An illegally produced distilled beverage.


July 28, 2013

एक चोर दांतों वाली लड़की की याद

And if I could
I'd throw away this world
I'd dress you all in pearls
I'd give you what you wanted

You're all I notice
In a crowded room
Your vacant motives
Unmoved, revealed

Medellia of my eyes
You're the emptiness of I
You're the reason that I drive
And if you say you will
I would love you still

And if I just could
Be anything for you
Just anyone at all
Anything that mattered, washed out

POSTED BY COREY AT 11:37 AM

मैं कल रात से एक तन्हा आदमी की डायरी को पढ़ रहा था। मैंने कुछ कवितायें और कुछ अर्ज़ियाँ कई कई बार पढ़ी। इस आदमी के बारे में जुलाई 2001 से फरवरी 2003 के बीच का अक्स दिखाई देता है। हम कहाँ से आते हैं और कहाँ खो जाते हैं। हम किन शब्दों से बनते हैं और किन शब्दों के साथ खत्म हो जाते हैं। मुझे नहीं मालूम कि आप कभी दूसरों की खुली ज़िंदगी में झांकना पसंद करते हैं या नहीं। इसलिए भी कि तनहाई जितनी खौफ़नाक है उतनी ही हमदर्द भी हुआ करती है।

इस ब्लॉग का लिंक मैंने रात को अपने फेसबुक पेज़ शेयर किया था। इसलिए कि शायद रात के वक़्त आप जागे हुये हैं और रोने के लिए महबूब के घुटने तलाश रहे हैं। या शायद आपकी जो हवस है उसी से डर कर आपने एक भले मानुष के पर्दे की ओट ले रखी है। आपकी खिड़की से बरसात के गिरने की आवाज़ आ रही है मगर शायद आप डर रहे हों कि पानी के साथ आपका रंग उतर न जाए और प्रेम जिसे नाम दिया है उस वहशत देख कर दुनिया से भाग जाने का सिरफिरा खयाल न घेर ले।
* * *

हवा की सरगोशी की शक्ल में वक़्त का एक लम्हा मेरे कान के पास से गुज़रा। पैमाने में बस ज़रा सी वोदका और ज़रा सा पानी बचा हुआ था। मैंने उसे छत के बीच उछाल दिया। बरसात से पहले, हवा शायद इसे उड़ा ले जाएगी। साथ ही एक चोर दांतों वाली लड़की को याद करके मुसकुराना भी...

फिलहाल ऊपर देखो तो कुछ बरसे हुये बादल हैं जैसे रात की सलवटों से भरा लिहाफ़ आसमान में टंगा है।
* * *

पश्चिम से आती हवा से मुंह फेरते हुये उसने सुना।

क्या पत्थरों, ताबीजों और किताबों से ही मुकम्मल हो जाता है कोई? उस घड़ी, जब एक बार उसने बावजह छू जाने दिया था। उससे बड़ा सुकून का सबक कोई क्यों न रहा ज़िंदगी में। तुम्हें मालूम है खत्म कुछ नहीं होता। हम किसी फरवरी महीने की एक गुनगुनी नज़र को गरम दिनों की धूप में भी ज़िंदा कर सकते हैं। जैसे किसी ने हाथ आगे बढ़ा कर खींच लिया हो।

तुम कहाँ पड़े होते अगर उसने गले न लगाया होता। कि गले लगाने के लिए सचमुच का बाहों में भर लेना ज़रूरी नहीं होता। कई छोटे छोटे संदेशे ये काम बखूबी कर लेते हैं। जब आप पाएँ कि आप लगातार उसी तरफ देख रहे हैं, उसी को सोच रहे हैं और उसी से कोई ख़्वाहिश भी नहीं है तब आप उसके सच्चे प्रेम में होते हैं।

ये सब कौन किससे कह रहा था। हवा अब भी पश्चिम से ही आ रही है मगर दिखता कोई नहीं।

July 26, 2013

वो भी हम जैसे हो जाएंगे

चेखव की एक कहानी पढ़ते हुये याद आया कि गरीबी से बाहर आने में शिक्षित होने की बड़ी भूमिका है। आज के दौर का नया नारा भी यही है कि शिक्षा आपके भविष्य का बीमा है। यह एक सत्य है। इतना कि आप इस पर आँख मूँद कर यकीन कर सकते हैं। मैं दोपहर बाद ऑफिस जाने से पहले ज़रा सी मीठी झपकी ले रहा था कि स्कूल से बच्चे लौट आए। उनके आते ही मालूम हुआ कि सोमवार को विध्यालय जाना होगा। मैं उसी विध्यालय की मेनेजमेंट कमिटी का सदस्य भी हूँ। इसलिए वहाँ आना जाना लगा रहता है। लेकिन इस बार जाने की वजह यह थी कि मुझे अपनी बेटी कि जमानत करवानी थी। विध्यालय द्वारा ली गई तलाशी में उसके बस्ते से अमिश का उपन्यास निकला था। ये हिन्दू मायथोलोजी का ऐडोप्शन है। बारहवीं के कला वर्ग की कक्षा पूरे विध्यालय में बदनाम। ये नाम किस तरह बद हुआ इसके बारे में मुझे कुछ खास मालूम नहीं है किन्तु कुछ महीने पहले विध्यालय के प्राचार्य महोदय बता रहे थे कि बच्चों से अधिक अनुशासनहीन वे हैं जिन पर इन बच्चों की परवरिश का जिम्मा है। मुझे उनकी लाचारी और दुख दोनों का प्रत्यक्ष अनुभव हुआ। वे छह फीट लंबे दो बच्चों को डांट रहे थे। बच्चे विध्यालय में किसी अध्यापक की इन्टरनेट पर छवि बिगाड़ने और उनके प्रति असम्मानजनक शब्दों का सार्वजनिक उपयोग करने के अपराधी थे। विध्यालय के शारीरिक शिक्षक उनको कहीं से खोज कर लाये थे। खोज कर लाने का आशय है कि बच्चे कहीं भाग जाने की धमकी देकर आए थे। ये एक तरह से ऐसा था कि किसी अन्न के दाने की जगह दो पाटों के बीच किसी मजबूत पत्थर का आ जाना। अभिभावक भी दुखी और शिक्षक भी। जब प्राचार्य उन बच्चों को डांट रहे थे, तब वे दोनों बच्चे बिना किसी अपराधबोध के मासूमों की तरह विश्राम की मुद्रा में पीछे हाथ बांधे हुये चुप खड़े थे। उनके जवाब सुन कर आपको उन पर दया आ जाती कि इतने भोले भाले बच्चों पर इस तरह का दोष लगाना ठीक न होगा। लेकिन मेरी जानकारी में उनकी सारी करतूतें थी। उनके व्यवहार, आचरण, उपस्थिती और मुख मुद्रा से वे वाकई कला के विध्यार्थी कहलाने लायक थे।

