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नहीं जो बादा-ओ-सागर

इन्हीं दिनों

वे फूल खिले नहीं, उस रुत

आदिम प्यास से बना रेगिस्तान

तुम्हारे सिवा कोई अपना नहीं है

उनींदे की तरकश से

तबेले का धुंधलका

कुछ बात और है कि...

मेरी मुट्ठी में सूखे हुए फूल हैं

देखा तो पाया कि शाम है

मिटा तो न दोगे ?