July 29, 2011

इन आँखों में भरी है सावन की बदरी

मुझे कुछ पुस्तकें प्रियजनों से उपहार में मिलती रहती है. अनियमित जीवनचर्या में वे महीनों तक किताबों की अलमारी में एक तरफ रखी रहती हैं. उस कोने को मैं न्यू एराइवल सेक्शन समझता हूँ. अभी मेरे पास तेरह नई किताबें हैं. इनके कुछ हिस्से पढ़ कर वैसे ही रख छोड़ा है. जाने ये कैसी आदत होती है कि एक ही वक़्त में एक काम नहीं कर पाता हूँ. जिस तरह कलगी वाले रंगीन पंछी अपनी पांखें साफ़ करने में दिन बिताते हैं. ज़िन्दगी की डाल बैठे हुए बारी बारी से कई सारी पांखों को अपनी चोंच से सही बनाते हुए दुनिया के हाल पर एक उचाट नज़र डाल कर, उसी काम में लग जाते हैं. मैं भी उनकी तरह बहुत सी पुस्तकों के अंश पढता हूँ और उन्हें वापस अनपढ़ी किताबों के बीच रख देता हूँ.

पिछले साल मैंने नास्टेल्जिया का बहुत आनंद लिया. इसमें प्रफुल्लचन्द्र ओझा 'मुक्त' के संस्मरणों का खासा बड़ा योगदान रहा. उनके संस्मरणों के संग्रह "अतीतजीवी" में एक सदी के जीते जागते, नामी किरदार चहलकदमी करते हैं. उस किताब के बारे में अगर कुछ लिख पाया तो इतिहास, दर्शन, मानवीय मूल्य, आत्मसम्मान, जिजीविषा जैसे अनेक टैग लगाने होंगे. गध्य मुझे सहज रखता है लेकिन अगर कोई मुझसे ये पूछे कि आधुनिक कविता की किताबें कैसी होती है ? तो मेरा पहला शांत और संकुचित उत्तर होगा कि वे बोर होती हैं. उनको पढ़ते हुए कई बार मैं सोचने लगता हूँ कि अब चारपाई से नीचे गिर जाऊं, या इस कुर्सी का पाया टूट जाये या फ़िर छत से कूद जाऊं या गली से गुजर रही मोटर सायकिल के पहिये में अपनी टांग अड़ा दूँ.. फ़िर ख़याल आता है कि इस कविता की किताब को फैंक दूँ और इसके बाद आराम आ जाता है. ये समय, इस दर्ज़े की बोर कविताओं का है.

अपने अस्तित्व और निजता से बेख़बर सामाजिक उथली पीडाओं के नारे लगाती, आत्मभर्त्सना या आत्मसंताप के महिमामंडन में जुटी हुई कविताएं ही मेरे पढने के हिस्से आ रही हैं. वे समकालीन जीवन यथार्थ की विसंगतियों को भूल कर राज्य के विनाशी तत्वों को कोसती है. वे लगावट नहीं अलगाव बुनती हुई है. बेसुरी कविताओं के इस समय में आत्ममुग्ध कवियों के ये उदघोष पढ़ते हुए कि सबसे बुरे समय में सबसे अच्छी कविता हो रही है. मेरा मुंह कसैला हो जाता है. इस बिगड़े हुए स्वाद का पहला कारण है कि मुझे कविता की समझ नहीं है. मैं पहले पठन में ये भी तय नहीं कर पाता हूँ कि इस कविता का प्रयोजन क्या है ? ये यश, अर्थ, ज्ञान, शिक्षा, अथवा सम्मान आदि में से किस हेतु लिखी गयी है. कवि अपनी दृष्टि से हमारे आवरण की जिस विद्रूपता अथवा ख़ूबसूरती को चिन्हित कर रहा है, वह मेरे लिए काला अक्षर भैंस बराबर है. इसलिए इन कविताओं के सपाट रास्ते से मन हट जाता है और तुरंत बाहर लुहारों की गली में ऊंघते हुए कुत्तों, पसरी हुई गायों, कंचे या गुल्ली डंडा खेलते हुए बच्चों, ताश के पत्तों में उलझे हुए अर्थशास्त्रियों और पानी के घड़े लिए औरतों को देखने लगता हूँ.

इन सालों में जिन कविताओं को सम्मानित किया जा रहा है एवं उनको सम्मानित करने वालों के नाम देख कर, मुझे अपने इस विचार पर बारम्बार विश्वास हुआ जाता है कि मैं कविता को पकड़ नहीं पा रहा हूँ. उसके तत्व, शिल्प और कथ्य, मेरी भोथरी और संकरी समझ में नहीं समा सकते. मैं कविताओं की पुस्तकों को नमन करता हुआ एक तरफ रख देता हूँ. ख़ुद के दिल पर हाथ रख कर इस विश्वास के साथ अलमारी से दूर हो जाता हूँ कि एक दिन मैं कविता को जरुर समझूंगा. फ़िलहाल कविता की शास्त्रीय आलोचना से अधिक एक रस भरी कविता का होना मुझे अधिक आनंददायी लगता है. मैं दायरों में कैद, सोचते विचारते हुए जी रहा हूँ. यह एक कबूतर की गुटर-गूं है और लौट कर उसी पाइप पर आकर बैठ जाना है, जिस पर से वह अभी थोड़ी देर पहले उड़ा था.

