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तस्वीर अधूरी है मगर मिटी तो नहीं है


मेरे पास तुम्हें देने के लिए बहुत सारे प्रेम के सिवा ये कुछ ऊटपटाँग शब्दों के बेसलीका सिलसिले भर हैं।

तूने रुख फेर कर
रख ली है कूची जेब में
तस्वीर अधूरी है मगर मिटी तो नहीं है।
* * *

कुछ नहीं
बस चार बूंदें गिर रही हैं आसमान से।

मैं तोड़ रहा हूँ इनको
अनेक बूंदों में, अपनी बुरी नज़र लगा कर।

तुम्हारे लिए
हज़ार बार बुरा बन जाऊँ तो भी क्या बुरा है?
* * *

एक दरीचा है
एक दीवार का साया है
जैसे कोई पहरा हो, जैसे कोई बंदिश है।

कोई झाँक नहीं है, कोई आवाज़ नहीं है।

बस एक नाम है
और सुना है कि ज़िंदगी है बरसों लंबी।

अगर सचमुच बरसों चल सके ये ज़िंदगी
तो तुम ज़रूर आना कि इंतज़ार बना रहेगा।
* * *

मैं एक कागज से
काटता हूँ बोतल का गला
और उसे बना लेता हूँ काँच का प्याला।

एक दीवार को करता हूँ बाहों में क़ैद
उसकी पीठ पर लिखता हूँ बेवफाई
और कहता हूँ उसे कि लिखा है, प्रेम।

परछाई के आंसुओं को मिलाता हूँ
गाढ़े होते खून में
जो रिस रहा है मेरे होने की खुशी में
और भर लेता हूँ प्याला गहरे लाल रंग से।

अपनी जेब से निकालता हूँ सिक्का
और उसे बारूद बना कर उड़ा देता हूँ ग्लास का पेंदा।

फिर
ज़मीन पर रगड़ कर पेंसिल की नोक
एक ब्लेक होल बना कर कूद जाता हूँ उसमें।
* * *

बारिश की चार बूंदें, हवा के चंद झौंके
ज़मीं पर पाँवों की दस्तक है तो सही मगर फ़ानी।

लंबी चौड़ी सड़कें, इमारतों की छतें
हवाई जहाजों की आवाज़ें,
आदम के दिमाग ने तामीर की थी,
ये फैल गयी है पूरी दुनिया में।

दिल ने जो एक तस्वीर बनाई थी
वह उड़ गयी उत्तरी ध्रुव से भी आगे।

सीने में दर्द है
और झूठ ये कहते हैं खुद से कि संभल जाएंगे।
मगर तुझको अभी ये इल्म नहीं है कि सचमुच ही मर जाएंगे।
* * *

बदन पे जो खरोंचों के निशान हैं
बचपन के खेलों में बेखयाली के हैं
बाकी सब बचते बचाते, समझदार होने के दिनों में लग गए।

माथे पे जो शिकन की जो लकीरें हैं
कुछ दुनिया के साथ जीने की आफत की है
बाकी कुछ न कहे जा सकने वाले फ़सानों की लहरों की वजह से हैं।

ये जो चेहरे पर एक उदासी है
कुछ तो मौसम के असर में है
बाकी कुछ जो सोचा-चाहा उसकी गैरहाजिरी का नक्शा है।

एक रूह रूह नाम तुम रटा करते थे
जिसे मैंने न देखा न जाना
बाकी के सारे दर्द उसी के नाम कर दिये हैं, तुम्हारी बदौलत।
* * *

सूखी दरारों में रेंगता हुआ वक़्त
और खिड़की के शीशे पर ठहरा हुआ धुआँ।

बस एक विस्की का प्याला है, ज़िंदगी में सीलन भरने के लिए।
* * *

उतरती हुई धूप में
एक साया झिलमिलाता है
तुमसे लंबी तस्वीर बनती है मुझसे आगे।

मुड़ कर देखने में अब लगता है डर
हर बार उदासी का सदमा खाकर बुझ जाता है दिल।

मैं इसी छाया तस्वीर में
चुनता हूँ तुम्हारा बायाँ हाथ और थाम लेता हूँ
कुछ दूर ऐसे ही सही मगर चल सकूँ साथ तुम्हारे।

इस तस्वीर में नहीं मिलते तुम्हारे कान
जिनमें कह सकूँ, आहिस्ता
जाना ! रहा करो मेरे पास, तुम्हारे बिना दुनिया उदास है।

एक चिड़िया
मगर खोज लेती है जाने क्या
कि मेरे सर के पास से गुज़रती हुई,
अकेली ही गाती है, कोई दोगाना।

जैसे मैं अकेला ही चल रहा होता हूँ दो लोगों की तरह।
* * *


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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
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मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…