विध्यालय में नयी प्राचार्य आई हैं। उन्होने आते ही शैक्षणिक व्यवस्था और अनुशासन को सुधारने पर ध्यान देना शुरू किया होगा। उनके हिसाब से आफत सिर्फ एक ही रही होगी। उससे निपट लेना, आगे का रास्ता आसान कर सकता होगा। विज्ञान के बच्चे बदमाश नहीं है। इसलिए कि उनके पास शिक्षा के नक़ली जुए से सर बाहर निकालने का कोई अवसर ही नहीं है। वे बच्चे सुबह पाँच बजे जागते हैं तीन बजे विध्यालय से लौटते हैं। इसके बाद बारी बारी से तीन चार जगह पर ट्यूशन पढ़ने जाते हैं। फिर रात नौ बजे घर लौट कर एक बार और अपने सहपाठियों से आगे निकाल जाने की होड़ लगाते हैं। उनका जीवन कला, साहित्य और संकृति से कोई वास्ता नहीं रखता है। उनके जीवन में खेल भी है तो वह किसी ट्यूशन की ही तरह शामिल है। उसमें आनंद कम और आगे निकल जाने की होड़ ज्यादा है। इसलिए विज्ञान और वाणिज्य की कक्षाओं में किसी तलाशी का आयोजन किया जाना निरर्थक ही होता। मैं जब विध्यार्थी था तब विध्यालय में उपन्यास लाना क्या, उसका नाम लेना भी अपराध था। उपन्यास पढ़ने वाले बच्चे जीवन की दौड़ में पिछड़ जाते हैं। इसलिए सभी अभिभावक इस पर प्रकट रोक लगाए रखते हैं। जबकि हर विध्यालय का पुस्तकालय उपन्यासों से भरा होता है। हिन्दी और अन्य भाषाओं के साहित्य को बिना उपन्यासों के कभी जाना समझा नहीं जा सकता है। भाषाओं की श्रेष्ठ कृतियाँ उपन्यास और महाकाव्य ही हैं। बंदूक, गोली और तोपखाना बनाना सीखना मनुष्यता का पोषक कभी नहीं हो सकता है। विज्ञान हमारे जीवन का अभिन्न अंग है। इसकी उपयोगिता और इसके वरदान मनुष्य के लिए अतुलनीय है। किन्तु मनुष्य के मन को भी विज्ञान में बदल दिया जाए ये मेरे लिए असहमति की बात है। मैंने अपनी बेटी से कहा कि आपकी नयी प्राचार्य आपके भले के लिए ये सब कर रही हैं। उनका हर एक कदम अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए है। अशैक्षणिक पुस्तकों का विध्यालय न ले जाना एक अच्छी बात है। उनका ये कहना सही है कि इस तरह की पुस्तकें विध्यालय समय के पश्चात होनी चाहिए अन्यथा घर विध्यालय के बीच का भेद और दोनों के लक्ष्य अधूरे ही रह जाएंगे।

