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तुममें ऐसा था ही क्या

कि तुमको अपने पास बचाने की खातिर
एक पूरी उम्र गंवा डाली.

दोपहर के ढलते ही काम हाथ से छूटने लगते. मन छत की ओर भागने लगता. वहां क्या होता? छत खाली पड़ी रहती. आसमान में कुछ देर पंछी उड़ते हुए कहीं लौटते दीखते. डूबते सूरज की रोशनी से क्षितिज पर नया सा रंग आता और किसी लकीर की तरह फैल जाता. शाम का साया घना हो रहा होता. दीवार से बनती परछाई शाम की रंगत से अधिक घनी होती जाती. रोशनी बुझ ने लगती. चीज़ें अंधेरे में गुम होने को बढ़ जाती.

छत पर खड़े हुए कभी-कभी अतीत की याद आती थी. ख़ुशी से किलकते बच्चे की तरह भाग-भाग कर वहीँ जाने को बेताब मन. सारे काम एक मुलाक़ात को बनाने के आस-पास चलते. दस दिन बीत जायेंगे न तब हम मिलेंगे. इस तरह दस दिन किसी अंधी पोटली में जा गिरते. उन दस दिनों में जीना नहीं होता था. प्रतीक्षा होती थी. प्रतीक्षा का ही रोमांच होता था. आस-पास के लोग क्या करते थे दीखता न था. मन उनके बारे में सब भूल जाता.

कुछ रोज़ की मुलाकात के लिए महीनों खो दिए. साथ रह लेंगे ये सोचकर सोचा कि ज़िन्दगी आसान हो जाएगी. साथ रहेंगे. प्रेम से देखेंगे. पास बैठेंगे. सब कुछ एक साथ करेंगे. कितना अच्छा न? अक्सर देर रात तक यही सोचते हुए बत्ती गुल करने का मन न होता. कभी दोपहर में खिड़की दरवाज़े बंद किये अँधेरा बना कर बैठे रहने को जी चाहता.

और एक रोज़ ज़िन्दगी साथ निबाहने का वादा कर लिया. तीजे महीने वह किसी और के साथ रहने लगा.

ऐसे को कौन याद करता है? ज़रूर कोई और बात थी कि शाम होते-होते छत पर आकर चुप बैठ जाने का मन हो आता था. मन में जैसे कोई झील थी. हर शाम अलोप होने वाली झील. शाम होने के साथ डूबने लगती. उसका पानी किसी सुराख़ से बहता हुआ अँधेरे की ओर जा रहा होता. उसके ठीक बीच मन एक अबोध नन्हे हिरन की तरह फंस जाता. कम होता हुआ पानी दलदल में बदल जाता. केवल गरदन को कीच से बाहर उठाये हुए साँस-साँस गिनता मन सूनी आँखों से स्थिर एक दिशा में देखता रहता.

और कोई बात नहीं दुःख इस बात का होता है कि मुक्ति की ठीक चाहना नहीं हो पाती. अब तक जो था वह खर्च कर दिया. वह सब वापस नहीं चाहिए लेकिन...

पंखों की आवाज़ आई. एक फाख्ता आकर छत पर गिरी. मोबाइल से रोशनी करके देखा तो दीवार के पास चिपके हुए बैठे पाया. परिंदों को छूने में भी अँगुलियाँ डरती हैं. हाथ आगे बढाया तो चुप बैठा परिंदा हिला नहीं. उसे हथेली में उठा लिया. अँगुलियों के बीच कुछ गरम रिसने का अहसास आया. सोचा परिंदा पानी से भीगा होगा लेकिन वो गाढ़ा होता हुआ खून था.

कभी नहीं सोचा था कि इस तरह खून से भरी हथेली को देखा जा सकेगा. लेकिन अचानक लगा कि हथेली में घायल फाख्ता नहीं है. जो मन तुमको दिया था उसे तुमने जीवन के आसमान में उड़ते हुए ही चीर डाला है. वह एक लहुलुहान फाख्ता की शक्ल में फिर से मेरी हथेली में आ गया है.

वाशबेसिन में नल के पानी के साथ एक रंग घुलता हुआ हल्का होता गया. फाख्ता एक कोने में दुबकी बैठ गयी. जैसे कोई लड़की अपने पिता के घर चली आई हो. और सोचती हो कि जीवन में कोई और भी ठिकाना होना चाहिए कि आसमान में उड़ते हुए ज़ख्मी हो जाने पर किसी के घर न लौटना पड़े. कोई अपना घर हो केवल अपना.

आँखों के आगे अंधेरा श्यामपट्ट बना रहा था. सोचा कि इस श्यामपट्ट पर कुछ लिख दूँ मगर क्या? 
* * *

एक और किताब पूरी कर लो. मुझे कई बार लगता है कि नए कवर में नए शब्द हैं. प्रिंटिंग की स्याही की ख़ुशबू आ रही है. किताब को अपने चेहरे पर फैलाकर रख लिया है.

इनबॉक्स में पड़े अनरीड मैसेज और छूटी हुई कॉल्स को देखा. मालूम था कि निम्बू नहीं है फिर भी फ्रीज़ खोला. कुछ तो मिल ही जाएगा. अदरक का छोटा सा टुकड़ा मिल गया. कांच के ग्लास में अदरक की स्लाइस डालते हुए रुक गया कि सवेरे चाय में डालने लायक बहुत थोड़ा सा बचा देता हूँ.

अदरक वाली जिन का स्वाद भी बहुत अच्छा होता है. 
* * *

जब कोई तुमको छोड़कर चला जाये तो समझ आता है कि ज़िन्दगी कितनी लम्बी है. अगर कोई तुमको छोड़कर भी तुम्हारे साथ बना रहे तो समझ आता है कि ज़िन्दगी कितनी भारी है. भौतिकी का ये ज्ञान भौतिक विज्ञान पढने से नहीं जीने से समझ आता है. 
* * *

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मन में छुपे बुलावे

टूटे पंख की तरह  कभी दाएं, कभी बाएं  कि कभी हवा में तैरता मन। 
आँखें पास की दीवार, छत, पेचदार सड़क या खुले आसमान की ओर रह जाती है जबकि मन चुपके से कहीं दूर निकल जाता है। मैं उसी जगह बैठा हुआ पाता हूँ कि खोया हुआ मन जहां गया है, वह कोई चाहना नहीं है। मन का जाना ऐसा है जैसे वह निरुद्देश्य भटक रहा है। 
मैं उसे पकड़कर अपने पास लाता हूँ। उसी जगह जहां मैं बैठा हूँ। वह लौटते ही मुझे उकसाता है। अब क्या करें? मैं भी सोचता हूँ कि क्या करें? कुछ ऐसा कि नींद आ जाए। थकान आँखें बुझा दे। कोई मादक छुअन ढक ले। कोई नशा बिछ जाए। ये सब हो तो कुछ ऐसा हो कि जागने पर नींद से पहले का जीवन भूल सकें। 
यही सोचते, मन फिर बहुत दूर निकल जाता है। * * *
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नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
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यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

सपने में गश्त पर प्रेम

होता तो कितना अच्छा होता कि हम रेगिस्तान को बुगची में भरकर अपने साथ बड़े शहर तक ले जा पाते पर ये भी अच्छा है कि ऐसा नहीं हुआ वरना घर लौटने की चाह खत्म हो जाती. 
अक्सर मैं सोचने लगता हूँ कि
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* * *

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* * *

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कभी लगता है
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* * *

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* * *

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* * *

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एक काला बिलौटा है.

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घनी पत्तियों से लदा, चुप खड़ा हुआ.

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