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आदिम प्यास से बना रेगिस्तान


रेगिस्तान समंदरों के पड़ोसी है मगर पानी नहीं है इसलिए ये रेगिस्तान हैं। मैं रेगिस्तान में ही जन्मा और फिर इसी के इश्क़ में पड़ गया। मुझे अगर कोई रेगिस्तान के किसी दूर दराज़ के गाँव, ढ़ाणी से निमंत्रण मिले तो मैं वहाँ जाने के लिए व्याकुल होने लगता हूँ। लोग हरियाली और समंदरों को देखने जाते हैं। मैं अपनी इस जगह की मोहब्बत में गिरफ्तार रहता हूँ। शोर और खराबे से भरी दुनिया में सुकून की जगहें रेगिस्तान के कोनों में ही मिल सकती है।

साल उन्नीस सौ पिचानवें की गर्मियों के आने से पहले के दिन रहे होंगे कि राज्य सरकार की ओर से एक जल परियोजना का उदघाटन किया गया था। पानी का मोल रेगिस्तान समझता है। इसलिए इस आयोजन का भी बड़ा महत्व था। इस कार्यक्रम की रिकॉर्डिंग के लिए जाते समय मैंने अद्भुत रेगिस्तान की खूबसूरती को चुराना शुरू कर लिया। रास्ते की हर एक चीज़ को देखा और उसे रंग रूप को दिल में बसा लिया। सड़क के दोनों तरफ बबूल की झाड़ियाँ थीं। जिप्सी के खुले हुए कांच से भीतर से आती हुई हवा बहुत तेज थी। गर्मी से पहले का मौसम था। सड़क निर्जन थी। कोलतार पर गिर कर परावर्तित होती हुई उगते सूरज की चमक रियर मिरर में चमक रही थी। हर एक दो किलोमीटर के फासले पर कोई एक दो वाहन नज़र आते और पल भर में हमसे दूर पीछे की दिशा में खो जाते। सड़क के पास उगी हुई बबूल की इन झाड़ियों के पार रेत के धोरे दिखते। रेगिस्तान में इस रास्ते पर या ऐसे ही किसी रास्ते पर चलते हुए कुछ दूरी पर घर भी दिखाई देते रहते हैं। 

जब हम शहर से बाहर आ चुके थे तभी ये अहसास भी अचानक साथ चला आया कि अब सुकून है। भीड़ का कोलाहल पीछे छूट गया है। असंख्य चेहरे, दुकानें, गाड़ियाँ, दफ़्तर जैसी चीज़ें जिस व्यस्तता को बुनती है, वे सब अब नहीं हैं। उनके न होने से आराम है। आंखे दूर दूर तक देखती हुई सोचने लगी कि कई बार खालीपन कितना भला हुआ करता है। त्वरित घटनाओं के कारण हमारी आंखे और मस्तिष्क निरंतर पहचान गढ़ने और क्रिया प्रतिक्रियाओं को समझने के काम में जुटे रहते हैं। यह अनवरत काम है। यही जागृत मस्तिष्क भीड़ से बाहर आते ही संभव है कि आराम मे आ जाता है। 

ये फसल का मौसम नहीं था इसलिए बालू रेत दूर तक पसरी हुई थी। उनका असमतल आकार किसी कुशल कारीगरी की बनाई हुई कला का बेजोड़ नमूना पेश कर रह था। खेजड़ी और कैर जैसे रेगिस्तानी पेड़ पौधे इस बियाबाँ को थोड़ा अलग रंग दे रहे थे। सड़क के किनारे कुछ दूर बसे हुये घरों के आस पास मवेशी दिख जाते और बड़ी दूरी बाद कोई सरकारी पानी की टंकी या फिर परंपरागत रूप से बनाए जा रहे पानी के टांके दिखाई देते रहते। इस मंज़र में कोई फेरबदल नहीं होता। बस ग्रामीणों की पोशाक में इतना भेद किया जा सकता है कि ये सिंधी से आए हुये लोग हैं या यहीं के बाशिंदे।

रेगिस्तान में और जहां कहीं मनुष्य की आबादी है। उन जगहों के नाम के साथ पानी के संकेत भी जुड़े होते हैं। गाँव और आबादी की पहचान में सबसे अधिक पानी, उसके बाद जानवर और फिर भूगोल का संकेत छुपा होता है। गाँव के नाम के आगे सर, पार और गफन का लगा होना इस बात का संकेत है कि वहाँ पर पानी की उपलब्धता है। जैसे रावतसर गाँव लगभग हर जिले में मिल जाता है। इसमें रावत के इतर सर का प्रयोग पानी की सूचना के तौर पर किया गया होता है। मैं जिस परियोजना के उदघाटन में जा रहा था, उसका नाम था, आरबी की गफन। यह भारत पाकिस्तान की सीमा पर दो लाख वर्ग किलोमीटर में फैले हुए थार मरुस्थल के बीच बसा हुआ गाँव. 