केंद्रीय विध्यालयों में दसवीं पास करने के बाद ग्यारहवीं में प्रवेश लेने के लिए कुछ प्राप्तांकों के बार बने हुये थे। उनके हिसाब से अव्वल नंबर लाने वाले बच्चे विज्ञान, उनसे कम वाले वाणिज्य और उनसे भी कम वाले कला में दाखिला पा जाते थे। इसमें ऐसी कोई बाध्यता न थी कि अव्वल नंबर लाने वाला बच्चा कला नहीं ले सकता है। इस बार इसे हटा लिया गया है। जो भी बच्चा विज्ञान पढ़ना चाहता है वह उपलब्ध सीट पर प्रवेश के लिए आवेदन कर सकता है। और ऐसा किए जाने के बाद जो भयानक संकेत आया है, वह है कि विध्यालयों में कला में प्रवेश लेने वाले बच्चे नहीं मिले। कला की कक्षाएं खाली हो गयी है और सेक्शन को तोड़ दिया गया है। हम सब बच्चों को विज्ञान क्यों पढ़ाना चाहते हैं। वे कौन लोग हैं जिंहोने बच्चों के मन में ये बैठा दिया है कि विज्ञान ही जीवनदाई शिक्षा है। विज्ञान के बिना वे सबसे पिछड़े रह जाएंगे। ये कैसी होड़ है और इसे किसलिए बनाया गया है। इसका पोषण करने वाले लोग कौन हैं। क्या निजी कोचिंग इंस्टीट्यूट और एमएनसी हमारे शिक्षा तंत्र और ज्ञान को लंगड़ा नहीं करते जा रहे हैं। ये कैसे हमारे भीतर आ गया है कि सिर्फ विज्ञान के सहारे ही मनुष्य एक बेहतर समाज की रचना कर सकता है। मैं सचमुच चिंतित हूँ कि वाणिज्य और कला विहीन शिक्षा से बनने वाला समाज कैसा होगा?शरीर के विभिन्न अंगों की जगह हम एक स्टील के मजबूत सर वाले मानव की कल्पना करके देखें तो कैसा लगेगा। सिर्फ बंदूक की गोली बनाते जाने से मानव सभ्यता कहाँ जाएगी सोचा है? मूर्तिकला और साहित्य के अभाव वाला जीवन कैसा होगा। जहां किताबें, नाट्य, सिनेमा और अन्य संचारी कलाएं सिर्फ विज्ञान में बदल जाएगी उस समाज का एक दिन कैसा होगा? हम पढ़ लिख कर गरीबी से बाहर आने की जगह कहीं और ज्यादा गरीब तो नहीं हो रहे हैं। निदा फ़ाजली कहते हैं- बच्चों के छोटे हाथों को चाँद सितारे छू लेने दो/ चार किताबें पढ़कर वो भी हम जैसे हो जाएंगे। और दुआ कि हम बच्चों को कम से कम सिर्फ मशीन होने की किताबें न पढ़ाएँ।

[Image courtesy : 1samoana.com]

July 24, 2013

रंग, राख़, पानी और धूप जैसी चीज़ें


उस रंग को जाने क्या कहते हैं 

लोहे की पटरियों पर जैसे किसी नादान रंगरेज़ के हाथों से निकल कर कोई रेलडिब्बा चला आया है। कुछ ज्यादा गहरे रंग से रंगा हुआ। स्कूल के सबसे ऊंचे हाल के कंगूरे के पास दिखती सीमेंट की चद्दरों पर बैठा हुआ कोई कबूतर। जो स्टेशन मास्टर के बागीचे में खुले पड़े पानी के पाइप से नहाकर आया हो। और पंखों के नीचे का अंधेरा उसके रंग को गहरा करता हो। या फिर किसी लड़के ने नीले पेन से लिखे को रबर से मिटाने की ज़ुर्रत में कॉपी के पन्ने का मुंह रंग दिया हो। 

वो रेगिस्तान था। बरसता नहीं था। सूखा ही रहता था। वहीं एक सिगरेट थी। नेवी कट कहलाती थी। बरसों मुंह से लगी रही। अजीब गंध थी। धुआँ किसी सूरत में अच्छी गंध न था। बस एक बेशकल तस्वीर हवा में तामीर होती थी। यही हासिल था। उसका रंग बरसे हुये बादलों जैसा होता था। बस नाम ही नेवी कट था। 

मैं क्या पी लेना चाहता हूँ। मैं किसी स्याहीसोखू के जैसा हूँ क्या? जिसकी प्यास में कुछ होठ ही लिखे हुये हैं? या किसी उदासी के प्याले की सूखी हुई किनारी। इस रंग से क्या वास्ता है? किसलिए वार्डरोब भरा रहता है एक ही परछाई से। मेरे अंदर एक कुनमुनाहट है। ये तुम्हारे पास जो रंग है उसे भी चुरा लेना चाहती है। 

वो जो शाम के समय बुझने पहले रेल की पटरियों पर खड़ा हुआ, आँखों से ओझल होता जाता है, उस रंग को क्या कहते हैं? आह मैं एक रेल हो जाना चाहता हूँ। तुम मेरी कमीज़ को पकड़ कर कुछ दूर पीछे पीछे चलो तो.... एक अरसा हुआ किसी को चूम कर रोया नहीं हूँ मैं।
* * *

राख़ में खिला हुआ फूल, अनेक चिंताओं से मुक्त होता है। आग को बुझ जाने दो। जो जल रहा हो, उसकी रोशनी में कल की तैयारी करो। प्रेम, मित्रता और संबंध के नफे को एक बार दूर रख कर देखो। ये साफ होगा कि वह जो मुकर गया है, वह जो मुरझा गया है, वह जो अड़ गया है। किस काम का था। उसका बोझ कहाँ तक उठाते और किसलिए। 

राख़ में नए फूल खिलते हुये मैंने देखे हैं। कुछ लोग कहते हैं कि जंगल भी अपने आपको कई बार नया नवेला करने के लिए राख़ करता जाता है। मैं खुश हूँ कोई नया फूल खिल रहा है, बरबादी की राख़ पर। चीयर्स। 

नाम क्या है तुम्हारा? ज़रा एक बार तुम्हारी आवाज़ में सुन सकूँ तो देर तक मुस्कुराऊंगा। कहो एक बार...
* * *

उसे कोई नाम नहीं सुनाई दिया। 

पानी और धूप के बीच जो चीज़ होती है, वैसा ही कुछ अगर किसी रिश्ते के दरमियान बैठा हुआ है तो तुमको इस बारे में ज़रूर सोचना चाहिए। प्रेम में दो लोगों के बीच किसी तीसरे के होने से अच्छा है बिचोलिए के ही प्रेम में पड़ जाना। 

