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उनींदे रहस्य

शहर के बीच वाले कस्टम के पुराने दफ़्तर के आगे सड़क पर ट्रेफिक की उलटी दिशा में चलते हुए मैंने और संजय ने अचानक हाथ छोड़ दिए. एक ट्रक ने सीधे चलते हुए नब्बे डिग्री पर मोड़ लिया. मैं बायीं तरफ रह गया और संजय दायीं तरफ. मुझे लगा कि संजय सुरक्षित उस तरफ हो गया होगा. ट्रक सीधा कस्टम ऑफिस की दीवार से टकराया और रुक गया. उसके ड्राइवर का कोई पता न था. एक तहमद बाँधा हुआ आदमी, ट्रक के केबिन के ऊपर से तिरपाल उतारने लगा. वह उदास कम और उदासीन ज्यादा लग रहा था. उसने किसी प्रकार का दुःख या क्षोभ धारण नहीं किया था. संजय बिलकुल ठीक मुझसे आ मिला और हमने बिना किसी संवाद के उस ट्रक की ओर देखा.

दुर्घटना कुछ इस तरह घटित हुई जैसे ये होना पूर्व निर्धारित था.

उसी सड़क पर चलते हुए मैं अपने साथ किसी बारदाने को सड़क पर खींचता रहा. उसमें क्या सामान था, जो मुझे खींचने के लिए प्रेरित कर रहा था, ये मुझे समझ नहीं आया. कमल रेडियो के आगे से उसे खींचना शुरू किया था. किसान बोर्डिंग की बिल्डिंग जहाँ से शुरू होती है, वहां सड़क के बीच एक प्याऊ थी. वहीँ तक उसे खींचा. वह प्याऊ अपने गौरवशाली अतीत के साथ पुण्य के घमंड में सीधे तनी हुई खड़ी थी. उस तक पहुँचते ही मैंने वह बोरी जैसा टुकड़ा छोड़ दिया.

कुत्ते की लंबी हूक ने मेरा स्वप्न तोड़ दिया. उस कुत्ते का रोना किसी अनिष्ट के निकट आते जाने की चेतावनी जैसा था. इसी चेतावनी से घबरा कर या उससे सहमती जताते हुए कई कुत्तों के छोटे स्वरों की जुगलबंदी रात के माहौल में घुली हुई थी. मैं नीम नींद में डरा हुआ सा छत पर किये बिस्तर से उठ बैठा. मैंने देखा कि नगर परिषद ने जो हाई मास्ट लाईट लगाई है वह मेरे घर की छत की निजता को भेद रही है. मैं भारी आँखों से फिर लेट गया.

जब आँख खुली तो पाया कि कुत्ते शांत हो गए थे. अब कोई एक दो आवाज़ें रह-रहकर आ रही थीं. वे आवाज़ें सिर्फ अपने होने का संकेत भर थी. उनसे वह चेतावनी जा चुकी थी जो किसी अनिष्ट की ओर संकेत था. मेरी चेतना का अल्पांश लौटा तो सहसा ख़याल आया कि अक्सर जब रात की रेल जाने से पहले विशल देती है तब कुत्ते भी उसके साथ अपनी राग मिलाते हैं. एक सुख का कतरा उतरा कि ये किसी अनहोनी की नहीं वरन रेल के साथ तुकबंदी की कोशिश भर थी.

स्वप्न मुझे फिर से कहीं और ले गए. मैं उनको ठीक से याद नहीं रख पाया.

हम ऐसे लोगों को सपनों में देखते हैं जिनको नहीं जानते. अक्सर ऐसा होता है कि उस पूरे आदमी की कोई हल्की छवि ही देख पाते हैं. या उसकी शक्ल का एक हिस्सा भर याद रह पाता है. ऐसा कम होता है जब हम किसी पूरे जाने-पहचाने को देखें. मैं सोचता हूँ कि स्वप्न ही वह जगह है जो हमें हमारी इस भूल की ओर संकेत करती है कि भौतिक जान-पहचान का हमारा हिसाब बहुत एकतरफा है. जैसे कि स्वप्नों में अनजाने लोग ही सबसे ज्यादा उपस्थित होते हैं. जैसे कि जिस व्यक्ति से हमारा लगभग न्यूनतम या न के बराबर संवाद होता है, उसे हम अपने स्वप्न में उपस्थित पाते हैं. हम ये सोचते हैं कि इस व्यक्ति से कोई वास्ता नहीं मगर वह इस अजाने संसार में निकटतम रूप में उपस्थित होता है. हमें ये मान लेना चाहिए कि वह व्यक्ति हमारे साथ हैं मगर हमारी समझ सिर्फ भौतिक उपस्थिति को चीन्हती है. हम उस उपस्थिति को कभी चीन्ह नहीं पाते हैं जो चेतन मन के दूसरी ओर दर्ज़ हुई है.