खैर पिछले साल रंजना भाटिया जी ने भी अपना कविता संग्रह उपहार में दिया. उसे टुकड़ों टुकड़ों में पढ़ा. साया शीर्षक वाले इस संग्रह को पढ़ चुकने के बाद इसके बारे में एक पंक्ति में कहा जा सकता है कि "बंद कमरे की खिड़की से आता एक चिड़िया का बेरहमी से स्वसंपादित गीत है, साया."
इस संग्रह को पढ़ते हुए मैंने पाया कि कविता व्यक्ति की सबसे अच्छी मित्र है. एकांत में उसके सबसे करीब होती है. खीज और अफ़सोस को बुहारने में मदद करती है. कई बार वह उस अच्छे दोस्त की भूमिका में भी आ जाती है जो आपको झूठा यकीन दिलाता है कि सब ठीक हो जायेगा. ये कविताएं मूलतः एक खूबसूरत डायरी है. इस संग्रह के आईने में साफ़ दीखता है कि रंजना भाटिया नितांत अकेली खड़ी हैं. उनका कोई साथी नहीं है. उनकी मित्र और पहली श्रोता उनकी नन्ही परियां है. जिनके लिए माँ यूं भी इस दुनिया का आखिरी सच हैं.

मित्र, कविताएं जीवन में उर्वरा का काम भी करती है इसलिए इनका दामन थाम कर रखना. अगली बार बात कुछ ऐसे कहना कि सुनने वाले का कलेजा फट पड़े.
इधर बरसात हो नहीं रही. उदासियों का 'बार' बंद है. दोस्त उलझनों में हैं. गीत की सावंत आंटी की लड़कियाँ आसेबज़दा होकर सत्रह साल की उम्र में भूतनी सी दिखाई दे रही हैं. ऐसे मौसम में, साया से कुछ कविताएं बिना अनुमति के यहाँ टांग रहा हूँ. आशा है कि जिसने किताब दी है, वह तीन छोटी कविताओं के लिए कोई तकाज़ा न करेगा.

१. अस्तित्व
रिश्तों से बंधी
कई खण्डों में खंडित
हाय ओ रब्बा !

२. नदी का पानी
एक बहता हुआ सन्नाटा
धीरे - धीरे तेरी यादों का...

३. सावन
चल ! प्यार का सपना
फ़िर से बुनें
इन आँखों में भरी है सावन की बदरी.

आवाज़ के कुछ टुकड़े

के सी

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Kishore Choudhary is a poet and fiction writer from Barmer (Rajasthan). His writing career took a formal leap from his personal journals to make him a hugely popular blogger on two of his blogs- Kahaniyan and Hathkadh.

Having spent most of his formative years in the desert, the life there is his favourite canvas to contextualise his poetry and stories. His followers from across the world vouch for his realistic and authentic portrayal of the desert life and its typical dilemmas, fused beautifully and almost effortlessly with some stunning images of the desert and its folklore.

Kishore in a way pioneered the incorporation of pre-publishing interactions and feedback with his readers on his blogs and across social media platforms in his final works. His style is known for its lucid and unexampled metaphors that he exquisitely uses to express universal feelings like love, loneliness, hope, pain, longing and fantasy. 

His first collection of stories Chaurahe Par Seedhiyan (2012)was such a thumping bestseller that the first issue was sold out within 50 days of its launch.All the stories skilfully bring the rich and exotic background of the desert come alive and make the reader delve deeper into the layers of human emotions.This much sought after collection raised the bar for all contemporary Hindi works of short fiction and brought in a fresh change in the existing status quo for Hindi short stories. 

The second collection titled Dhoop Ke Aaiyne Mein(2013)had an array of short stories that looked at life through a multi-dimensional prism, lending each one of them a distinctive charm. Kishore being a poet first, his stories are more like poetic fiction. Having a great affinity to the stream of consciousness novels by English literary greats like James Joyce and Virginia Woolf his stories defy the conventional rules of a definitive beginning, middle and end. 

Kishore’s first publication was a collection of poetry Baatein Bewajah, an alluring and bewitching series of short poems which capture the vast expanse of human emotions and have images that have a rare haunting quality.

Kishore is a Radio Broadcaster by profession and has a special fondness for classical & folk music. Articles about him and his interviews are available across many major newspapers and websites. Kishore certainly is the Avant-garde flavour in contemporary Hindi writing and his ever expanding avid readership eagerly waits for his next chartbuster.

Kishore's latest is another collection called "Jaadu Bhari Ladki". This collection has his same imitable style of stories but the contexts and places are beyond the desert as well. 
His deep understanding of the complexity of modern relationships and how they play out in our minds, homes and workplaces makes it a very unique almost post-modern work in Hindi Fiction.

http://www.goodreads.com/author/show/7361739.Kishore_Chaudhary

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Hathkadh । हथकढ़

हथकढ़, कच्ची शराब को कहते हैं. कच्ची शराब एक विचार की तरह है. जिसका राज्य तिरस्कार करता है. इसे अपराध की श्रेणी में रखता है. राज्य अपने जड़ होते विचारों के साथ जीने की शर्तें लागू करता है. मेरे पास विचार व्यक्त करने का कोई अनुज्ञापत्र नहीं है. इस ब्लॉग पर जो लिखता हूँ, वह एकदम कच्चा और अनधिकृत है. मेरे लिए ये नमक का कानून तोड़ने या खूबसूरत स्त्री को इरादतन चूमने जितना ही अवैध है.

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