सिंधियों की आबादी वाला गाँव था और वे यहाँ बरसों से रह रहे थे। उनको सिंधी इसलिए भी कहा जाता है कि वे अपनी कला और संस्कृति के लिहाज से सिंध के नुमाईन्दे हैं। उनके अजरक वाले रंग, कोड़ियों वाली कला, रंगीन धागों के पेचवर्क के काम में सिंध मुसकुराता रहता है। वहाँ पर ऐसे ही परिधानों में सजे हुये गाँव के लोग थे। कुछ सरकारी मुलाज़िम थे। कुछ चुने हुये जनप्रतिनिधि थे। जलसा एक औपचारिक आयोजन था। एक बड़े रंगीन तम्बू के तले कुछ देर भाषण हुये और इसे एक उपलब्धि करार दिया गया। इसके बाद दिन का भोज भी था। इस दावत में हलवाई के हाथों की और दक्षिण के मसालों की तेज खुशबू बसी हुई थी।

मैं अपना रिकॉर्डर लेकर उस पंप हाउस तक पहुँच गया। एक बड़े हाल के भीतर बड़ी पानी फेंकने की मशीन लगी थी। यह मशीन बिजली से चलने वाली थी। वहाँ पानी की खोज नहीं की गई थी। पानी का पुराना कुआं था। कोई तीन सौ हाथ से से भी अधिक गहरा। इस पानी को आदम के वंशजों ने सदियों पहले खोज निकाला था। राज्य सरकार ने इस पर एक बिजली की मोटर रख दी है और एक पक्के कमरे का निर्माण कर दिया है। रेगिस्तान में एक गीली भीगी जगह पर अपना पहरा बैठा दिया है। ऐसा ही हाल हर जगह का किया जाता रहा है। मैंने गाँव वालों से पूछा कितना फायदा मिलेगा। वे कहने लगे कि अब पानी तेजी से खींचा जा सकेगा। मेहनत न करनी होगी।

मुझे गहरी उदासी हुई। जिन पुरखों ने पानी का मोल समझ कर एक एक बूंद बचाई थी। उसका मोल अब पानी को खींचने वाला कभी नहीं समझ पाएगा। यह कुदरत का सत्य है कि उसकी दी हुई संपदा का दोहन समझदारी से किया जाए तो ही वह सदा फलदायी हो सकती है। मैंने एक ग्रामीण से पूछा कि ज़मीन के अंदर क्या पानी की फेक्टरी लगी है? वह मेरे इस नासमझी भरे सवाल पर देर तक मुसकुराता रहा। यह उसका दोष नहीं था। हम सब जंगल, ज़मीन और पानी के रिश्ते को कभी समझना ही नहीं चाहते हैं। जो हमारे सामने है उसको दूह लेने के सिवा कुछ कभी सीखा ही नहीं है।

उस यात्रा के दस साल बाद इस सूखे रेगिस्तान में बाढ़ आ गई। यह जान कर आपको भले ही अचरज हो मगर अपने वाटर क्यूब्स को भरने का कुदरत का यही तरीका है। क्यूब माने धरती के अंदर पानी के लिए बनी हुई जगहें हैं। उनका भराव होता रहता है। कवास के पास के एक गाँव के बीच में कई सौ साल पुराना पानी का कुआं सारे गाँव की बाढ़ को पी गया। ये सब हमारे पुरखों का ज्ञान था। उन्होने मशीनों की जगह अपने परंपरागत साधनों की कद्र की और उनका रखरखाव कुदरत के परम मित्रों की तरह किया।

इसी अगस्त महीने के आखिरी गुरुवार को हिमालय का पानी रेगिस्तान के इस मुख्यालय तक पहुंचा। इसका भव्य लोकार्पण किया गया। यह इस रेगिस्तान के लिए बहुत बड़ी नेमत है। अब मीठा पानी पीने के लिए साल भर उपलब्ध रहेगा। रेगिस्तान में इससे पहले भी नहरों के जरिये सिंचाई की जा रही है। उन नहरों ने फसलों की उपज में आशा से अधिक का योगदान दिया है। लेकिन हम इस बात को याद नहीं करना चाहते हैं कि नहरी पानी के रिसाव और भराव से खेती करने लायक बहुत बड़ा भूभाग सैम के कारण बंजर हो गया है। कीटनाशकों ने कुदरत के व्यवहार और वनस्पतियों को बदल दिया है। विज्ञान और परंपरागत ज्ञान की ये बात हमें याद रखनी चाहिए कि रेगिस्तान के पारिस्थितिकी तंत्र को बरबाद करके यहाँ रहने वाले कभी सुखी न हो सकेंगे।

आरबी की गफन में मोटर से सींचे जा रहे पानी और नहर के जरिये शहर तक आ रहे पानी का मोल कौन समझेगा। इसका दुरुपयोग यहाँ की ज़मीन को कैसे ज़ख्म देगा, इसकी परवाह कौन करेगा। मैं विकास का पक्षधर हूँ। आदमी को सुखी करने वाली सभी योजनाओं का दिल की गहराई से स्वागत करता हूँ मगर आदमी के आलसी और स्वार्थी होते जाने के खिलाफ़ हूँ। मैं चाहता हूँ कि इस रेगिस्तान की खूबसूरती और जीवन के अनूठेपन पर कीचड़ न फैले। सुख से जीना है तो जाओ बस जाओ नदियों के किनारे। ये जगह तो कुदरत ने आदिम प्यास वाले और अकूत हौसले वाले आदमी औरतों के लिए बनाई है।
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सांध्य दैनिक राजस्थान खोजख़बर के लिए लिखा गया, असंपादित लेख। 
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[Image courtesy : trekearth.com]

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नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
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मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
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यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
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प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…