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तुमने देखा ही क्या है?

कीमियागरों से कुछ रसायन उधार लेकर, कुदरत का शुक्रिया कहते हुये एक बूढ़ा आदमी बना लेता है ज़िंदगी का आसव, बेहद कड़वा मगर मद से भरा। एक नौजवान लड़का उदास रहता है। सिर्फ इसलिए कि वह मुहब्बत को किसी दरवाज़े की चौखट की तरह खड़ा करना चाहता है। फिर उस तोरण से बार बार अकेला गुज़रना चाहता है। लड़की कहती है तुम खुश रहा करो और फिर सुनती है, लोकगीत से चुराई हुई उदासी से बना सस्ता लोकप्रिय गीत।

मैं न वो लड़का हूँ न उदासी सुनती हुई लड़की। मुझे उस रसायन के बारे में कुछ नहीं मालूम जिसे बूढ़ा आदमी बनाता है। मैंने अपने हिस्से में जो चुना है वह आला दर्ज़े का इंतज़ार है। कि इंतज़ार में समा सकते हैं अनगिनत लड़के, लड़कियां, बूढ़े और हज़ार रकम की चीज़ें। इसमें समा सकती है इस दुनिया जैसी अनेक जगहें जिनके बारे में अभी तुमने सोचा नहीं है। 

इस वक़्त आसमान में बादल हैं। हवा तेज़ है। पर्दे उड़ उड़ कर बालकनी में लगी लोहे की जाली को चूम रहे हैं। ये एक क्षणभंगुर दृश्य है। मैं इसे देखता हूँ और ये मिट जाता है। मुझे अचानक से एक याद आती है। जैसे हवा में कलाबाज़ियाँ खाता हुआ सिक्का होता है। उसका सच और झूठ एक भ्रम में घुला होता है। उसकी चित्त और पट के बीच का फासला वही मंज़र है जो इस वक़्त पर्दे के चूमने और लौट आने के बीच है।
 
एक आवाज़ सुनना चाहता था। एक अभिवादन के प्रत्युत्तर में कोई संकेत देखना चाहता था। अपने दीवानेपन की जद में कोई सहारा चाहता था। बिस्तर पर पेट दर्द से रोये पड़े हुये बच्चे का हाथ थामे हुये वक़्त से कहना चाहता था कि तुम दो फाड़ हो जाओ। एक तरफ अपने बेटे को प्रेम किया जा सके और एक तरफ जिस ज़िंदगी की ठोकरें हैं, उसी को तमीज़ से बोसे दिये जा सकें। 

शामें वैसी नहीं हैं। बीत गयी हैं। मन वैसा नहीं है, उदास कम और उदासीन ज्यादा है। शहर बदलने से कुछ नहीं बदलता। हर आदमी के पास अपनी एक झोली होती है। खुद को दी हुई बददुआओं से भरी हुई। 

पर्दे की तरह उड़ जाते हैं लड़की की देह से कई मौसम। वे उड़ते ही जाते हैं, जैसे मौसमों का छत्ता उसी की नाभि में लगा हुआ है। एक धुंधली तस्वीर बनाता हूँ। गहरे लाल रंग पर इरेज़र से बनाता हूँ कुछ रोशनी और फिर पेंसिल से बना देता हूँ, अफ्रीकी आदिम लोगों द्वारा बनाया जाने वाला सूरज का निशान। ऐसा निशान जो अपने आस पास कई सारे नन्हें सूरज गोल घेरे में लेकर उगता है। किसी के ख्वाब में उग सकने वाली श्याम स्त्री से अधिक काला और उसकी चाहना के उजले रंग से अधिक गोरा। 

वो एक लम्हा था। मैंने लिखने के हुनर से उसका स्केच बना लिया है। तुमको देखा ही नहीं है। हाथ की कलाई में घड़ी बांधना भूल गया हूँ। इस वक़्त की नब्ज़ को इगनोर करके चलता हूँ। सिक्स्थ सेंस के बारे में सुना है? वही सेंस जब कोई कहता है कि मैं तुमसे प्रेम करता हूँ और हमें लग रहा होता है कि ये इस वक़्त कोई और बात भी सोच रहा है। उसी सेंस ने मुझसे कहा है कि शराब पिया करो। अच्छे, बुरे, भले, कमीने, सुंदर, अमूर्त, कोमल, कठोर, गहरे और छिछले सब पल नाशवान हैं। 

आई लव यू। 

हाँ हवा अब भी चल रही है। पर्दे फिर से उड़ जाना चाहते हैं। तुमने उनको देखे नहीं न? तुमने देखा ही क्या है? अपने पाँवों को ज़रा सूंघ कर देखो कि उनमें मेरी खुशबू बसी है। तुम्हारी ठोकरे बेकार नहीं गयी हैं। तुम्हारे मन ने सुख और पाँवों ने मेरी खुशबू पायी है। वह बूढ़ा आदमी था नहीं बल्कि मैं होना चाहता हूँ। 

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…