Skip to main content

तुम्हारे सिवा कोई अपना नहीं है


वे अलसाई नन्हीं आँखों के हैरत से जागने के दिन थे. बीएसएफ स्कूल जाने के लिए वर्दी पहने हुए संतरियों को पार करना होता था. उन संतरियों को नर्सरी के बच्चों पर बहुत प्यार आता था. वे अपने गाँव से बहुत दूर इस रेगिस्तान में रह रहे होते थे. वे हरपल अपने बच्चों और परिवार से मिल लेने का ख़्वाब देखते रहे होंगे. वे कभी कभी झुक कर मेरे गालों को छू लेते थे. उन अजनबियों ने ये अहसास दिया कि छुअन की एक भाषा होती है. जिससे भी प्यार करोगे, वह आपका हो जायेगा. लेकिन जिनको गुरु कहा जाता रहा है, उन्होंने मुझे सिखाया कि किस तरह आदमी को अपने ही जैसों को पछाड़ कर आगे निकल जाना है. 

मुझे आज सुबह से फुर्सत है. मैं अपने बिस्तर पर पड़ा हुआ सूफी संगीत सुन रहा हूँ. इससे पहले एक दोस्त का शेयर किया हुआ गीत सुन रहा था. क्यूँ ये जुनूं है, क्या आरज़ू है... इसे सुनते हुए, मुझे बहुत सारे चेहरे याद आ रहे हैं. तर्क ए ताअल्लुक के तज़करे भी याद आ रहे हैं. मैं अपनी ज़िंदगी से किसी को मगर भुलाना नहीं चाहता हूँ. उनको तो हरगिज़ नहीं जिन्होंने मुझे रास्ते के सबब समझाये. नौवीं कक्षा के सर्दियों वाले दिन थे. शाम हुई ही थी कि एक तनहा दीवार के पास चचेरे भाई ने अपनी अंटी से मेकडोवेल्स रम का पव्वा निकाला. मैंने अपने हिस्से का आधा पिया आधा गिराया. उस एक कडवी कसैली शाम ने ज़िंदगी भर की शामों को आसान कर दिया. भाई तुम मेरे बेहतरीन गुरु हो. तुम न होते तो मैं छत पर शामें गुज़ारने की जगह एक दिन दुनिया से भाग जाता. 

रेल पटरियों पर चलते हुए किसी का हाथ थाम लेने से पटरी पर चलना आसान हो जाता था. उन पटरियों ने सिखाया कि हाथ थाम कर चलना. पांचवीं क्लास में पढ़ने के दिनों उसी रेलवे स्कूल में एक दिन आठवीं क्लास की एक लड़की को लम्बे बालों वाले गवैये माड़साब के साथ देख लिया था. स्कूल के पार्क वाली साइड में खुलने वाली उस खिड़की के भीतर दिखते दृश्य में वे यकीनन देशगीत का रिहर्सल नहीं कर रहे थे. मैं इस मिस मैच पर बहुत उदास हो गया था. उस पार्क में मैं जिन व्हाइट रेलवे क्रीपर और बाकी रंग के सदाबहार के फूलों को देखने जाता था उनको देखना भूल गया. रेलवे स्कूल का वह दिन बहुत बुरा था. बुरे दिन अक्सर सबसे अच्छे गुरु होते हैं.

बहुत दूर के रिश्ते का या बिना किसी रिश्ते का एक बहुत बड़ा भाई था. दस साल बड़ा. चला गया है, अब कभी लौट कर नहीं आएगा. वह जितना ऐबदार था उतने ही उसके चाहने वाले भी थे. उसके दफ़्तर से कोई सामान लाना था. दफ़्तर सूना था और उसके पास का कमरा बंद था. मैंने बड़ी टेबल पर लगे कांच के ऊपर रखे हुए पेपरवेट को घुमाते हुए इंतज़ार किया. थोड़ी देर बाद भाई आ गया. मुस्कुरा रहा था. मैंने दूसरे दरवाज़े की तरफ देखा. भाई ने आँख मारते हुए कहा, तेरी दूसरी भाभी है. मालूम नहीं क्यों मैं बहुत देर तक मुस्कुराता रहा. उस दफ़्तर से घर तक पसरी हुई रेत पर चलते हुए मैंने चाहा कि अपने चप्पल उतार कर हाथ में ले लूं और नंगे पांव इस रेत पर दौड़ने लगूं. 

अख़बार के दफ़्तर में एक ट्रेनी साथ काम करने आई थी. दफ़्तर के बाहर, कमसिन उम्र की उस पहली मुलाकात में उसने इतने दुःख बयां किये और इस कदर रोई कि मैं उस रेस्तरां से भाग जाना चाहने लगा. उस दिन के बाद से अब तक घबराया हुआ हूँ कि हर लड़की के पास अनगिनत दुःख हैं और तुम उनके सैलाब में डूब सकते हो. बहक बहक कर चलने की जगह, बच बच के चलना. थेंक्यू रोने वाली लड़की कि बहक जाने को होता हूँ मगर संभल जाता हूँ. कई सालों बाद एक लड़की ने कहा. उस बेवकूफ लड़के के बारे में मत सोचो, जो मुझे यहाँ ड्रॉप करके गया है. हम अभी एक आईस्क्रीम खाते हैं, एक जूस लेते हैं. यही हो सकता था मगर आप सीख सकते हैं कि कटे हुए हाथों से बंधे हुए हाथ बेहतर होते हैं. मैं उस दिन से किसी को अपनी ज़िन्दगी से जाने नहीं देना चाहता हूँ कि बेवकूफ लड़के अक्सर रिलेशन्स को ड्रॉप कर देते हैं. 

