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यूं भी किसी और सिम्त जाना था.

यात्रा वृतांत : अंतिम भाग

रेलगाड़ी में एक सीट की जुगत के लिए याचना भरी आँखों से देखने वाले यात्री, रेल की कामना से ही मुक्त हो गए थे. जितनी व्याकुलता एक शायिका पाने की थी अब उतनी अधीरता शायिका से उतर कर रेल कोच से मुक्त हो जाने को थी. रेल कोच के दरवाज़े पर यात्री इस तरह खड़े थे कि मोक्ष प्राप्ति में सूत भर की दूरी से चूक न जाएँ. जोधपुर से आये धार्मिक पर्यटन वाले यात्री हो हल्ला करते हुए सामान का ढेर लगा रहे थे. उनके सामान को देखकर लगता था कि वे इस गर्मी यहीं बसने वाले हैं. उनके सामान से प्लेटफोर्म के बीच एक मोर्चा बन चुका था. उसके पास से हम अपने ट्रोली बैग घसीटते हुए निकले. उखड़ी हुई ईंटों पर बैग उछल-उछल जाता मगर खुली हवा में आनंद था.

सुबह के पौने दस बजे थे. आसमान में बादल थे. हरिद्वार रेलवे स्टेशन पर आहिस्ता चलते हुए हम चारों एक दूजे को बारी-बारी से देखते. बादलों से कुछ एक बूंदें गिरीं. बेटे ने कहा- "पापा बारिश" मैंने उसका हाथ थामे हुए ही कंधे पर लटका बड़ा बैग सही किया और कहा- "बारिश नहीं बेटा. समुद्र मंथन के बाद गरुड़ अमृत घट को लेकर जा रहे हैं. उसी घड़े से कुछ बूँदें छलक रही हैं." बेटा मेरी ओर देखता है. उसकी प्रश्नवाचक दृष्टि को समझ कर मैं आगे कहता हूँ. "जिस तरह रेल गाड़ी में कन्फर्म सीट वाले योग्य और वेटिंग सीट वाले अयोग्य समूहों में आपसी खींचतान होती है. जिस तरह एक समूह दूजे को बाहर कर देना चाहता है और दूजा अनधिकृत रूप से कब्ज़ा बनाये रखना चाहता है ठीक उसी तरह देवताओं और असुरों के बीच समुद्र मंथन हुआ था. उस मंथन में एक अमृत का घड़ा निकला था. उस अमृत के घड़े को गरुड़ लेकर जा रहे थे. उससे जो अमृत की बूँदें छलकी थीं वे चार जगहों पर पड़ी. ये चारों जगहें अमृत से शुद्ध हो गयी. इन जगहों में एक हरिद्वार भी है. यहाँ आकर व्यक्ति की आत्मा को मुक्ति मिल जाती है."

बेटा कहता है- "ये तो बारिश की ही बूंद है" मैं हँसते हुए बैग को दूजे कंधे पर टाँगता हूँ और उसके साथ अपना हाथ बदलता हूँ. फिर आगे कहता हूँ- "यहाँ हर की पौड़ी नामक जगह है. वहां अपने दादा के दादा के दादा और उनके सबके दादा आते रहे हैं. वे यहाँ आकर अपने पुरखों को मुक्त कर देते हैं." बेटा पूछता है- "कैसे?" मैं देखता हूँ कि हम बातें करते हुए रेलवे स्टेशन से बाहर आ गए हैं. सामने एक रिक्शा वाले को कहता हूँ बस स्टेंड पहुँचा दो. रिक्शे में उसे बताता हूँ- "मुक्ति बहुत कठिन चीज़ है लेकिन मिल आसानी से जाती है. जैसे किसी पुरखे की राख़ को लाओ और उसे गंदले पानी में फेंक दो. जैसे रेल गाड़ी में कंडक्टर को दो सौ रुपया दो सीट कन्फर्म. कंडक्टर को रूपये देने के बाद भी हम उसके प्रति आभारी रहते हैं ठीक ऐसे ही राख़ को बहा देने के बाद किसी पण्डे को दान देकर उसके प्रति नतमस्तक हो जाते हैं."

बस अड्डे तक आये तो पाया कि किसी विधि विधान के अनुसार ही देश भर के बस अड्डे हैं. इन बस अड्डों का वातावरण आपको कहीं दूर चले आने का अहसास नहीं कराता. मैंने बस में बेहद कम यात्रा की है लेकिन जहाँ भी गया वहां पाया कि बस स्टेंड किसी दूसरे बस स्टेंड से होड़ नहीं करते. वे विलासिता के विरोधी होते हैं. उनको साफ सफाई का आडम्बर पसंद नहीं होता. उनके यहाँ यात्रियों के बैठने को लगी कुर्सियाँ कठोर तप साधना के उपयुक्त होती हैं. बस ऐसा ही था हरिद्वार का बस स्टेंड.