नदी न किसी को मिलाती है, न अलग करती है। भीगी हुई आवाज़ में तुम जो नाम सुनते हो वह नदी के भंवर और किनारों के टकराने से नहीं उपजा है। वह तुम्हारे मन की आवाज़ है। तुम चाहो तो इससे भागने में लगे रह सकते हो, चाहो तो यहीं ठहर जाओ। 

पत्थर के भीगे हुये हिस्से पर दायें पैर के अंगूठे से लिखा एक नाम। जैसे कई बार हम खुद के लिए आग की कूची से लिखते हैं, ज़िंदगी।

* * *

नाकामी 

नहीं कुछ नहीं। खिड़की के पास लगी लोहे की ग्रिल पर एक परिंदा बैठा रहता था। कई दिनों से आया नहीं। उसके होने के दिनों में उसके होने का अहसास कम था। अब नहीं है तो लगता है जाने क्या क्या खो गया है। एक सन्नाटा खिड़की से बेरोकटोक अंदर चला आता है। तुम इस पार नहीं थे मगर उस पार से दिखते थे। अब नहीं दिखते। मिटने को तो दुनिया में क्या कुछ नहीं मिटता। 

कॉफी के प्याले में कोई लहर नहीं उठती। तुम अक्सर अपने पाँव हिलाते रहते थे। मुझे कॉफी के मग से ये मालूम होता था। अब जब कोई लहर न उठेगी तो इस कॉफी का स्वाद कुछ बदल जाएगा क्या? 

बाहर बारिश नहीं है। वैसे गरमी में पसीने से भीगे हुये बदन पर जमा बूंदें और नहाने के बाद बची बूंदों में उतना ही फर्क होता है। जितना तुम्हारे होने और न होने में हुआ करता है। शायद...
 


July 23, 2013

कितना सूखा है, देखो ना

एक फासला था। उसने कहा- देखो ये फासला है। शायद कहा नहीं था। ऐसा कहना चाहा था, ये मैंने सोचा। 

अखबार में लिखा था- कश्मीर से कन्याकुमारी तक बारिशें। जितने बड़े फॉन्ट थे उसके दसवें हिस्से जितनी भी बूंद नहीं गिरी थी। शायद ऊपर से नीचे की इन दो जगहों से अलग रेगिस्तान का ये हिस्सा खाली छूट जाता है। इसलिए मैंने उसको भी कोई शिकायत न की जिसने कहा था- फासला है। या फासला बना रहे ऐसा कहा होगा। 

बारिशें नहीं आई। आवाज़ की लकीर थी कुछ कदम चल कर रुक जाती। मैं फिर वहीं से शुरू करता। उसी जगह जाकर ठहर जाता। मैं चुप्पी में फिर से आवाज़ के सिरे को थामता हूँ। जैसे आप किसी बूढ़े रिश्तेदार के हाथों चढ़ गए हों और वह अपने इन तेज़ी से बुझते हुये दिनों में आपसे पहचान को हर जगह से छूकर बुनता है। वह अपनी सभी इंद्रियों को इस काम में लगा देता है कि इस प्रिय को अपने भीतर समेट सके। 

रात बीत गयी। सुबह आसमान बादलों से भरा है। बरसेगा नहीं। जैसे किसी की तस्वीर को देख सकते हों मगर वह बोलता न हो। मैं अचानक याद करता हूँ कि रात सपने में आवाज़ की लकीर दूर तक जा रही थी। कोई मुझसे पूछ रहा था कि क्या कर रहे हो। मैं डरते हुये कहता हूँ- कहानी सुन रहा हूँ। ये नहीं कहता कि आवाज़ सुन रहा हूँ। 

ये भीगी मिट्टी की गंध कहाँ से आई। तुम कुछ कहने वाले हो क्या?



[तस्वीर : अपने ही घर में पलंग पर बिखरी हुई ज़िंदगी की ज़रूरी चीजों की है। तरतीब और सिलसिले में बस कुछ शामें हैं जो अक्सर हाथ से छूट जाती है। एक खाली सुबह लाने के लिए] 

July 20, 2013

काल और क्षय से परे

प्रेम, निर्वात में रखी हुई
अक्षुण और अरूप अनुभूति है 
काल और क्षय से परे।
______________________

ये तीन दिन पहले की बात है। दोपहर के वक़्र्त अपने ड्राइंग रूम के आँगन पर एक शॉर्ट पहने लेटा हुआ था। बरसात आने की उम्मीद का दिन था। कुछ लाल चींटियाँ किसी की तलाश में थी। एक चींटी ने मेरी पीठ के नीचे बायीं तरफ कुछ जाँचना चाहा। उसे शायद मेरी पीठ से कुछ काम था। वह पर्वतारोही की तरफ मेरे सीने का फेरा लगा कर नीचे उतर गयी। मेरे पास कोई काम नहीं था। मुझे किसी के पास जाना नहीं था। मेरे पास किसी का कोई संदेश नहीं आना था। खिड़की से कोई हवा का झौंका आता तो मैं उसके सम्मान में एक बेहद हल्की मुस्कान से उसका स्वागत करता। 

अचानक मुझे उछल जाना चाहिए था लेकिन उतनी ही तेज़ी से ये खयाल आया कि ये लाल चींटी ही है। उसने अपने दांत मेरी पीठ में उसी जगह गड़ा दिये थे। जहां से उसने मेरी तलाशी लेनी शुरू की थी। मैं इस बार भी मुस्कुरा दिया। मैंने उस एक लाल चींटी को भूल कर आँगन को देखा। वहाँ अनेक चींटियाँ थी। सोचा कि अनेक दुखों में से सिर्फ एक दुख ने मेरे गले में बाहें डाली हैं। ये सभी चींटियाँ अगर मुझे काट लेना चाहे तो? 

