार है. मैं उधर जाता हूँ तो खूब मजा आता है. फिर ज़रा देर रुक कर कहता है.

हम बक़रीद पर एक क़ुरबानी करेंगे
अच्छा, कितने का बकरा
ये तीन हज़ार का होगा
तीन हज़ार तो बहुत बड़ी रकम है
अरे, तुमको नहीं मालूम, आज जो दो बकरे आ रहे हैं वे तीस तीस हज़ार के हैं

रेल आ नहीं रही थी और मैं खूब बेचैन हो गया. याद की अपनी सघनता होती है. हर याद का अलग वजन होता है. उसकी याद आते ही ऐसा लगता है जैसे कोई पत्थर सीने पर आ पड़ा है. इसी याद से बाहर आने के लिए मैंने कहा शोएब अख्तर साहब खूब पढ़ते जाना. ऐसा करने से ईद के दिन आप साफ कपडे पहने होंगे. आपका घर किसी कूड़े और बदबू वाली गली से दूर साफ़ जगह पर होगा. ज्यादा इत्र लगाने से गंदगी दूर नहीं हो जाती. गन्दगी को हटाने से ही गंदगी दूर होती है.

रेलगाड़ी आ गयी. आह प्यारी कालका एक्सप्रेस. इसका मुंह जब गाँधी नगर वाले फाटक को चूम रहा होता है तब कहीं जाकर ये अपनी पूँछ को रेलवे स्टेशन के भीतर तक समेट पाती है. मैंने माँ से कहा कि एक बारह साल का लड़का कहता है, डोकरी को अकेले न आने दिया करो. माँ कुछ नहीं कहती हंसती है. माँ को लगता है कि वह वाकई बूढी हो गयी है. मेरे पापा नहीं रहे वरना कितना सुख कायम रहता न? हर किसी के पापा होने चाहिए चाहे शोएब के शराबी पापा की तरह ही हों.

इसके बाद क्या हुआ मालूम है? गरीब भारत में लाख लाख रुपये कीमत वाले नीरीह बकरों की कुरबानी दी गयी. आज पता है, गरीब भारत के लोग धन को दुकानों में लुटा रहे हैं. सबकी मुंडेरों पर दीयों की जगह बिजली के बल्ब सम्मोहन बुन रहे हैं.

मैं ख़ुद को यकीन दिलाना चाहता हूँ कि एक गरीब देश का नागरिक हूँ. मगर हर तरफ पैसा है, तमाशा है. ईद चली गयी दिवाली भी चली जाएगी. उधर बकरे क़ुरबान हुए, इधर बारूद क़ुरबान हो जायेगा.

बधाई हो !!!

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यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

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भूल जाओ
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* * *

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* * *
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