एक बार पापा ने छोटे भाई से कहा. तुम कर सकते हो अगर तुम चाहो. ये दिन फिर से लौट कर नहीं आएगा. उसने कर दिखाया. वह राजस्थान पुलिस सेवा का अफसर हो गया. वह अपने काम करने के तरीके से अक्सर दोहराता है कि सिस्टम चाहे जैसा हो अपना ईमान कायम रखना. हाथ चाहे बंधे हो मगर बंधे हाथों से भी लोगों की मदद करना. ये सब भी उसे पापा ने ही सिखाया था. जन्म तो कोई भी दे सकता है. पिता होना अलग बात है कि उनके सिवा, वो हौसला और वो रौशनी कौन दे सकता है? पिता जितने पिता थे, उनसे ज्यादा गुरु थे. उन्होंने कुछ एक शब्दों में हमें सब कुछ दिया. सबसे छोटा एक भाई है. उसने बेहद अवसाद में दसवीं कक्षा पास की थी लेकिन कभी हताशा का ज़िक्र नहीं किया. उसने ख़ुद अपनी मंज़िलें चुनी. अकेले सारा रास्ता तय किया. वह इतिहास का एसोसियेट प्रोफ़ेसर है. मुझे उसने सिखाया कि भाई घबराना मत. वह अनेक विचारों से घिरा हुआ अपने काम में डूबा रहता है लेकिन जब कभी मुस्कुराता है तो मुस्कान से उपजी एनर्जी का वेग ऐसा होता है कि तमाम चिंताएं सिमट जाती है.

एक लड़की ने कहा था कि क्या फर्क पड़ता है, शादी के बाद कोई जीये या मर जाये? मैंने ख़ुद से कहा था फर्क पड़ता है. ये कह कर अच्छा किया. वह हर रात मुझे बचा लेती है हज़ार आफ़तों से, हर सुबह भुला देती है सारी शिकायतें. अनेक दोस्तों ने कहा था कि लिखो कि किताब चाहिए अपने बैड पर. उन्होंने लिखवाया. हर शाम फोन करके कहा. हाँ अवसम हो. वे दोस्त कभी भी किसी से मिले तो ज़िक्र यही होता है, केसी को पढ़ा है कभी ? ये पढो... रस्ते में पड़े पत्थर जिनसे ठोकरें खाईं. वे कांटे जिन्होंने खरोंचें दी. वे लोग जो दोस्त और प्रेम बनकर आये और अपने हित साध कर चले गए, ये सब मेरे गुरु हैं.

मैंने आवारगी और बेपरवाही में बिताये कई सालों से बुनी हुई चादर के नीचे पनाह पाई है. मैंने क्रांतिकारियों के गीत गाये. लाल रंग के परचम तले खड़े होकर यकीन को पाया. सीखा कि यही दुनिया है इसी को सुंदर बनाया जाना, सबसे बड़ा सच है. मैं एक खराब और बहिष्कृत कामरेड हूँ. मुझे दोनों ही स्थितियों ने सिखाया. मैं जो कुछ भी बना हूँ वह लोगों का बनाया हुआ है, मैं जो कुछ भी बिगड़ा हूँ ये मेरी ख्वाहिश है... लव यू डैड, माँ, मेरे भाइयों, बीवी और दोस्तों कि तुम्हारे सिवा कोई अपना नहीं है. हेप्पी टीचर्स डे. 

मैंने जो सीखा है, वह शायद तम्हें पसंद न आये मगर उदास न होना. 
***
[Image courtesy : Google search]

Popular posts from this blog

चुड़ैल तू ही सहारा है

रेगिस्तान में चुड़ैलों के कहर का मौसम है. वे चुपके से आती हैं. औरतों की चोटी काट देती हैं. इसके बाद पेट या हाथ पर त्रिशूल जैसा ज़ख्म बनाती हैं और गायब हो जाती हैं.
सिलसिला कुछ महीने भर पहले आरम्भ हुआ है. बीकानेर के नोखा के पास एक गाँव में चोटी काटने की घटना हुई. राष्ट्रीय स्तर के एक टीवी चैनल ने इस घटना को कवर किया. पीड़ित और परिवार वालों के इंटरव्यू रिकॉर्ड किये. कटी हुई चोटी दिखाई. बदन पर बनाया गया निशान दिखाया. गाँव के बाशिंदों की प्रतिक्रिया दर्ज की. पुलिस वालों के मत लिए. इसके बाद इसे एक कोरा अंध विश्वास कहा. घटना के असत्य होने का लेबल लगाया. टीवी पर आधा घंटे का मनोरंजन करने के बाद इस तरह सोशल मिडिया के जरिये फैल रही अफवाह को ध्वस्त कर दिया.
इसके बाद इस तरह की घटनाओं का सिलसिला चल पड़ा. बीकानेर के बाद जोधपुर जिले की कुछ तहसीलों में घटनाएँ हुईं. जोधपुर से ये सिलसिला बाड़मेर तक आ पहुंचा. सभी जगहों पर एक साथ पांच-सात स्त्रियों के साथ ऐसी घटनाएँ हुईं. उनकी कटी हुई चोटी का साइज़ और काटने का तरीका एक सा सामने आया. शरीर पर बनने वाले निशानों की साइज़ अलग थी मगर पैटर्न एक ही था.
बाड़मेर के महाबा…

मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।