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तो उसकी दुनिया कहाँ गई?


चाय का प्याला लेकर घर के सबसे ऊपरी कमरे में चला आया हूँ। आसमान पर कुछ एक बादलों के फाहे हैं। मौसम कुछ ऐसा कि जैसे कुछ बरस ही जाए तो बेहतर। मैं इन दिनों खोये हुये होने के दुख से बाहर से खोये हुये होने के सुख की ओर निष्क्रमण चाहता हूँ। जगह वही रहे मगर हाल बदल जाने की उम्मीद हो। जैसे तुम्हारा हाथ दुख में भी नहीं छूटा और सुख के पलों में ऐसी कामना कौन कर सकता है कि तुम्हारा हाथ छूट जाए। 

मेरे दफ्तर जाने का समय सुबह नौ बजकर पचास मिनट का था। उस वक़्त मैं बालकनी में लेटा हुआ चिड़िया की चोंच वाले तिनके को और कभी बिजली के तार पर सुस्ताती हुई गिलहरी को देख रहा था। उस वक़्त के बाद मुझे बारह बजे दफ्तर जाना चाहिए था। लेकिन मैंने पाया कि उमस ज्यादा है और पत्ता गोभी को बच्चे पसंद नहीं करते इसलिए आभा के साथ खड़ा होकर बेसन के गट्टे छौंक लेने के लिए प्याज और मिर्च काटता रहा। 

फिर मैं अगर दो बजे भी पहुँच सकता तो भी दफ्तर मुझे बख़ुशी स्वीकार लेता। लेकिन मैं तब भी वाशरूम में लगी खिड़की से बाहर दिखती हुई जाल पर बैठी एक चिड़िया को देख कर सोचता रहा कि काश कोई मुझे सज़ा देकर इस तरह सलाखों के पीछे रख देता तो मैं उस लोहे की तासीर को जान जाता। मगर इस तरह बिना काम के बेवजह किसी खयाल में पड़े रहना और कहीं जाने की आज़ादी भी न होना कितना बुरा है। 

कल रात मैंने खुद से कहा कि खरगोश की कवितायें क्या हुई? कहा गयी उसकी जादूगर लड़की? क्यों खरगोश ने छोड़ दिया बेहिसाब शराब पीना और लोगों को आवाज़ें देना? मगर सवालों के सिरे हैं, ज़िंदगी का झूला है और बेखयाली की हिलोरें हैं। मगर जाना क्योंकर कोई एक खोयी हुई तस्वीर से उड़ते चूरे के बीच देखता रहे कि वक़्त आ रहा है या जा रहा है। 

मैंने अपनी इस चाय का आखिरी घूंट भर लिया है। सोचता हूँ कि तुम हो या चले गए हो? क्या मैं न पूछूँ तो जवाब भी न दोगे?

* * *

एक चुप्पे शख़्स की डायरी, कात रे मन कात और मायामृग की कवितायें। तीन किताबें है और कल की एक रात थी। वो जो बड़ा चाँद था एक रात पहले वह छोटा हो चुका था। चाँद भी फिर अधूरा रह गया। जैसे कि एक चुप्पे शख़्स की डायरी के आखिरी पन्ने पर लिखा है- हर डायरी की नियति है... अधूरा रह जाना। इसलिए अधूरेपन को माफ कर दिया। 

तुम्हारा अतीत बह गया और मेरा भविष्य। कितना उदास हाल है कि अब तुम मेरे सिवा कुछ न याद कर पाओगे मैं भूल जाऊंगा सब कुछ तुम्हारे सिवा। कात रे मन कात... मगर इस तरह अहसासों की डोर को उदासी की तकली पर और इस कदर कि मेरी उदासियाँ चाहिए तो उम्र लगेगी। 

जिस दुनिया में पैदा हुआ 
वह उसके पिता की थी 
जिसमें बड़ा हुआ 
वह बड़े भाइयों की थी। 
अब जीता है जिसमें वह बेटों की है। 

तो उसकी दुनिया कहाँ गई? 

मायामृग की कविता का टुकड़ा है। एक ऐसी खोयी हुई और अलभ्य दुनिया की तलाश है जिसके धरातल पर खड़ा होकर को कोई कह सके कि ये मेरी दुनिया है।मैंने कल रात एक प्रार्थना को बार बार सुना था। इतनी शक्ति हमें देना दाता कि मन विश्वास कमजोर हो न.... इसलिए कि मेरी दुनिया भी गायब है। मैं उसके बिना कमजोर हो रहा हूँ। मेरे लिए वह अलभ्य है और उसे पुकारने की हिम्मत जवाब दे रही है। 

प्रेम विघटन का नाम है। बिखरते जाने की क्रिया है। प्रेम आच्छादित है बिना तुम्हारे। सर पर तना हुआ है किसी न छूए जा सकने वाले भीगे शामियाने की तरह। जैसे आसमान एक तत्व है जिसे छुआ नहीं जा सकता है, मगर है.... 

शुक्रिया दोस्त इन किताबों के लिए।
* * *

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