July 3, 2011

अमूर्त यादों से खिला रेत का समंदर


यात्रा वृतांत का दूसरा भाग.

बेलगाम
बढती हुई आबादी के बोझ तले दबे हुए चिंचिया रहे हिन्दुस्तान का एक छोटा रूप रेल के डिब्बे में समा आया था. मुद्रास्फीति के समक्ष घुटने टेक चुके भारतीय रुपये की तरह वातानुकूलन यन्त्र ने भी अपना असर खो दिया. मेरे देश के आवागमन की जीवन रेखा भारतीय रेल पर हर सैकेंड इतना ही बोझ लदा रहता है.

हमारे तीसरे दर्ज़े के इस डिब्बे की दो सीटों पर दस जानें फंस चुकी थी. इस गाड़ी में अगर दूसरा या पहला दर्ज़ा होता तो मैं अवश्य उन्ही को चुनता. मेरे बच्चे इन अतिक्रमणियों को देख कर नाखुश थे लेकिन हर गरीब मुल्क में आदम कौम का कायदा यही है कि वे पहले बहस मुबाहिसे में उलझते हैं और बाद में अपने सहयात्रियों को भोजन की मनवार में लग जाते हैं. मैंने अपने इसी एक छोटे से अनुभव से बच्चों को राजी कर लिया कि इनमें से कुछ की सीट्स अगले स्टेशन तक कन्फर्म हो जाएगी.

बाहर की तस्वीर में कोई खास बदलाव नहीं होना था कि कालका एक्सप्रेस के नाम से जानी जाने वाली ये रेल हिंदुस्तान के पूरे रेगिस्तान के बीच छः सौ किलोमीटर गुजरती है. बस एक जैसलमेर अलग छूट जाया करता है. मगर उसकी तस्वीर भी दिल में बसी रहती है. सत्यजीत रे को रेगिस्तान की अनंत मरीचिका में भी सशरीर खड़े जिस सोनार किले से मुहब्बत थी, उसकी छवि को मेहरानगढ़ फोर्ट फ़िर से याद दिला देता है. सफ़र है तो चीज़ें पीछे छूटती ही हैं, कुछ यादें भी कभी कभी छूट जाया करती है. खिड़की के पार छांग दिए गए पेड़ दिखते हैं. उन पर हल्की सी हरीतिमा फूटती हुई जान पड़ती है. मैदानी बालू रेत की जगह कुछ गहरे रंग की मिट्टी के सपाट खेत रेल के साथ होड़ करते रहते हैं.

बंद रेलवे क्रोसिंग के आते ही कारें, ट्रेक्टर और अधिसंख्य लोग दुपहिया वाहनों पर सवार दिखाई देते हैं. इनका पहनावा अलग है. सिंध के आस पास लुंगी और फ़िर इस तरफ बेहद ढीली धोती बांधी जाती है, जिसे हम तेवटा कहते हैं. अब वह लंगोट की तरह कस कर जांघों के बीच चली आई है. ये नागौर के पुरुषों का पहनावा है. नागौर का प्रचार कुछ इस तरह से किया गया जैसे यहाँ बैलों के सिवा कुछ खास कभी हुआ ही नहीं.

नागौरी बैल यकीनन कद-काठी में ऊँची और बेहद शक्तिशाली नस्ल है फ़िर भी मुझे नागौर का ये परिचय खास अच्छा नहीं लगता. हालाँकि दुनिया भर के सब हिस्सों की पहचान में कुछ जानवर जुड़े होते हैं. वैसे हमारी मालाणी की पहचान इससे ठीक लगती है कि मालाणी का परिचय घोड़ों के साथ दिया जाता है. राजस्थान की खारे पानी की सबसे बड़ी बरसाती नदी जो 'कच्छ का रन' में जाकर गिरती है. उस लूणी की नमक भरी रेत पर लोट कर बड़े हुए ये तुरंग, अरबी घोड़ों के बाद घुड़सवारों की पहली पसंद है.

अचानक मेरा ध्यान एक बुजुर्गवार पर गया. आप पतली पतली सी पुस्तिकाएं बाँट रहे थे. मेरा दिल धक कर के रह गया. मुझे लगा कि ये डिब्बा हाईजेक होने को है. अब बेसुरी आवाज़ों के सांप फन फैलाये हुए आयेंगे और हमें ज़िन्दा निगल जायेंगे. मेरे साथ ऐसा कई बार हुआ कि मैं धार्मिक यात्रा पर निकले समूहों के डिब्बों में फंस गया था. वे सस्ते फ़िल्मी गीतों पर इकलौते ईश्वर के भिन्न रूपों की सामूहिक ऐसी तेसी करते. वह बेसुरा क्रन्दन इतना प्रभावी होता कि मेरी सीट पर कीलें उग आती. मैं उठ कर डिब्बे के दरवाज़े पर चला जाता.

इस बार मेरे इस उतरे हुए चेहरे पर अचानक चमक लौट आई कि वे पुस्तिकाएं बच्चों के लिखी गयी नीति कथाएं थी. मैंने ख़ुशी की लम्बी साँस ली और उस ईश्वर के इन भक्तों का धन्यवाद किया कि ये असीम दया दिखाते हुए भजन दुपहरी शुरू नहीं कर रहे.

जारी...

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