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क्या याद दिलाएँगे मुझे मेरे सितमगर

मॉनसून के आने से पहले के बादलों ने ज़मीन पर कुछ फुहारें लिखी थी। गाँव और शहर के बीच का चौराहा भीगा हुआ था। सड़कों के किनारे पानी के आईने उतरे हुये थे। वे बेतरतीब ढंग से जमा पानी से बने थे। हवा बंद थी फिर भी मौसम में बरसे हुये पानी की नमी का ठंडा का अहसास, लोगों के चेहरे पर लिखा हुआ था। मैंने एक छोटी वैन में बैठे हुये तेज़ी से आबाद होते जा रहे शहर के नए मकानों पर कई बार सरसरी नज़र डाली। किन्तु हर तरफ भीग जाने के निशान ही देख सका। शायद मेरे सूखे मन को इन्हीं निशानों के आमद का इंतज़ार था। रेगिस्तान है तो यहाँ गरमी बेहिसाब आती है। वैन में बैठे हुये लोगों से ज्यादा लोग उसके पीछे या दरवाजों पर लटके हुये हैं। उनमें से कुछ विध्यार्थी थे, कुछ दिहाड़ी के मजदूर। शाम होने से पहले का वक़्त था। सूरज नहीं था मगर उसके होने के कई सारे अहसास थे। बादलों की ओट से रोशनी का झरना बह रहा था। इसे सबसे सुंदर मौसम कहा जा सकता था। सड़क के किनारे जमा पानी से गुज़रते हुये वाहन और खुद के कपड़ों को बचाकर चलते हुये राहगीर बरसात के दिनों की तस्वीर को मुकम्मल कर रहे थे।

महल गाँव और जयपुर शहर के बीच का ये चौराहा सात नंबर कहलाता है। ये एक छोटा सा बाज़ार है, जो कहता है। गाँव को शहर में बदले जाने और शहरों को भौतिकता की भूख का पिटारा बनाते जाने का वैश्विक कारोबार कभी बंद न होगा। आपको किसी भी नए बस रहे कस्बे में सात नंबर के चौराहे और वहीं कहीं राहुल सैनी मिल जाया करेंगे। उम्र बारह साल। कक्षा पाँचवीं। स्कूल सन फ्लॉवर इंगलिश मिडियम। एक ठेले पर रखे हुये मिट्टी के तेल से चलने वाले स्टोव के पास खड़े, ऑमलेट बनाते हुये। इस इलाके में निजी विश्वविध्यालयों की कतारें हैं। बहुत सारे बच्चे यहाँ पढ़ते हैं। वे ईयरफोन लगाए हुये, स्पाइक हेयर कट में शॉर्ट या कोई वेस्टर्न केजुयल पहने हुये घूमते मिल जाएंगे।

इन फैशन से पगे हुये लड़के लड़कियों के लिए पाँचवीं कक्षा में पढ़ने वाला राहुल बख़ुशी छील देगा गरम अंडे। एक ही देश में कितनी लेयर है।  एक लड़का कहता है- एक ऑमलेट बना दे। राहुल की नन्ही अंगुलियाँ अंडों की ट्रे से चुन कर दो अंडे हाथ में ले लेती हैं। अचानक से लड़के का मन बदल जाता है। वह कहता है- रहने से चार उबले हुये अंडे ही दे दे। उस लड़के को कहीं जाने की जल्दी है। मैं मुस्कुरा कर राहुल की इस भाव भंगिमा का समर्थन करता हूँ कि भाई जो चाहिए पक्का बोलो न। 

राहुल के हाथ अंडे के कवच को इस तरह आसानी से तोड़ कर अलग कर देते हैं जैसे नौकरों और मजदूरों की दिन भर की कमाई को मंहगाई तोड़ डालती है। कहाँ के रहने वालों हो राहुल? मेरे पूछने पर अपनी आँखों में किसी अनुभव की चाशनी के तार बांध कर कहता है। इधर बयाना के। अच्छा यहाँ कब से हो? पापा जयपुर चले आए फिर हम इधर ही रहते हैं। राहुल को बात करते हुये शायद अच्छा लगा होगा कि उसने स्टील के ग्लास में दो अंडों को फेंटते हुये कहा। पापा स्क्युरिटी गार्ड का काम करते हैं। इसलिए मैं इधर ठेले पर आ जाता हूँ। मैंने पूछा कब से बना रहे हो ऑमलेट? वह कहता है चार पाँच साल हो गए हैं। 


मैं राहुल की तारीफ करता हुआ कहता हूँ तुम बड़े समझदार बच्चे हो। अपने पापा की मदद करते हो घर चलाने में। कितने भाई बहन हो? राहुल के परिवार में मम्मा पापा और चार बहन भाई और हैं। राहुल आधे घंटे में केरोसिन वाले स्टोव पर दो अंडों वाले चार ऑमलेट बनाता है। हर एक के साथ चार ब्रेड सेकता है। शीतल पेय की प्लास्टिक की बोतल के ढक्कन पर छेद किया हुआ है। इसमें खाना पकाने का तेल है। हर बार तवे पर तेल को किसी फव्वारे की तरह लगाता है। मैं पूछता हूँ कि राहुल तुम स्कूल नहीं जाते? वह कहता है जाता हूँ न। अभी मेरी छुट्टियाँ हैं। इसलिए दिन में एक बजे आता हूँ नहीं तो दोपहर चार बजे। अपनी घुटनों तक मोड़ी हुई पेंट की ओर देख कर कहता है। आज बारिश आई और पानी भर गया न इसलिए मैंने अपनी पेंट को घुटनों तक ऊपर कर लिया है। मैं मुसकुराता हूँ। मुझे मुसकुराता देख कर उसके चहरे पर होठों के पास से एक स्माइल किसी तितली की तरह उड़ जाती है। 

वह ऑमलेट बना रहा होता है, मैं सोचता हूँ कि काश इसी तरह जब कभी दुख आए तब हम अपने अहसासों के पैरहन को घुटनों तक उठा सकें। ताकि दुखों से कम देर तक भीगा रहना पड़े। काश हम इसी तरह ज़िंदगी का रुख देख कर खुद को बदलते रहें। हम सीख सकें हालत को हेंडल करने का तरीका। मेरी इस सोच से बेपरवाह बारह साल का बच्चा ऑमलेट बनाता रहता है और सात नंबर पर दुनिया का कारोबार चलता रहता है। एक बच्चा घर चलाने के लिए अंडे बेचता है, एक चार बच्चों का बाप रात भर चौकीदारी करता है। बाप का मालूम नहीं मगर बच्चे के चहरे पर इफ़्तिख़ार इमाम सिद्धिक़ी का शेर लिखा है- क्या याद दिलाएँगे मुझे मेरे सितमगर,  हर नक़्श ए सितम खुद मेरे सीने पर लिखा है।

जाना, इस ज़िंदगी के आईने में कितनी सूरतें नज़र आती हैं। 

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…