मुझे शरारत सूझी। हाँ काट लेने दो। 

मैं आँखें बंद कर के आँगन पर बिना हिले डुले लेटा रहा। लेकिन एक ही चींटी के काटने का दर्द होता रहा। मैंने उस दर्द के बीच एक बीते हुये वक़्त में छलांग लगा दी। चींटी से कहा कि क्या तुम मुझसे प्रेम करती हो? उसको शायद समझ नहीं आया होगा। इसलिए मैंने कहा कि जिस तरह आदमी रोटी से प्रेम करता है, क्या उसी तरह तुम्हें मेरे बदन से प्रेम है? 

अब एक और चींटी मेरे हाथ पर से गुज़र रही थी। ऐसा लग रहा था मानो मेरा अपना कोई टूटा हुआ बाल हाथ पर रह गया है और हवा के साथ सरक रहा है। उस चींटी ने मुझे काटा नहीं। मैंने चाहा कि वह काट ले तो कितना अच्छा हो। इसका एक फायदा है कि मैं हाथ पर काटते ही पीठ का दर्द भूल सकता हूँ। ये ऐसा ही है जैसे आप प्रेम में ठोकर खाते हैं और सोचते हैं कि अब कोई भी आपको बाहों में छुपा ले। 

मुझे दो बजे दफ्तर जाना था। मैंने सोचा कि ये इतनी सारी चींटियाँ मिल कर मुझे अभी का अभी काट क्यों नहीं लेती। एक बार नेट जियो पर देखा था कि इन लाल चींटियों को ज़िंदा पीस कर आदमी चटनी बना लेता है। चींटियों में पाया जाने वाला ऐसिड रोटी को बहुत तीखा और चरपरा बना देता है। आदमी सिर्फ चींटियाँ ही नहीं, दूसरे आदमी के दिल की चटनी भी बनाने का हुनर जानता है। 

अब तक तीन चींटियाँ मुझे काट रही थी। ये दर्द असहनीय था। लेकिन जब आप कभी कुछ तय करते हैं तब सहन करने की सीमा को आगे पीछे किया जा सकता है। जैसे प्रेम में जब टूटन होने लगती है तब सहनशीलता का पैमाना लगातार छोटा होता जाता है। प्रेम जब बढ़ता है तो सहन करने का हिसाब बेहिसाब हो जाता है। 

मैंने तय किया था कि इन चींटियों को काट लेने दो। मुझे इनसे प्रेम नहीं था। हालांकि जिनसे था उन्होने भी ऐसा ही किया था। मैं नासमझ होने की दवा नहीं लेना चाहता हूँ। इसलिए चाहता हूँ कि मेरा ध्यान किसी और चीज़ पर रहे। इसलिए चींटियाँ देवदूत बन कर आए थी। मैं एक घंटे बाद उठा और वाश बेसिन के पास लगे आईने में अपनी पीठ को देखा। वहाँ दो छोटे से लाल घेरे थे। तीसरा घेरा मेरी बाएँ हाथ की बांह के पीछे था। 

मैंने शोवर लिया। लंच के नाम पर दो चपाती और दो ग्लास छाछ ली और दफ्तर चला गया। बरसात होने के दिन हैं तो खूब उमस है। ऐसा है तो खूब पसीना आता है। पसीना उन छोटे लाल धब्बों को छूता तो एक बेहिसाब जलन होती। मैं अपने रुमाल से उसे पौछ देना चाहता हूँ। लेकिन फिर रुक जाता हूँ। 

मैं अपनी एक लंबी तकलीफ भूल गया। मुझे सिर्फ चींटियों के काटने की ही जलन होती रही इसके सिवा मैंने उन चार दिनों में क्या किया याद नहीं। आज वे धब्बे खत्म हो गए हैं। मुझे फिर याद आने लगी है। आँगन पर देखता हूँ। एक भी चींटी नहीं दिख रही। कैसा नसीब है? 

आह बदनसीब आदमी कोई अच्छी चीज़ चुनी होती।

[Photo courtesy : Nicolo' Barreca]

July 19, 2013

ये सिस्टम किसका सिस्टम है?

जिस काम को एक साल पहले पूरा हो जाना चाहिए था। वह काम अभी तक प्रगति पर है। इस तेल नगरी में विकास की असीमित संभावनाएं हैं। इसलिए जिस तरह नए खिल रहे फूलों के आस पास अनेक कीट पतंगे, उन कीटों के लिए अनेक चिड़ियाएं और उन चिड़ियाओं के लिए अनेक मँझले शिकारी पक्षी जमा हो जाते हैं। वैसे ही यहाँ लाभ के चाहने वालों का बड़ा जमावड़ा है। जो निरंतर बढ़ता ही जा रहा है। शहर एक ऐसी दुकान हो गया है। जिसमें सामान ज्यादा और जगह कम है। धन दौलत के मुरीद इस शहर में आए तो अपने साथ एक कारवां लेकर आए। अब ये गाड़ी घोड़े इस ढब और आकार के निकले कि शहर की गलियाँ तंग हो गयी। शहर को दो भागों में बांटने वाली रेल पटरी के दोनों तरफ जाम लगने लगा। इस पटरी को पार करना थके हुये चेतक के नाले के पार जाने से पहले का हाल बन जाता रहा। लोगों ने आंदोलन किए। ज्ञापन दिये। मांगों के समर्थन में चिट्ठियाँ लिखी। तब जाकर सरकार को मालूम हुआ कि इस कस्बे में गुज़रने वाली रेल को दोनों तरफ ट्रेफिक जाम हो जाता है। 

