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इस तरह भी क्या जाना

मैं एक चौबीस पन्नों का अख़बार लिए हुये छोटे टेम्पो के इंतज़ार में था। ये मिनी ट्रक जैसे नए जमाने के पोर्टबल वाहन खूब उपयोगी है। खासकर छोटी जगहों को बड़ी जगहों से जोडने के लिए। पहले डीजल इंजन सेट से तैयार किए गए जुगाड़ जिन रास्तों पर दौड़ा करते थे, आज वहाँ इस तरह के मिनी से छोटे ये ट्रक जुगाड़ को विस्थापित करने में लगे हैं। ऐसे ही एक टाइनी साइज़ के चार पहियों वाले टेम्पो के पीछे लिखा था-“मैं बड़ा होकर ट्रक बनूँगा” मेरे हाथ में जो अख़बार था उसके पहले पन्ने पर जो खबर थी, वह भी बड़े होते जाने और कुछ न बन पाने के डर की दुखद दास्तां से भरी थी। एक दिन पहले सुबह व्हाट्स ऐप पर एक दोस्त का संदेशा आया था। ज़िया खान नहीं रही। उसने फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली। मेरे मन में आया कि ये ज़रूर कोई बड़ी हस्ती की बात होगी जिसने समाज पर गहरा प्रभाव डाला होगा। वरना आजकल मौत इतनी मामूली चीज़ है कि लोगों इस पर ध्यान देना बंद कर दिया है। कोई दुनिया से गुज़र जाता है और हमारी आँखों में नमी नहीं आती। हम पल भर के लिए भी इस बात पर विचार नहीं करते कि एक सुंदर और कीमती जान ने इस दुनिया को छोड़ दिया है। 

मैं अख़बार के पहले पन्ने पर एक श्वेत-श्याम तस्वीर में दो चमकती हुई आँखें देखता हूँ। ऐसी आँखें जिनमें हजारों कहानियाँ छुपी हों। इतनी वाचाल आँखों का बुझ जाना मुझे उदास करता है लेकिन मैं अपने याद के रोज़नामचे में देखता हूँ कि असंख्य आँखें जाने कितनी ही वजहों से बुझती जाती हैं। उनका अफसोस और पल भर का मातम ही होता है। जब पहली बार संदेशा पढ़ा तब अचानक से अनगिनत लड़कियां याद आई जिंहोने इस तंत्र की दोगली ज़ुबान से व्यथित होकर आत्महत्या कर ली थी। दोगली ज़ुबान कहने का आशय ये है कि सिस्टम कहता है महिलाओं के ये हक़ और उनके पक्ष में ये कानून हैं। लेकिन अपने साथ गुजरे हादसों पर वे कार्यवाही होते हुये नहीं देख पाती और एक दिन अवसाद और हताशा में जीवन को ठोकर मार देती हैं।

ज़िया खान की मौत बड़े जलसे जैसा मातम इसलिए है कि रोटी और रोज़ी की चिंता से समाज और खबरों को दूर कैसे रखा जाए। हमारे पास पिछले महीनों की खबरों का बचा हुआ कोई असर है तो वह क्रिकेट में सट्टा और उसके अंतर्राष्ट्रीय संबंध हैं। इन खबरों को इस तरह से पेश किया जाता है जैसे भारतवर्ष का भविष्य इसी एक काम पर निर्भर है और यही हमारी उन्नति की सीढ़ी है। चीयर लीडर को लेकर सभ्यता के नाश का रोना रोने वालों के लिए रोटी कोई मुद्दा नहीं है। उनके लिए फैशन से समाज का पतन है किन्तु व्यवस्था में बढ़ते जा रहे भ्रष्ट लोगों से कोई खतरा नहीं है। ज़िया खान का जाना दुखद है किन्तु हर साल शिक्षण संस्थानों में जान देने वाली छात्राओं के लिए भी इसी तरह के नेशनल नेटवर्क पर प्राइम टाइम में कवरेज होना चाहिए। आत्महत्या करने वाली छात्रा के लिए भी यही समाज और इसके लोग उतने ही दोषी ठहराए जाने चाहिए। 


जिस तरह रुपहले पर्दे पर अपनी उम्र से तीन गुना बड़े अभिनेता के सामने एक आराम कुर्सी पर लज्जा और कामना से सिमट रही लड़की का दृश्य देखना हमें पसंद हैं, और जानकारों का कहना है कि यही क्लासिक भी है, तो इस रोशनी के संसार का अंधेरा एक बेजोड़ रूपक है। आपने इसी रुपहले संसार में रोटी और मकान की लड़ाई और सपने की आखिरी फिल्म कब देखी थी? यकीनन आप याद नहीं कर पाएंगे। इसलिए कि सिनेमा एक औज़ार है और इस औज़ार के जरिये वास्तविक सवालों को दरकिनार किया जा रहा है। हमारे सपनों की थाली से रोजगार को चुरा कर उसकी जगह स्विट्जरलेंड के मनोरम दृश्य रख दिये गए हैं। मुझे ज़िया खान की मौत का अफसोस है। उसके लिए अब कोई प्रार्थना नहीं कि जा सकती क्योंकि स्वर्ग और नरक यही दुनिया है। उसने जो मादक खवाब देखे वह उसके स्वर्ग में होने के दिन थे। उसने जो हताशा भोगी वह नरक के काँटों की चुभन थी। अब उसकी देह किसी भी अहसास से मुक्त है और समय के पहिये के साथ उसका क्षय होता जाएगा। एक नाम भर की स्मृति बाकी रहेगी। मैं स्टुडियो में होता तो फ़ैज़ को याद करते हुये रेडियो पर ज़िया के लिए एक गीत ज़रूर प्ले करना चाहता- ये सफर बहुत है कठिन मगर, न उदास हो मेरे हमसफर।
* * *
मैं ख़बरों की दुनिया में काम कर रहे दोस्तों के लिए कुछ लिखता रहता हूँ। ये दीना भा के लिए लिखा है। मित्रों इसका कहीं और उपयोग करने से पहले एक बार मुझसे बात ज़रूर कर लीजिएगा। 

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…