मोनाली और मेरा परिचय इतना कम है कि मुझे साल भर उसकी कोई खबर नहीं होती न उसे कुछ मेरे बारे में मालूम होता है. सिवा पढ़ने लिखने के कोई ऐसा कारण नहीं है जो हमें आपस में जोड़ता हो. अभी कुछ महीने पहले मोनाली ने एक सपना देखा. मैं और आभा एक छोटे बच्चे के साथ हैं. वह बच्चा खूब बीमार है. उस बच्चे के साथ होने के वक्त हम दोनों की मनोदशा क्या थी, ये मोनाली ने लिखा नहीं. लेकिन मोनाली ने जैसे ही उस बच्चे को अपनी गोदी में लिया, वह बच्चा खिल उठा. बच्चा स्वस्थ हो गया और मुस्कुराने लगा. मोनाली ने पहले भी ये पढ़ा होगा कि मैं अक्सर सपनों को अपने ब्लॉग पर लिखता हूँ. मैं कोशिश करता रहता हूँ कि सपने याद रखे जाये और उनको ठीक ठीक लिखा जाये. मोनाली के इस स्वप्न के बाद मैंने कुछ खास नोटिस नहीं किया कि घटनाक्रम में कोई ध्यान देने योग्य बदलाव आया हो. लेकिन वह स्वप्न मेरे साथ है.

रेत कोमल है और आपके तलवे नहीं छीलती मगर उसपर आगे बढ़ने में अधिक परिश्रम करना पड़ता है. पहाड़ सख्त है और हम आसानी से कदम जमाकर आगे बढ़ जाते हैं किन्तु बहुत जल्दी हमारे पैरों के तलवे कच्चे पड़कर हमें आगे बढ़ने से रोक लेते हैं. वस्तुतः जो कुछ भी है, वह दुधारू है. उसकी दो परतें हैं. उसके दो परिणाम हैं. इकहरा कुछ नहीं है. लेकिन भौतिक चीज़ों से इतर स्वप्न सबसे अद्भुत है. मेरे पापा को मालूम नहीं मनोविज्ञान में क्या रूचि रही होगी कि हमने जब से समझना शुरू किया तब से अपने घर में सिगमंड फ्रायड की किताब को पाया. उसी किताब में स्वप्नों का मनोविज्ञान वाला हिस्सा मैंने बहुत बार पढ़ा है. वह किताब घटनाओं और परिणामों के साथ उस अदृश्य को भी सिखाती है जो घट रहा मगर देखा नहीं जा रहा. परिणाम आ रहे हैं किन्तु अनुभूत नहीं किये जा रहे हैं.

स्वप्न एक मीठा शब्द है. इसी मीठे में मधुमेह जैसा डर भी शामिल है.

कुछ साल पहले मोनाली एक कहानी लिख रही थी. उस कहानी को लिखा जाना उस समय की जरूरत थी. कहानी के पहले तीन चार चेप्टर पढकर ही ये समझा जा सकता था कि अनुभूतियों के आवेग कितने तीव्र हैं. वे सतही घटनाएँ जो सबके साथ घटती हैं, वे ही सबसे अलग असर छोड़ रही हैं. वे इस तरह सामने आती हैं कि आप जानते हैं ऐसा कुछ होने को है और उसकी प्रतीक्षा बनी रहती है. जिन कारणों से उसने इस सुन्दर धारावाहिक कहानी का आगाज़ किया था उन्हीं कारणों के ज़रा बदलते ही वह कहानी रुक गयी. उसे समेट लिया गया. तब मैंने उसके स्वप्न के बारे में ये सोचा था कि हो सकता है मोनाली जिस हाल से प्रेरित होकर कहानी लिख रही थी वह हाल अब कभी लौट कर न आएगा. जबकि वह कहानी स्वप्न से दो साल पहले ही बंद कर दी गयी थी.

मैंने कुछ रोज पहले लिखा था कि जो बात आज लिखने लायक नहीं है उसे कल भी नहीं लिखा जाना चाहिए. इस वाक्य को मैंने जांचा परखा था कि परिस्थितियों और काल के अनुसार हर चीज़ और संबंध बदल जाता है. जिस प्रकार किसी अबोध बालक के लिए सन्यास अनुचित है, समझ आने पर वह उसके लिए उचित भी हो सकता है. इसी तरह कुछ भी समसामयिक नहीं होना चाहिए. जब जैसा समय और ज़रूरत हो उसे वैसा होना चाहिए. हमारे जीवन की भोर होती है तो सांझ भी होनी चाहिए. हम एक आशा की तरह इस संसार में आने वाले हैं तो हमें एक स्मृति में ढलकर इस संसार से चले जाना भी होगा. लेकिन मैंने जो बात कही उसका आशय ये था कि आज आप अगर अपने दुखों, उदासियों और खुशियों के बारे में नहीं लिखना चाहते हैं तो भविष्य में इस आज को नहीं लिखना चाहिए. इसलिए कि उस वक्त लिखा जाने वाला आज एक अनुभव और कल्पना भर हो सकता है किन्तु यथार्थ से परे का. जो हम अब भोग रहे हैं वह अभी लिखा जाये या न लिखा जाये. बाद में लिखी गयी चीज़ें कोरे उपदेश मात्र होती हैं.

स्वप्न जीवन में बदलाव के संकेत होते हैं. मैं एक आम आदमी की तरह जादुई विशेषताएं प्राप्त करना चाहता हूँ लेकिन ये इतनी मामूली है जैसे कि अपने सपनों को कभी समझ सकूँ. 
* * *

[Watercolor Painting Courtesy : Sunga Park - Korea]

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
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मेरी आँखों में
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नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
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मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…