जहां कहीं कोई जन समस्या है उसकी सूचना देना और उसके निस्तारण के लिए लड़ना जनता का काम हो गया है। गलियों में सफाई नहीं होने से लेकर जीवन रक्षा के लिए बने अस्पतालों में चिकित्सकों की कमी के बारे में भी जनता को ही बताना पड़ता है। मैं सोचता हूँ कि अगर किसी अस्पताल में मरीजों के अनुपात में चिकित्सक कम है तो ये खयाल रखना किसका काम है? कोई ऐसा सिस्टम तो ज़रूर होगा जो अस्पतालों में इस हिसाब को देखता और और उसके अनुरूप कोई व्यवस्था करता होगा। लेकिन ऐसा कभी सुनने और देखने में नहीं आता कि मरीज किसी कतार में खड़ा हुआ इंतज़ार नहीं कर रहा है। आम आदमी से जुड़े हर ज़रूरी मसहले का हाल यही है। कतार है बस एक न खत्म होने वाली कतार। सिस्टम जाने किस कम के लिए बना है। उसमें हर स्तर के अधिकारी जाने किस चीज़ की निगरानी करते हैं। वे क्या ऐसा बनाते हैं जिससे कतारों में बढ़ोतरी होती जाती है। 

आप पढे लिखे हैं। एक ओवरब्रिज बनना था, कई सालों से अटका ही पड़ा है। आपके पास इंजिनयरिंग कि आला डिग्रियाँ हैं, आपने वास्तुकला को सीखा है, आपकी इन सब योग्यताओं के कारण ही आपको सरकार के उच्च पदों पर आसीन किया है। फिर एक बात बताइये कि जो काम दो साल में पूरा होना होता है वह चार साल तक क्यों लटका रहता है? क्या इसमें आपको किसी से कोई उम्मीद है, कोई इसको रुकवाता है? और ऐसा कुछ होता है तो क्या उसकी कहीं शिकायत करने और जनता को कष्ट देने के बदले किसी सज़ा का प्रावधान है या नहीं। लेकिन सच तो ये है कि जनता अगर आंदोलन न करे तो समस्या की जूं भी सिस्टम के कान पर नहीं रेंगती। ये ऐसा सिस्टम किसने बनाया है? ये ऐसा सिस्टम किसके लिए बनाया गया है। 

सिस्टम को गरियाने वाले लोगों को कुछ लोग ये कह कर भी गरियाते हैं कि आप खुद सिस्टम को ऐसा बन जाने देते हैं। डॉ अशोक चौधरी आज कल एक नीली जींस और कुर्ता पहने हुये नागौर और आस पास के गांवों के विध्यालयों, पंचायतों, जोहड़ों और जनता के भले से जुड़ी सभी जगहों पर जाते हैं। आप पेशे से डॉक्टर हैं। भारतीय पोस्टल से सेवा के उच्च अधिकारी रहे हैं। अब आम आदमी की अबखाइयों को दूर करने के लिए उस बड़ी सरकारी कुर्सी को छोड़ चुके हैं। पिछले साल के आखिर में अभिनव राजस्थान नामक आंदोलन को संबोधित करते हुये उन्होने कहा कि आम आदमी ने मान लिया है कि सिस्टम किसी और का है, वह भूल चुका है कि सिस्टम उसका है। इस सिस्टम की देखभाल के लिए कुछ नौकर रखे हुये हैं, जो जनता के पैसे से पगार पाते हैं। डॉ चौधरी के आंदोलन का मुख्य लक्ष्य स्थानीय रोजगार के साधनों को लघु कारखानों में बदलना है। अपने पैसे को बाहर जाने देने की जगह बाहर का पैसा अपने यहाँ लाना है। यही विकास का सच्चा मार्ग है। 

हमें अपने देश से प्रेम हैं। हम अपने इस देश को सबसे सुंदर देखना चाहते हैं। लेकिन हम करते क्या हैं। हम विध्यालयों को शिक्षा का मंदिर मानते हैं लेकिन निजी विध्यालयों के प्रचार के पोस्टर हमारे शहीदों की स्मृति में बने स्मारकों, संतों और देशभक्तों की प्रतिमाओं पर चिपके होते हैं। ये विध्यालय के प्रतिनिधि जो किसी शहीद का सम्मान करना नहीं जानते हैं वे उस विध्यालय में बच्चों को क्या पढ़ाएंगे। इन्हीं स्मारकों में से एक सीमावर्ती जिले के शहीद स्मारक को पोस्टरों से इस कदर ढक दिया गया कि शहीदों के नाम लालच की भूख के नीचे दब गए। ये स्मारक नगर परिषद की देख रेख में है। माने नगर परिषद का है। हमारा इससे क्या मतलब हम तो जैसा चाहें वैसा सुलूक करें। 

