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फेसबुक बनाम बिबलियोफोबिया

फेसबुक आपकी कई बीमारियों को सार्वजनिक कर रही है।

आपके सामने एक किताब रखी है। आप उसके पांच सौ पन्ने देखकर सोचते हैं इतनी बड़ी किताब कौन पढ़ेगा। आपके सामने एक बीस पन्नों की कहानी है और आप उसे पढ़ने की अनिच्छा पाते हैं। आपके सामने अख़बार में छपा एक लेख है और आप सोचते हैं कि लोग लंबे लेख क्यों लिखते हैं। अब कोई बीस पंक्तियों की बात भी आप नज़र अंदाज़ करते हैं। आप अक्सर चाहते हैं कि ब्लॉगर पर फेसबुक पर एक दो पंक्ति की बात ही लिखी जानी चाहिए।

अगर ये बात सच है तो आप बीमार हैं। आपकी बीमारी को मनोविज्ञान की भाषा में बिबलियोफोबिया कहा जाता है।

फेसबुक हमारी पढ़ने की आदत को ख़त्म कर रही है। मुझे भी इस बात से सहमति होती रही है। मैं भी अनेक बार अपने कहानी संग्रह का काम पूरा न होने के लिए फेसबुक को कोस चुका हूँ। मैंने फेसबुक को बंद किया और कहानियों पर काम करना चाहा। मैं लैपटॉप खोलता, वर्ड पैड में झांकता रहता। कभी नींद आती, कभी उठकर बाहर चला जाता। लेकिन काम न हुआ। मेरी फेसबुक एक दो दिन नहीं नशे की लत छूटने की प्राथमिक सीमा यानी तीन महीने बंद रही। काम उसके बाद भी न बना।

ऐसा क्या हो गया है? मैंने स्वयं से प्रश्न किया कि क्या ये राइटर्स ब्लॉक जैसा कहा जाने वाला कुछ है? मैंने पाया कि नहीं। मैं नया तो रोज़ ही लिख रहा हूँ बस पुराने ड्राफ्ट्स पर काम नहीं करना चाहता। ये समस्या कुछ और है। कुछ सोच विचार के बाद मैं इस निर्णय पर आया कि पुराने ड्राफ्ट्स को पूरा करने के बाद आने वाली किताब का फीड बैक आने में बहुत श्रम और समय लगेगा। दूजी बात नया लिखते ही लिखने की चाहना का आंशिक पोषण हो जाता है और तुरंत फीडबैक मिल जाता है। इसलिए मुझे फेसबुक पर लम्बी पोस्ट लिखने का मन है मगर कहानी संग्रह पर काम करने का नहीं है।

हमारे लिए निर्धारित पाठ्यपुस्तकों को पढ़ने का डर और उनका सस्वर पाठ करने का डर बिबलियोफोबिया है। यही बीमारी तब भी है जब हम स्कूल कॉलेज से बाहर हों और अपने काम से सम्बन्धित, अभिरुचि से जुड़ी, साहित्य या इतिहास सम्बन्धी किताबें पढ़ना चाहते भी नहीं पढ़ पाते हैं। हम मन से किताब का ऑर्डर करते हैं या दुकान से खरीदकर लाते हैं। किताबें बढ़ती जाती हैं और पढ़ने का मन गायब रहता है।

अक्सर कविता लिखने की चाह रखने वाला कविता की अच्छी पुस्तकें, कहानी वाला कहानी और उपन्यास वाला उपन्यास पढ़ने से कतराता रहता है। अगर वह शुरू करता है तो भी वह बीस चालीस पन्ने के बाद सदा के लिए छोड़ देता है। असल में उसे अच्छे लेखक के बड़े कद से भी डर लगता है। वह रचना से बाहर लेखक के कद की छाया में घिर जाता है। यही तब भी होता है जब हम किसी इतिहास नायक को पढ़ते हैं और अनिच्छा से भरकर अधूरा छोड़ देते हैं।

फेसबुक को दोष दिया जा सकता है कि उसकी वजह से पढ़ना और बहुत कुछ प्रभावित हो रहा है किंतु मैंने पाया कि फेसबुक यूजर्स से संवाद के दौरान मैंने अच्छी किताबों की जानकारी पाई। उनको पढा और प्रसन्न हुआ। मेरे बहुत सारे मित्रों ने किसी सम्मोहन, आकर्षण या दिखावे में किताबें ऑर्डर करनी शुरू की। उनके साथ अपनी तस्वीरें लगाई। कुछ एक ने उनके बारे में लिखा भी। तो ये पूर्ण सत्य नहीं है कि फेसबुक पढ़ने की राह में खड़ी दीवार है।

