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तुमसे कभी नहीं मिलना चाहिए था

बेचैनी के पांव नहीं थे। उसके आने की आहट नहीं सुनाई दी। आहिस्ता से हर चीज़ का रंग बदलने लगा। कमरे में खालीपन भरने लगा। पेशानी में और बल पड़े कि शायद बालकनी में भी एक चुप्पी आ बैठी होगी। तुम एक लकीर की तरह होते तो भी मिटाया न जा सकता था। कि तुम्हारे होने को अंगुलियां किस तरह छूती।

कोरे मन पर एक स्याह लकीर को छूना सबसे अधिक डरावना लगता है।

न इंतज़ार, न कोई आमद का ख़याल कि सब कुछ ठहरा हुआ। दुख भी कुछ नहीं। बस एक ठहरी हुई ज़िन्दगी। छू लो तो जाने किस जानिब चल पड़े, यही सोच कर अंगुलियां आपस में बांध ली।

आवाज़ के नन्हे टुकड़े फेंकती एक चिड़िया के फुर्र से उड़ जाने के बाद गिलहरी की लंबी ट्वीट से सन्नाटा टूट गया। एक सिहरन सब चीजों पर उतर गई। दोपहर का एक बजा होगा। शायद एक।

ये किस मौसम की दोपहर है। हल्की धूप है। कमरे में सर्द सीली गन्ध है। गुनगुनी छुअन वक़्त में कहीं नीचे दब गई है। अपने घुटने पेट की तरफ मोड़ते हुए लगता है कि मेरा होना थोड़ा और सिमट गया है।

कि अब खालीपन कम-कम छुएगा।

खिड़की से दिखते पहाड़ पर सब्ज़ा उग आया है। काश ऐसे ही इस अकेलेपन को भेदते हुए किसी आवाज़ के बूटे उग आएं। बेजान मन दो कदम दरवाज़े तक जाकर जूते देखने लगा। उनका रंग उड़ गया है या बारीक गर्द ने ढक लिया है।

थप-थप...

हवा में कोई बेचैनी फिर से उड़ी। सांस न लेने के लिए ख़ुद को रोक लिया। एक पत्थर की तरह कुछ पल खड़े रहकर जूते नीचे रख दिए। वाशरूम की दीवारों पर पीलापन पसर रहा है। सर पर गिरता पानी खालीपन को भर रहा है।

अचानक। घुटन के फंदे से बाहर आने को हाथ शॉवर को बंद करने के लिए दीवार को बेतरह छूते हैं। बिना हलचल की छटपटाहट पीछे की दीवार की ओर धकेल देती है। एक लंबी और डरावनी सांस आती है। दिल की धड़कन लम्बी सांस के सबसे ऊंचे शिखर पर अटक जाती है। शॉवर से पानी गिर रहा है।

मुझे तुमसे कभी नहीं मिलना चाहिए था।

कभी नहीं।
* * *

कहानियां कहना अच्छा होता है कि बहुत सी बातों को हम कहानी कहकर छिपा लेते हैं। देर तक किसी के सामने मुस्कुरा सकते हैं। उसी खालीपन में लौट जाने से पहले।

[Painting image courtesy : James McNill Whistler]

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नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…

मन में छुपे बुलावे

टूटे पंख की तरह  कभी दाएं, कभी बाएं  कि कभी हवा में तैरता मन। 
आँखें पास की दीवार, छत, पेचदार सड़क या खुले आसमान की ओर रह जाती है जबकि मन चुपके से कहीं दूर निकल जाता है। मैं उसी जगह बैठा हुआ पाता हूँ कि खोया हुआ मन जहां गया है, वह कोई चाहना नहीं है। मन का जाना ऐसा है जैसे वह निरुद्देश्य भटक रहा है। 
मैं उसे पकड़कर अपने पास लाता हूँ। उसी जगह जहां मैं बैठा हूँ। वह लौटते ही मुझे उकसाता है। अब क्या करें? मैं भी सोचता हूँ कि क्या करें? कुछ ऐसा कि नींद आ जाए। थकान आँखें बुझा दे। कोई मादक छुअन ढक ले। कोई नशा बिछ जाए। ये सब हो तो कुछ ऐसा हो कि जागने पर नींद से पहले का जीवन भूल सकें। 
यही सोचते, मन फिर बहुत दूर निकल जाता है। * * *
पर्दा हल्के से उड़ता है  जैसे कोई याद आई और झांककर चली गयी। 
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कभी-कभी हम इस चाहना से शीघ्र मुक्त हो जाते हैं और कभी हम सोचने लगते हैं कि किस तरह उसे बुला लिया जाए और साथ ही ये भी न लगे कि हमने बुलाया ह…