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खुली जो आँख तो...



यात्रा वृतांत : छठा भाग 


साँझ और रात के मिलन की घड़ी में श्वेत-श्याम का वशीकरण अपने अधीन कर लेता है. रेल की पटरियों से परावर्तित होती जादुई चमक, सामान ढ़ोने के हाथ ठेले, वेटिंग लाइंस पर खाली खड़े हुए उदासीन डिब्बे, सिग्नल पर जलती हरी बत्ती, सौ मीटर दूर लाइन स्विचिंग केबिन का धुंधला सा आकार पानी में लहराती हुई तस्वीर सा झिलमिलाता रहता है. यात्री उतरते हैं और गुमशुदा सायों को रेलवे स्टेशन का हल्का प्रकाश फ़िर से नए रूप में गढ़ने लगता है.

रेल के अब तक के सफ़र में मुसाफ़िरी का तरल सामान ख़त्म ख़त्म हो गया. पानी, चाय, कॉफी और एनर्जी ड्रिंक यानि कुछ भी शेष नहीं. सूरतगढ़ स्टेशन आख़िरी उम्मीद की तरह था. हमारा कोच ठीक वहीं रुकता है. जहाँ भूपेंद्र खड़े हैं. कभी कभी ज़िन्दगी मुझे ऐसे ही चौंका देती है. ख़यालों में जिन जगहों पर दौड़ता फिरता हूँ, वे अचानक सम्मुख खड़ी होती हैं. भूले बिसरे हुए लोगों के कंधों को मेरी अंगुलियाँ छूने लगती है तो डेस्टिनी जैसी वाहियात बात पर दिल आ जाता है. मैं सोचता रहा कि सूरतगढ़ में भूपेंद्र जी मिल जायेंगे और हमारा कोच उनके ठीक सामने रुका.

बरसों बाद मैं उनको नाम लेकर पुकारता हूँ. वे अपने स्टाल से आँखें ऊपर कर के देखते हुए बाहर की दौड़ते हुए से रुक जाते हैं. कहते हैं अन्दर आ जाओ. लेकिन मैं उनसे तीन पानी की बोतल, एक चाय और दो कप गरम दूध मांगता हूँ. तीन बार डिब्बे में चढ़ता उतरता हूँ. ट्रेन के रवाना होने में आखिरी दो मिनट बचे हैं. वे स्टाल से बाहर आ जाते हैं. उस दोस्त के गले लगे हुए मैं अपने वेलेट से रूपये निकाल कर उनके सहयोगियों को दे कर मुड़ता हूँ. ट्रेन के चलने की विशल के साथ भूपेंद्र कहते हैं. किशोर जी ये बहुत गलत बात है.. और इस छोटी सी मुलाकात का आखिरी टाईट हग अपने दिल बसाये हुए, मैं डिब्बे की हत्थी पकड़ लेता हूँ.

डिब्बे में रात की हलचल है. डिनर के समय इस बार दिन के भोज की तरह मनवारें और खुशबू फेरे नहीं लगाती. अलबत्ता हमारे पास वाले कूपे में बाड़मेर से ही एक क्रिकेट कोच सफ़र कर रहे हैं. उनको विदा करने आये शख्स मेरे कॉलेज में स्पोर्ट्स ऑफिसर रहे हैं. वे उनसे कह रहे थे कोच साहब अपना ध्यान रखा. तो मुझे समझ आ गया कि ये ग्रीष्मकालीन शिविर में आये होंगे और अब वापस लौट रहे हैं. शाम के धुंधलके के साथ ही उन कोच साहब का वाशरूम एरिया की तरफ आना जाना बढ़ गया था. उनके इन बेचैन चक्करों से मैंने अंदाजा लगाया कि उनकी शाम रेल में ही संजीदा होने लगी है. वे एक पानी की बोतल लिए घूम रहे थे. ये साधारण पानी न होकर चैतन्य की ओर ले जाना वाला आसव रहा होगा. चौथे चक्कर ने कोच साहब को ज़मीन से एक इंच ऊपर उठा दिया था. उन्होंने अगली सुबह तक के लिए जीवन के तमाम दुखों को स्थगित कर लिया था.

कोच साहब हमारी सीट के पास आकर कहते हैं. मेरी बेटी को इडली बहुत पसंद है, क्या आप थोड़ी सी दे सकेंगे ? आभा आश्चर्य मिश्रित ख़ुशी से एक प्लेट उस बारह तेरह साल की बच्ची के लिए बना देती है. आभा उसकी माँ को भी ऑफर करती है. माँ मुस्कुराती हुई मना कर देती है. रात का हल्का भोजन करने के बाद जब मैं और बेटी वाश बेसिन पर हाथ धो रहे थे तब कोच साहब वहां खड़े हुए सिगरेट पी रहे थे. मैं सोच रहा था कि जिनको शराब पीनी हो उनको परिवार बनाना स्थगित रखना चाहिए. मुझे बेहद अफ़सोस हुआ कि एक व्यक्ति अपने परिवार के लिए आने वाले पल के बारे में कम सोचता है. उसे रेल में शराब साथ लाना याद रहता है लेकिन बच्ची के लिए खाना लाना भूल जाता है. मैं अपनी बेटी को कहता हूँ- "वह बच्ची अपने पिता के बारे में क्या सोचती होगी?" मेरी बेटी अपने हाथ को पेपर नेपकिन से पोंछती हुई कहती- "मेरी ही तरह उसे भी अपने पापा सबसे बेस्ट पापा लगते होंगे." एसी एरिया की तरफ बढ़ते हुए ख़याल आता है कि मुझ में कोच साहब की तरह जाने कितनी खामियां हैं जो बेस्ट पापा होने की फीलिंग में मुझसे कही नहीं जाती.

