Skip to main content

म्यूजिक स्टूडियो में फ़िर आना, रुकमा

वे इस रेगिस्तान की मांड गायकी का आखिरी फूल थी. गुरुवार की सुबह एक अफ़साना बन कर शेष रह गयी है लेकिन उनकी खुशबू हमेशा दिलों में बसी रहेगी. मैं अब उनके बारे में सोचूंगा तो वे मुझे एक बड़े ढोल को थाप देती हुई दिखाई देगी. उनके भरे हुए लम्बोतर चेहरे पर सजी वक़्त की लम्बी लकीरें और काला-ताम्बई रंग याद आएगा. अल्लाह जिलाई बाई, रेशमा, मांगी देवी की परम्परा की इस गायिका का नाम रुकमा है. पोलियो ने दोनों पैर छीन लिए लेकिन वे गायिकी के हौसले से ज़िन्दगी के सफ़र को तय करती रही.

हर पर्व पर गफूर घर के आगे ढोल पर थाप देता हुआ ऊँचे स्वर में कुछ देर गाता और फ़िर कहता. खम्मा घणी हुकम किशोर जी साब रे बारणे बरकत है. ओ रुकमों रो डीकरो कदी खाली हाथ नी जावे... हुकम पचा रूपया में हाथ नी घातु एक सौ इक्यावन... और फ़िर कुछ गाने लगता. उसके कहे का अर्थ होता कि इस घर से बरकत है. रुकमा का ये लड़का कभी खाली हाथ नहीं जाता. मैं पचास रुपये नहीं लूँगा पूरे एक सौ इक्यावन... सब मांगणियार इतने ही मीठे और आदर सूचक संबोधन से सबको बुलाते हैं.

पिछली बार विवेकानंद सर्कल पर मिल गया. कहने लगा की माँ की तबियत ख़राब है. कल जोधपुर से वापस लेकर आये हैं. मैंने उससे वादा लिया कि वह कल आकाशवाणी आएगा. सोचा कि कार्यक्रम अधिकारियों को कहूँगा कृपया इसे रिकार्ड कर लें, कुछ मदद हो जाएगी. तबला का हाई ग्रेड में अप्रूव्ड आर्टिस्ट है. वो हर बार हाँ भरता लेकिन नहीं आता. मुझे वह हमेशा सुबह पुरखे भील के घर से निकलता हुआ दिखाई देता. अक्सर उसके सुर हमारे घर की दीवारों से छन कर आ जाते. बालकनी या छत से देखो तो कच्ची शराब के लिए मोहल्ले में लोगों के यहाँ कुछ गाता बजाता दिख जाता.

मुझे गफूर को देख कर अफ़सोस होता. कमाल का गायक और साजिंदा, अपने लहू में दौड़ती मुफलिसी की आग को शराब के हवाले करता है. ज़िन्दगी को बुझाने के इस तरीके पर असंख्य उपदेश दिए जा सकते हैं लेकिन यही ज़िन्दगी इतनी सितम ज़रीफ़ है कि दो वक़्त की रोटी के लिए आदमी को आदमी नहीं रहने देती. भूखे नंगे के गले में बसी हुई सरस्वती देर तक अपना आशीर्वाद नहीं बनाये रख सकती. उसके पास जीने का कोई साधन नहीं है. राजे महाराजे रहे नहीं, सरकार कोई इमदाद देती नहीं.

जिप्सी परिवारों के गायन से आमदनी के जो सुनहरे साल थे. 2008 की मंदी में डूब गए. यूरो और डॉलर की आमदनी का बड़ा हिस्सा कला के पारखी कहे जाने वाले बिचोलिये खा जाते मगर फ़िर भी जो बचता वह इनके लिए साल भर बिताने को काफी होता था. इधर कुछ बढती हुई आबादी ने भी अवसरों को कम कर दिया. इन सालों में रुकमा के दिन भी फाके करते हुए बीत रहे थे. पति उम्र के पहले पड़ाव पर छोड़ गए. पाँव में लकवा. खेती को उपजाऊ ज़मीन नहीं. विदेशों से डाक्यूमेंट्री बनाने वाले आते, महीना भर साथ रहते और मुफलिसी के गीत को फिल्मा कर लाखों में बेचते. रुकमा को मिलते कुछ हज़ार रुपये.

आस्ट्रेलिया से आई एडना बहुत समय से जिप्सी संगीत सीख रही थी. मुझसे कहती है. मैं गुरु जी के पैरों की धूल, आपको कुछ सुनाती हूँ. गाने लगती है. केसरिया बालम आओ नी पधारो म्हारे देस... मैं मुग्ध होकर उस विदेशी लहजे में मेरी अपनी धरती का गीत सुनता. मैं कहता हूँ. आपने बहुत अच्छा सीखा. वे रेत को छूती हुई कहती हैं. अच्छा ! बहुत धन्यवाद. उनकी छोटी आँखें शरमाते हुए मुस्कुराती हैं. मुझे ख़याल आता कि जब रुकमों विदेशों में गाकर कुछ देर रूकती होंगी तो जाने कितनी आँखें उनको अपने दिल में छिपा लेती होंगी.

कल उनके जाने की खबर के बाद टेप्स को खोजा. जो मिला उसे देख कर मैं भीगी आँखों से मुस्कुराया. 24 फरवरी 1998 की रिकार्डिंग थी. टेप क्यूशीट में मेरे हाथ से लिखी गीतों की डिटेल्स. अपनी इतने साल पुरानी लिखावट याद आई. रुकमा अपने साजिंदों के साथ पालथी मार कर म्यूजिक स्टूडियो में बैठी हुई दिखाई दी. उनके चेहरे पर वही सूफियाना नूर दमक रहा था. वह सुरीली आवाज़... जैसे मैं पूछता हूँ कि आप क्या गायेंगी ? और वे कहती हैं. किशोर साब कहें, क्या सुनेगे. मैं मुस्कुराता हुआ अतीत से लौट आता हूँ.

उसी रिकार्डिंग से एक गीत है. अरणी. इस गीत में अपने पीहर को याद करती हुई नायिका कह रही है. ओ माँ देखो अरणी पर कितने सुन्दर फूल खिल आये हैं. हरियाली चारों तरफ फूटने को है. ओ मेरे भाई, इस बार सावन की तीज पर ऊंट लेकर मुझे लेने आना भूल न जाना. ओ नौजवान ऊंट तुझे बिठाऊं झोक में. पीने को दूँ बाढ़ाणे की बरसात का मीठा पानी. तेरी मोरी में मोती जड़वा दूँ और करूँ पीतल का पिलाण. कसूम्बल रंग के धागों से तुझे सजा दूँ. बस इस सावन की तीज पर मुझे लेने आना भूल न जाना. अरणी पर खिल आये हैं सुन्दर फूल...

सावन की तीज आने में दस दिन बचे हैं और रुकमा सावन के लगते ही अपने पीहर के लिए इस ससुराल से सदा के लिए विदा हो गयी हैं.

* * *

इस गीत की wma फ़ाइल को mp3 में कन्वर्ट कर के एक दोस्त ने भेज दिया है. शुक्रिया ! अब आप इसे यहाँ सुन सकते हैं. इस लोक गीत को डाउनलोड करने के लिए नीले रंग के लिंक पर क्लिक करें. अरणी : रुकमा देहड़


Popular posts from this blog

मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…