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इन आँखों में भरी है सावन की बदरी

मुझे कुछ पुस्तकें प्रियजनों से उपहार में मिलती रहती है. अनियमित जीवनचर्या में वे महीनों तक किताबों की अलमारी में एक तरफ रखी रहती हैं. उस कोने को मैं न्यू एराइवल सेक्शन समझता हूँ. अभी मेरे पास तेरह नई किताबें हैं. इनके कुछ हिस्से पढ़ कर वैसे ही रख छोड़ा है. जाने ये कैसी आदत होती है कि एक ही वक़्त में एक काम नहीं कर पाता हूँ. जिस तरह कलगी वाले रंगीन पंछी अपनी पांखें साफ़ करने में दिन बिताते हैं. ज़िन्दगी की डाल बैठे हुए बारी बारी से कई सारी पांखों को अपनी चोंच से सही बनाते हुए दुनिया के हाल पर एक उचाट नज़र डाल कर, उसी काम में लग जाते हैं. मैं भी उनकी तरह बहुत सी पुस्तकों के अंश पढता हूँ और उन्हें वापस अनपढ़ी किताबों के बीच रख देता हूँ.

पिछले साल मैंने नास्टेल्जिया का बहुत आनंद लिया. इसमें प्रफुल्लचन्द्र ओझा 'मुक्त' के संस्मरणों का खासा बड़ा योगदान रहा. उनके संस्मरणों के संग्रह "अतीतजीवी" में एक सदी के जीते जागते, नामी किरदार चहलकदमी करते हैं. उस किताब के बारे में अगर कुछ लिख पाया तो इतिहास, दर्शन, मानवीय मूल्य, आत्मसम्मान, जिजीविषा जैसे अनेक टैग लगाने होंगे. गध्य मुझे सहज रखता है लेकिन अगर कोई मुझसे ये पूछे कि आधुनिक कविता की किताबें कैसी होती है ? तो मेरा पहला शांत और संकुचित उत्तर होगा कि वे बोर होती हैं. उनको पढ़ते हुए कई बार मैं सोचने लगता हूँ कि अब चारपाई से नीचे गिर जाऊं, या इस कुर्सी का पाया टूट जाये या फ़िर छत से कूद जाऊं या गली से गुजर रही मोटर सायकिल के पहिये में अपनी टांग अड़ा दूँ.. फ़िर ख़याल आता है कि इस कविता की किताब को फैंक दूँ और इसके बाद आराम आ जाता है. ये समय, इस दर्ज़े की बोर कविताओं का है.

अपने अस्तित्व और निजता से बेख़बर सामाजिक उथली पीडाओं के नारे लगाती, आत्मभर्त्सना या आत्मसंताप के महिमामंडन में जुटी हुई कविताएं ही मेरे पढने के हिस्से आ रही हैं. वे समकालीन जीवन यथार्थ की विसंगतियों को भूल कर राज्य के विनाशी तत्वों को कोसती है. वे लगावट नहीं अलगाव बुनती हुई है. बेसुरी कविताओं के इस समय में आत्ममुग्ध कवियों के ये उदघोष पढ़ते हुए कि सबसे बुरे समय में सबसे अच्छी कविता हो रही है. मेरा मुंह कसैला हो जाता है. इस बिगड़े हुए स्वाद का पहला कारण है कि मुझे कविता की समझ नहीं है. मैं पहले पठन में ये भी तय नहीं कर पाता हूँ कि इस कविता का प्रयोजन क्या है ? ये यश, अर्थ, ज्ञान, शिक्षा, अथवा सम्मान आदि में से किस हेतु लिखी गयी है. कवि अपनी दृष्टि से हमारे आवरण की जिस विद्रूपता अथवा ख़ूबसूरती को चिन्हित कर रहा है, वह मेरे लिए काला अक्षर भैंस बराबर है. इसलिए इन कविताओं के सपाट रास्ते से मन हट जाता है और तुरंत बाहर लुहारों की गली में ऊंघते हुए कुत्तों, पसरी हुई गायों, कंचे या गुल्ली डंडा खेलते हुए बच्चों, ताश के पत्तों में उलझे हुए अर्थशास्त्रियों और पानी के घड़े लिए औरतों को देखने लगता हूँ.