हमें तो आगे जाना था सो जल्दी बस में सवार हो गए.

सर्पिल रास्तों से गुज़रती हुई लो फ्लोर बस की गति ख़ुशी देती थी. रेल गाडी से छूट जाने का सुख ही बस को अच्छा बना रहा था. ये ख़ुशी कितनी देर टिकती. खिड़की के बाहर घाटियाँ और उनके भीतर से ऊपर की ओर उठती हरियाली मनभावन थी. सूखे देस को देखने की अभ्यस्त आँखें, इन दृश्यों को भरपूर क़ैद करती जाती. भूखे पेट बच्चे जी मचलने की शिकायत करते फिर बारिश की फुहारों में अपने कष्ट को भूल जाते. हाल आभा का भी कमोबेश ऐसा ही था. उसे यूं भी बस और चार पहिया वाहनों में सफ़र करना कभी रास नहीं आता. मैं उसके उतरे हुए चेहरे को देख रहा था. वह सरदर्द और उलटी कर देने के बीच के हालात में ख़ुद को रोके हुए थी. आधे रास्ते में फ़िर एक बार बारिश की फुहारें आई तो मन बदला लेकिन रास्ता कठिन से कठिन होता गया. बस बहुत से मोड़ों पर अचानक से रूकती. पहाड़ी रास्तों पर चलने की अनुभवहीनता के कारण हम हर बार अपनी सीट से लगभग गिर जाते.

मिथकीय, पौराणिक और ऐतिहासिक कथाओं वाला देहरादून आ गया था. हम थक गए, जी ख़राब रहा, सरदर्द हुआ लेकिन पहुँच जाने की ख़ुशी ऐसी थी जैसे रात भर के जागरण के बाद सुबह की आरती सुनकर इस उपक्रम से मुक्त हो गए थे.

पहाड़ के लोग भी रेगिस्तान के लोगों जैसे थे. बेफिक्र अपने काम में खोये. रास्ते ऊँचे नीचे थे लेकिन दिल समतल ही रहे होंगे. चाय की थड़ी हो या छोटे किराणा स्टोर उनके आगे रेगिस्तान की ही तरह इक्का दुक्का लोग बैठे हुए. उनकी पेशानी पर वैसे ही बल थे जैसे रेगिस्तान के लोगों के होते हैं. उन गलियों में चलते हुए कोई अजनबियत न थी.

हम पहाड़ तक घूमने तो आये ही थे लेकिन असल बात थी कि हमारे एक प्यारे से छोटे से बच्चे ने एक दिन अपनी इंजीनियरिंग की पढाई छोड़ कर सेना में जाने का फैसला कर लिया. उसके पास बेहतर अवसर थे कि वह एमबीए करता और किसी मल्टी नेशनल कम्पनी में काम करते हुए जीवन बिता देता. वहां उसके लिए सुख होता लेकिन उसने मुक्ति को चुना. आश्रित होने के भाव से आज़ादी चाही. पूना में अपनी ट्रेनिंग के बाद अब आईएमए से पास आउट होने का समय था.

हमारी खुशियों के लिए अलग मापदंड हो सकते हैं लेकिन मेरे और आभा के लिए ये ज़िन्दगी का अद्वितीय उपहार था कि कमीशन होने के वक़्त नवीन के कंधों पर लगे दो सितारों को अनवैल करना. सैन्य अधिकारियों और पटियाला कोच में सवार होकर आई महामहिम राष्ट्रपति की उपस्थिति में कदम कदम बढ़ाये जा... को सुनना हमें एक अलग दुनिया में ले आया था.

आर्मी ऑफिसर बने घुटे सर वाले काले पड़े नवीन से सैन्य अकादमी के बी गेट पर विदा लेते हुए सफ़र का रोमांच शिथिल हो गया. नवीन भैया कड़क सेल्यूट करके वापस अकादमी की ओर मुड़ गए. उनको जाता देखकर बच्चे बेहद उदास हो गए. आभा ने नम आँखों से कहा. "होने को तो कुछ भी हो सकता है..." मेरे पास इस बात का कोई जवाब नहीं था. सिवा इसके कि ज़िन्दगी इम्पोसिबल है और ख़ुशी का तरंगदेर्ध्य अपने पीछे गहन सन्नाटा छोड़ जाया करता है.

रात को पोलो बार में पार्टी करते हुए हम एक दूजे का हाथ थामे हुए कहते हैं. वी लव यू नवीन. एक दिन तुम 19 पंजाब को कमांड करोगे.

|| यात्रा असीमित है. हमारा होना यात्रा का रूपक, न होना यात्रा की स्मृति ||

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यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
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* * *

ये रंग
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* * *

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* * *
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