इन स्मारकों की देखभाल के लिए कोई सिस्टम दिखाई नहीं देता है। आखिर कुछ रोज़ पहले एक शहीद की बेटी ने अपनी सखियों के साथ मिल कर शहीद स्मारक को लालच और गंदगी से मुक्त करवाया। वे नन्ही लड़कियां धूप से भरी दोपहर में पसीने से भीगी हुई मेहनत करती रही। तब भी किसी सिस्टम को याद नहीं आया कि इन बच्चियों को शाबाशी दी जाए और ये काम उनसे करवाया जाए जिनका ये जिम्मा है। दो दिन बाद शाम के वक़्त दफ़्तर से लौट रहा था। विवेकानंद सर्कल पर वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी इंद्र प्रकाश पुरोहित अपने दोस्तों के साथ काम में लगे हुये थे। मैंने उनके पास रुक कर देखा। वे कहते हैं देखो सिस्टम का हाल क्या है। जो लोग अभी सुराज संकल्प यात्रा के जरिये नए राज के लाने की बात कर रहे हैं। सबसे ज्यादा उन्हीं के पोस्टर इस संत की प्रतिमा को भद्दा किए हुये हैं। मैं सोचता हूँ कि इन्दु जी और उनके दोस्त कितनी बार इस गंदगी को साफ करके नए सुंदर देश को तामीर करने की कोशिश करेंगे। जबकि जो भी राज करना चाहता है उसका पहला मकसद सबकुछ मिटा कर खुद को बनाना है। 

देश का विकास और उसकी सुंदरता कुछ गिने चुने लोगों का ख्वाब भर है।

July 18, 2013

मैं उस रोशनी में जाकर क्या करूंगा

सबसे ऊंचे टीले पर मैंने रेत के बीच बनाया है एक गोल छोटा प्यारा सा ट्रेप। और मैं चुप होकर कर बैठ गया हूँ इसके नीचे रेत में छुप कर। इसके पास से गुज़रते ही मेरे दिल की बारीक मिट्टी तुमको खीच लेगी गहरी गोल खाई में। मैंने अपने दांत तोड़ दिये हैं, मैंने सिर्फ कोमल रोएँ वाली भुजाएँ बचा कर रखी है। कि जब तुम फंस जाओगे मेरे इस जाल में तब रेत के नीचे ठंडे अंधरे में तुमको बाहों में भरे आहिस्ता आहिस्ता छूकर प्रेम कर सकूँ।

मैं दुआ करता हूँ कि एक दिन बेखयाली में जो तुमने सोचा था, वह सच हो जाए।

[1]

मैं उस रोशनी में जाकर क्या करूंगा
जहां रंग बिरंगे कागज़ों के टुकड़े
और आवाज़ों के शोर की मजलिस।

कि ऐसा वो मंज़र
जहां हर कोई भूला हो खुद की ही दुनिया
देख न सके कोई दिल की हालत है कैसी
और न सोचे कोई
कि मन में ये कैसी खामोशी गूँजती है
वहाँ मैं क्या करूंगा और तुम क्या करोगे।

आओ कि
इस अंधेरे में भी तुम्हारे होने को सोच कर
मेरे दिल को भी सुकून रहेगा
तुम भी खुश ही रहोगे मेरी बेकसी देख कर।

आओ ! मेरी इस छत पर बैठो
कि तनहाई फिर भी यहाँ कायम रहेगी
एक मुद्दत से तुम तो यूं भी मुझसे बोलते नहीं हो।

[जब रगों में दौड़ते खून में एल्कोहल कम हो जाता है तब बस इतना ही प्यार आता है।]

[2]

शाम उतरती देख गली में
सोचोगे तुम तनहा बैठे
ये किसके डूबे दिल की परछाई है।

कौन अभी तक आना है बाकी
किसकी नाम की ताज़ा सदाएं
टंगी हुई है पीपल की शाखों पर।

ये कौन रात में चुप रोता है।

तुम आए ही नहीं, अब क्या कहना
कोई जाता होता तो उसको रोक भी लेते

[उदासी एक अंतहीन उत्सव है, खुशी पल भर का तमाशा है। इंतज़ार एक लंबी ज़िंदगी का नाम है।]
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July 14, 2013

और कुछ याद, दाल और तुरई की


इस वक़्त हल्की फुहारें गिर रही हैं। छत पर एक दीवार के सहारे टेबल रखी है। इस पर एक हरे रंग की पर्ल पेट की पानी बोतल, एक बोरोसिल का काँच का ग्लास, एक ब्लेकबेरी का फोन, एक लेनोवो का टूटा फूटा लेपटोप, दो रीबॉक के घिसे हुये काले सेंडल जो मेरे पाँवों में हैं, रखे हुये हैं।

ये सब इस दुनिया की चीज़ें हैं। मैं कहाँ हूँ, मालूम नहीं।
* * *

ऐसा नहीं है
कि सब आसान है इस चुप्पी में।

इसमें खिली हुई है
बिना अदरक वाली
कुछ चाय की प्यालियाँ
और कुछ याद, दाल और तुरई की।

बाकी जो है
उसका हिसाब मिल नहीं रहा
वरन मैं आवाज़ देता तुमको फिर से।

कहो ये भी क्या ज़िंदगी है दो दिन की ?
* * *

सिर्फ तुमको ही कहानी सुनना चाहता हूँ।

कुछ गए गुज़रे आवारा लड़कों से गलियों में रौनक थी और कुछ दरीचों से झाँकती हुई बेशर्म लड़कियों से ज़ीनत। इन दो चीज़ों के होने से ही बूढ़ी औरत रास्ते में पड़े पत्थर के टुकड़ों को ठोकर से उड़ा देती। फिर ज़रा झुक कर अपनी पगरखी की नोक को देखती। कहती- काना मोची आज तूँ फिर बच गया। अगर जूती का चमड़ा गया तो तेरी जान भी चली जाएगी।

तुम नहीं हो इसलिए सांस लेते ही टूट गयी कहानी। 

[Photo : Ruth E Hendricks]

