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डेटा चोरी से रची गयी दुनिया

कुछ मित्रों ने पूछा है कि फेसबुक से लिए डेटा का कोई कैसे और क्या उपयोग कर सकता है. मेरी प्रवचन करने की बुरी आदत है. प्रवचन की दुर्घटना के बाद सोचता हूँ कि कम शब्दों में बात कहना सीखना चाहिए. इसलिए आज कोशिश करता हूँ.

डेटा से पसंद, व्यवहार और मत का अनुमान निश्चित कर व्यक्तित्व का विश्लेषण किया जाता है. इसके पश्चात् जिसका डेटा है उसे केंद्र में रखकर योजना बनाना. इसके लिए तकनीकी शब्द है मैक्रोटार्गेटिंग. सरल शब्दों में इसका अभिप्राय है कि इस विश्लेषण के आधार पर एक ऐसा संदेश तैयार करना जो कि निश्चित व्यक्ति अथवा समूह को प्रभावित कर सके. व्यक्ति की पसंद का काल्पनिक भविष्य रच सके. एक निश्चित व्यक्ति जब अपनी पसंद और व्यक्तित्व के अनुरूप बातें किसी उत्पाद, विचार या राजनितिक लक्ष्य से सुनता है तो वह अजाने ही उसका एक सक्रिय सम्प्रेषक अथवा कार्यकर्त्ता बन जाता है.

उदाहरण के लिए एक नगर निगम के चुनाव हैं. एक विशेष स्थान से लोग दूजे विशेष स्थान तक कैब से यात्रा अधिक करते हैं. उस स्थान पर मेट्रो जैसी अत्याधुनिक सुविधाएँ चलाने की बात फैला दी जाये. आप अपनी लोकेशन अपडेट करते हैं. इससे पता चलता है कि आप कब कहाँ जा रहे हैं. इसलिए हर एप द्वारा आपकी लोकेशन लगातार मांगी जा रही है. जैसे इससे ये मालूम किया जाता है कि किसी विशेष माल में लोग सबसे अधिक संख्या में जा रहे हैं तो वहां सर्वाधिक विज्ञापन किया जाये. आप किसी पोल में बताते है कि भ्रष्टाचार से पीड़ित हैं तो एक स्वप्न पेश किया जाये जो भ्रष्टाचार मुक्त होने का विश्वास दिलाये. देश में बेरोज़गारी बढ़ गयी है, इसका आंकलन करके देश से बाहरी लोगों को भगाने का नारा उछाला जाये.

आप कहेंगे कि ये तो अच्छा है न? अपने आप किसी ने हमारी समस्याओं का आंकलन किया और किसी ने उनको दूर करने का वादा कर लिया. लेकिन यही सबसे बड़ी चुनौती है कि इस तरह के विश्लेषणों का उद्धेश्य समस्या दूर करने की जगह फौरी तौर पर लोगों के मन को प्रभावित करना भर होता है. आपकी निजी जानकारी का किसी को हासिल होना आपके लिए इसलिए समस्या है कि अगर आपको घुटनों में दर्द है तो आपकी ये जानकारी दवा कम्पनी को बेच दी जाएगी. आपको फेसबुक जैसी सोशल साइट्स और इंटरनेट ब्राउजर्स पर केवल घुटनों की दर्द निवारक दवाओं के विज्ञापन दिखाई देंगे. आपकी न्यूज फीड में तुरंत ऐसी पोस्ट्स आपको फोलो करने लगेगी. आप घुटनों के दर्द की दुनिया बन कर रह जायेंगे. डरेंगे और पैसा खर्च करेंगे.

डेटा चोरी से रची गयी काल्पनिक समस्याएं और उनके समाधान कोई भौतिक चीज़ नहीं है जिसे आप देख सकें. ये मन को पढने की कोशिश हैं. खुलापन, कर्त्तव्य निष्ठां, बहिर्मुखता, सहमतता, मनोविक्षुब्धता से जुड़ी इंटरनेट पर उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर व्यक्ति को प्रभावित करने के लिए लड़ा जा रहा युद्ध है. इस क्षेत्र के एक महारथी ने इसे "स्टीव बेनोंस सायकोलोजिकल वारफेयर माइंडफक टूल" कहा है.

तो समझिये कि आपके दिमाग के साथ क्या किया गया है कि आपको समझ नहीं आ रहा डेटा चोरी से कैसे और क्या किया जा सकता है?

[Image by Chuck Kerr]

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नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…

मन में छुपे बुलावे

टूटे पंख की तरह  कभी दाएं, कभी बाएं  कि कभी हवा में तैरता मन। 
आँखें पास की दीवार, छत, पेचदार सड़क या खुले आसमान की ओर रह जाती है जबकि मन चुपके से कहीं दूर निकल जाता है। मैं उसी जगह बैठा हुआ पाता हूँ कि खोया हुआ मन जहां गया है, वह कोई चाहना नहीं है। मन का जाना ऐसा है जैसे वह निरुद्देश्य भटक रहा है। 
मैं उसे पकड़कर अपने पास लाता हूँ। उसी जगह जहां मैं बैठा हूँ। वह लौटते ही मुझे उकसाता है। अब क्या करें? मैं भी सोचता हूँ कि क्या करें? कुछ ऐसा कि नींद आ जाए। थकान आँखें बुझा दे। कोई मादक छुअन ढक ले। कोई नशा बिछ जाए। ये सब हो तो कुछ ऐसा हो कि जागने पर नींद से पहले का जीवन भूल सकें। 
यही सोचते, मन फिर बहुत दूर निकल जाता है। * * *
पर्दा हल्के से उड़ता है  जैसे कोई याद आई और झांककर चली गयी। 
हम किसी को बुलाना चाहते हैं मगर ऐसे नहीं कि उसका नाम पुकारें। हम उसके बारे में सोचते हैं कि वह आ जाए। वह बात करे। किन्तु हम इन बुलावों को मन में ही छुपाए रखना चाहते हैं। 
कभी-कभी हम इस चाहना से शीघ्र मुक्त हो जाते हैं और कभी हम सोचने लगते हैं कि किस तरह उसे बुला लिया जाए और साथ ही ये भी न लगे कि हमने बुलाया ह…