इन सालों में जिन कविताओं को सम्मानित किया जा रहा है एवं उनको सम्मानित करने वालों के नाम देख कर, मुझे अपने इस विचार पर बारम्बार विश्वास हुआ जाता है कि मैं कविता को पकड़ नहीं पा रहा हूँ. उसके तत्व, शिल्प और कथ्य, मेरी भोथरी और संकरी समझ में नहीं समा सकते. मैं कविताओं की पुस्तकों को नमन करता हुआ एक तरफ रख देता हूँ. ख़ुद के दिल पर हाथ रख कर इस विश्वास के साथ अलमारी से दूर हो जाता हूँ कि एक दिन मैं कविता को जरुर समझूंगा. फ़िलहाल कविता की शास्त्रीय आलोचना से अधिक एक रस भरी कविता का होना मुझे अधिक आनंददायी लगता है. मैं दायरों में कैद, सोचते विचारते हुए जी रहा हूँ. यह एक कबूतर की गुटर-गूं है और लौट कर उसी पाइप पर आकर बैठ जाना है, जिस पर से वह अभी थोड़ी देर पहले उड़ा था.

खैर पिछले साल रंजना भाटिया जी ने भी अपना कविता संग्रह उपहार में दिया. उसे टुकड़ों टुकड़ों में पढ़ा. साया शीर्षक वाले इस संग्रह को पढ़ चुकने के बाद इसके बारे में एक पंक्ति में कहा जा सकता है कि "बंद कमरे की खिड़की से आता एक चिड़िया का बेरहमी से स्वसंपादित गीत है, साया."
इस संग्रह को पढ़ते हुए मैंने पाया कि कविता व्यक्ति की सबसे अच्छी मित्र है. एकांत में उसके सबसे करीब होती है. खीज और अफ़सोस को बुहारने में मदद करती है. कई बार वह उस अच्छे दोस्त की भूमिका में भी आ जाती है जो आपको झूठा यकीन दिलाता है कि सब ठीक हो जायेगा. ये कविताएं मूलतः एक खूबसूरत डायरी है. इस संग्रह के आईने में साफ़ दीखता है कि रंजना भाटिया नितांत अकेली खड़ी हैं. उनका कोई साथी नहीं है. उनकी मित्र और पहली श्रोता उनकी नन्ही परियां है. जिनके लिए माँ यूं भी इस दुनिया का आखिरी सच हैं.

मित्र, कविताएं जीवन में उर्वरा का काम भी करती है इसलिए इनका दामन थाम कर रखना. अगली बार बात कुछ ऐसे कहना कि सुनने वाले का कलेजा फट पड़े.
इधर बरसात हो नहीं रही. उदासियों का 'बार' बंद है. दोस्त उलझनों में हैं. गीत की सावंत आंटी की लड़कियाँ आसेबज़दा होकर सत्रह साल की उम्र में भूतनी सी दिखाई दे रही हैं. ऐसे मौसम में, साया से कुछ कविताएं बिना अनुमति के यहाँ टांग रहा हूँ. आशा है कि जिसने किताब दी है, वह तीन छोटी कविताओं के लिए कोई तकाज़ा न करेगा.

१. अस्तित्व
रिश्तों से बंधी
कई खण्डों में खंडित
हाय ओ रब्बा !

२. नदी का पानी
एक बहता हुआ सन्नाटा
धीरे - धीरे तेरी यादों का...

३. सावन
चल ! प्यार का सपना
फ़िर से बुनें
इन आँखों में भरी है सावन की बदरी.

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
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उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
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प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…