जिस तरह लर्निंग डिसएबिलिटी होती है उसी तरह रीडिंग की भी होती है। आपने बारहवीं पास की, स्नातक हुए और अच्छी नौकरी या अच्छा काम करने तक पहुंच गए तो इसका अर्थ ये नहीं है कि आप अच्छे पाठक हैं। आप एक औसत व्यक्ति हैं। आप में समाज और साहित्य के बारे में कुछ औसत सुनी-सुनाई, अपडेट न की हुई जानकारी है। आपके पास तीन सौ शब्द हैं। आप बोलने के सामान्य कौशल तक आ गए हैं और अपने व्यक्तित्व का दिखावा करते हुए जीने का रास्ता खोज लिया है। आप अगर सचमुच इससे अधिक अच्छा बनना चाहते हैं और बन नहीं पा रहे तो आप एक मनोरोग से पीड़ित हैं, जिसका ज़िक्र इस बात में हो रहा है।

इस रोग के लक्षण। जैसे ही पढ़ना शुरू करेंगे कोई काम याद आ जायेगा। मौसम अच्छा न लगेगा। पसीना आएगा या ठंड लगेगी। मानी आप सर्द दिनों में रजाई खोजने लगेंगे और गर्म दिनों में पसीना पौंछने लगेंगे। आप किसी भी कारण से किताब को एक तरफ रख देंगे। अब आप फोन हाथ में लेकर फेसबुक ऑन कर लेंगे तो मौसम सुहाना हो जाएगा। समय कब बीता पता भी न चलेगा। क्योंकि फेसबुक पर जहाँ कोई पढ़ने की बात होगी, उससे आगे बढ़ जाएंगे। आप तस्वीरें लाइक करेंगे। किसकी पोस्ट पर आपकी महबूबा लगातार जा रही है ये खोज करने लगेंगे। आपका महबूब इन दिनों कितनी बार और क्या लिख रहा है का अन्वेषण करने लगेंगे। या आप किसी विषय पर कोसने के अपने प्रिय कार्य में लग जाएंगे। असल में इस सबकी वहज है पढ़ने का भय। तो फेसबुक पर आकर भी नहीं पढ़ते हैं। न पढ़ना चाहते हैं।

बिबलियोफोबिया एक गंभीर रोग है। इसका तुरंत उपचार लेना चाहिए। ये आपकी स्कूल-कॉलेज शिक्षा को प्रभावित करता है। ये कार्य सम्बन्धी योग्यताओं में भी बाधा बनता है। ये आपके निजी जीवन को भी प्रभावित करता है।

सब मनोरोगों का उपचार एक सा ही होता है। जैसे किसी को पानी से डर लगता है तो उसे कम पानी से मित्रता करनी होती है। उसमें थोड़े से पांव डुबो कर बैठना होता है। फिर धीरे-धीरे आप एक छोटे पूल में उतरते हैं। एक रोज़ तैरने लगते हैं। आपको नींद नहीं आती तो अत्यधिक श्रम करने को प्रेरित किया जाता है, थकान से नींद आये। नहीं तो नींद की दवा ही दी जाती है। आपको ऊंचाई से डर है तो आपको ऊंचाई तक जाकर ही इसे मिटाना होता है। किताबें पढ़ने का डर आप में आ गया है तो थोड़ी योजना बनाइये, थोड़ी हिम्मत जुटाइये। किताब के साथ निश्चित दोस्ती गाँठिये। रोज़ पढ़ने का तय समय निकालिये।

फेसबुक को मत कोसिए कि उसने आपका सबकुछ चुरा लिया है। आप स्वयं को याद दिलाइये कि आप जो नहीं कर रहे हैं, उसके प्रति अनिच्छा से भर गए हैं। उसे ठीक कीजिये।
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नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
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भूल जाओ
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* * *

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और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

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इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
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* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…

मन में छुपे बुलावे

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आँखें पास की दीवार, छत, पेचदार सड़क या खुले आसमान की ओर रह जाती है जबकि मन चुपके से कहीं दूर निकल जाता है। मैं उसी जगह बैठा हुआ पाता हूँ कि खोया हुआ मन जहां गया है, वह कोई चाहना नहीं है। मन का जाना ऐसा है जैसे वह निरुद्देश्य भटक रहा है। 
मैं उसे पकड़कर अपने पास लाता हूँ। उसी जगह जहां मैं बैठा हूँ। वह लौटते ही मुझे उकसाता है। अब क्या करें? मैं भी सोचता हूँ कि क्या करें? कुछ ऐसा कि नींद आ जाए। थकान आँखें बुझा दे। कोई मादक छुअन ढक ले। कोई नशा बिछ जाए। ये सब हो तो कुछ ऐसा हो कि जागने पर नींद से पहले का जीवन भूल सकें। 
यही सोचते, मन फिर बहुत दूर निकल जाता है। * * *
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कभी-कभी हम इस चाहना से शीघ्र मुक्त हो जाते हैं और कभी हम सोचने लगते हैं कि किस तरह उसे बुला लिया जाए और साथ ही ये भी न लगे कि हमने बुलाया ह…