बैड रोल खुल गए. शोरगुल थम सा गया. पहियों का शोर जागने लगा. बातचीत के हलके स्वर डूबते गए. रेल सम्मोहन के दरिया में उतरने लगी. जिसका आलाप, विलंबित और द्रुत अपने आप में अनूठा था. संगरिया स्टेशन डेढ़ घंटे बाद आता है. यह इस रेगिस्तान का आखिरी स्टेशन है. सुबह छः बजे से हम रेगिस्तान में सात सौ पचास किलोमीटर का सफ़र कर चुके थे. मंडी डबवाली के आते ही रेगिस्तान सिर्फ़ एक ताज़ा याद बन कर रह जायेगा. वह रेगिस्तान जिसके नहरी इलाकों में बाहर से आये हुए लोग बसते गए. जहाँ पानी के उचित प्रबंधन और निकासी के अभाव में सैम (पानी के रिसाव से भूमि का दलदल में बदल जाना) ने खेतों को बंजर कर दिया. जिसकी सांस्कृतिक विरासत में सैम की ही तरह आधा पंजाब और देश भर के गरीब खेतिहर मजदूर समा गए. वो रेगिस्तान जो बोलियों का चिड़ियाघर है और राजस्थानी भाषा को एक सुरक्षित राष्ट्रीय अभ्यारण्य घोषित करने की पुकार लगा रहा है.

रात के ख्वाबों में फ़सलों से भरे खेतों वाला हरा पंजाब लहलहाता था. अजाने अँधेरे में सेल फोन की स्क्रीन पर फेसबुक एकाउंट था. उसमें सोलह साल पहले बिछड़ गयी एक दोस्त की फ्रेंड रिक्वेस्ट रखी थी. आँखों की कोर पर एक सवाल रखा था कि क्यों हम बिछड़ते और मिलते रहते हैं ? उसने मुझे खोजा होगा तब क्या सोचती होगी. ज़िन्दगी के अनिश्चित संगीत में कैसा आकर्षण है. अनचीन्हे और अनुत्तरित भविष्य के गर्भ से उम्मीदें क्यों बंधी रहती है. सवालों की कागजी नावें तैरती रही.

बंद दरवाज़ों और कांच वाली खिड़कियों को भेदती हुई सुबह डिब्बे में उतर आई. रात भर के आराम के बाद ताज़ा आँखों में हरे खेतों पर बादलों की रिमझिम थी. ओस से भीगे मौसम में घरों की छतों पर लगे हुए वेंटिलेटर सुबह से सवाल करते प्रश्नवाचक चिन्ह से थे. वे पूछते होंगे कि आज क्या तोहफा लाई हो ? मौसम बेहद नम और बहुत सुहावना था. रेत की तपिश से दूर ये एक हरे सपनों की जगह थी. जी करता कांच की इस खिड़की से हाथ बाहर कर सकें और बारिश को छू लें. सामने की सीट पर बैठे हुए डॉक्टर व्यास बेहद दयालु स्वभाव में निष्क्रमण कर चुके थे. डिब्बे में एंट्री के समय उनके हाव भाव में जो दर्प था उसे रात निगल चुकी थी. जोधपुर से आये यात्रियों को एक कॉफ़ी वाला मिल गया वे उससे चुहल कर रहे थे. मुझे बीस घंटे से कॉफ़ी नहीं मिली थी लेकिन मन हुआ नहीं कि यहाँ कुछ पिया जाये.

सात बजे थे. मैं अपनी शायिका से उतर कर वाशरूम की तरफ आ गया. 

जंग लगी लोहे की जंज़ीर से बंधा स्टील का पुराना डिब्बा औंधा पड़ा था. टॉयलेट के फर्श पर पानी और मिट्टी फैली थी. वेस्टर्न और इन्डियन कमोड्स की सीट्स को हिंदुस्तान के प्यारे बाशिंदे गंदा कर चुके थे. वाश सोप का डिब्बा खाली था और गुलाबी रंग का तरल साबुन हाथ धोने की जगह पर बिखरा पड़ा था. दीवारें अश्लील भित्ति चित्रों और आमंत्रणों से सजी थी. इस अश्लीलता के विरुद्ध धर्म के रखवालों ने कभी त्रिशूल दीक्षा नहीं दी, कोई फ़तवा जारी नहीं किया था.

यकीन मानिये मुझे एक मिनट में ही मितली आने लगी. मैं लघुशंका के बिना ही दरवाज़े को बंद कर के बाहर आ गया. आपको कभी इस विराट राष्ट्र में यात्रा करनी हो तो उस यात्रा के इतने टुकड़े करना कि "सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा" गाते रहें और गन्दगी से सामना न हो. सफ़र के इस पड़ाव पर मैं रेल के इस डिब्बे से मुक्त होना चाहता हूँ. चाहता हूँ कि मेरे बच्चे दो घंटे तक और सोये रहें नौ बजे जब हम हरिद्वार उतरें तब तक उनकी तकलीफें टाली जा सके.

अचानक मेरे पुरखों की मुक्ति के स्थल हरिद्वार का कच्चा प्लेटफार्म बारिश से भीगता दिखाई देता है. मैं ख़ुद से कहता हूँ कि मुक्त हुए अब ट्रोली बैग घसीटो, पांवों को चलने का हुनर याद दिलाओ, बच्चों के हाथ थामे हुए छब्बीस घंटे की रेल यात्रा को अलविदा कहो. अपनी राह इस भीड़ में खोजो. सुबह की साफ़ हवा को शुक्रिया कहो और चल पड़ो उस शहर की तरफ जिसका नाम देहरादून है.

जारी...

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यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

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भूल जाओ
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* * *

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* * *

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* * *
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