July 13, 2013

रेगिस्तान के किसान, रिफायनरी और शुभचिंतक नेता

मेरे सामने से एक सफ़ेद रंग की बाईस पच्चीस लाख रुपये कीमत वाली एसयूवी गाड़ी गुज़री। उसके बोनट पर एक पर्दा लगा हुआ था। उस पर लिखा था रिफायनरी बचाओ संघर्ष समिति। पर्दे पर इस लिखावट की पृष्ठभूमि में किसी पेट्रोलियम रिफायनरी की तस्वीर बनी हुई थी। अभी महीना भर पहले जो गाडियाँ दिखती थीं, वे गाड़ियाँ किसानों को उनकी कृषि भूमि से बेदखल होने से बचाने के लिए दौड़ती हुई दिखती थी। अचानक से पासा पलट गया है। चित्त की जगह पट ने ले ली है। जो भूमि बचाने पर आमादा थे वे अब भूमि देने पर आमादा हो गए हैं। मैं सोचता हूँ कि ये कौन लोग हैं जिनके पास पच्चीस पच्चीस लाख रुपये के मशीनी घोड़े हैं। जिनके पास इतनी दौलत है कि ये घोड़े हिनहिनाते हुये कुलाचें भरते ही जाते हैं। इनकी अश्वशक्ति का स्रोत क्या है? हालांकि मैंने गरीब और मजदूरों के आंदोलनों में भाग लिया है, मैंने उनके साथ चौराहों पर रातें बिताई है मगर इतना बड़ा आर्थिक राजनैतिक चिंतन करने में असमर्थ हूँ कि किसानों के पक्षधर इन दौलतमंद लोगों की असली मंशा क्या है। ये किसानों का हित क्यों चाहते हैं। ऐसे घोर कलियुग में भी ये सुखी सम्पन्न लोग ऐश भरा जीवन त्याग कर किसानों के बीच घूल फांक रहे हैं। ये लोग आम किसान का इतना भला चाहते हैं कि भलाई के हवन में अपनी अंगुलियाँ जला रहे हैं।

आप समझने की कोशिश कीजिये। माजरा ये है कि न दोहराए जा सकने वाले रेगिस्तान को मिले विकास के इस वरदान के बाद भारत सरकार के पेट्रोलियम मंत्रालय और इससे सभी आनुषांगिक संस्थानों की सहमति के बाद तय पाया गया था कि बायतु के लीलाला ग्राम और आस पास की ज़मीन पर रिफायनरी की स्थापना की जाएगी। इससे होने वाले विकास और इसके रेगिस्तान पर पड़ने वाले असर से अलग बस दो घटनाओं पर गौर करिए। इसकी पहली प्रतिक्रिया ये थी कि किसानों के आगीवाण बन कर आए नेताओं ने आंदोलन का उद्घोष किया। उनका माँगपत्र पढ़ कर आप हंसी से लोटपोट हो सकते थे। लेकिन वह माँगपत्र अब रेत में कहीं खो गया है। उनकी मांगों में करोड़ों का मुआवजा चाहिए था, ज़मीन के बदले ज़मीन भी चाहिए थी, रिफायनरी में किसानों की हिस्सेदारी भी चाहिए थी और उसी रिफायनरी में हिस्सेदार इन नए उध्योगपतियों को नौकरी भी चाहिए थी। भले लोग इसे हंस कर टाल सकते हैं मगर समझदार लोगों को ये बात साफ समझ आती है कि इस माँगपत्र के तले किया जाने वाला आंदोलन किसानों के हित के लिए नहीं था। ये आंदोलन रिफायनरी किसी सूरत में न लग पाये इसलिए किया जा रहा था। कोई ऐसा क्यों करेगा? मुझे दो तीन बातें ये समझ आई कि इसके बड़े राजनीतिक उद्धेश्य हो सकते हैं। इससे किसी स्थानीय चुनाव को प्रभावित किया जा सके और तीसरा कारण हो सकता है कि वर्चस्व की प्रतिस्पर्धा में शह और मात का खेल। इन तीनों ही कारणों से किसानों का कोई भला नहीं होने वाला है, ये हर कोई समझ सकता है तो क्या आंदोलनरत किसानों को ये बात समझ नहीं आई। वे किसान जिंहोने अपने श्रम और विवेक से इस उजाड़ रेगिस्तान की रक्षा की और अन्नदाता बन कर पेट पाला। वे किन कारणों से इस आंदोलन का हिस्सा थे या वास्तव में हिस्सा थे ही नहीं। इस आंदोलन के दौरान कई तरह के आयोजन हुये। इन आयोजनों का नेतृत्व कर रहे लोगों के चेहरे पर कभी कोई उदासी, कोई निराशा या हताशा नहीं देखी गयी। समाचारपत्रों और स्थानीय केबल टीवी पर दिखने वाले इनके चहरों पर एक खुशी थी। एक उल्लास था। क्या ये इस बात का था कि इन्हें कहीं ये मालूम हो गया था कि रिफायनरी यहाँ न लगाने देने का आंदोलन सफल होने वाला है।

राज्य सरकार के लिए रिफायनरी की स्थापना का पत्थर रोपना एक बेहद महत्वपूर्ण काम है। वह इसे किसी भी सूरत में टाल नहीं सकती है। विकास और उसके लाभ को भुनाने के अवसरों को कौन छोड़ देना चाहता है। किसानों के हित की बात करना नक्कारखाने में तूती की आवाज़ है। इसे न सुना जाएगा न सुनने दिया जाएगा। मेरे चाचा – ताऊओं की काश्तकारी की ज़मीन का अधिग्रहण किया गया है। उनको दिये गए मुआवजे मे असीमित असमानताएं हैं। सरकार ने जिस कंपनी के लिए ज़मीन का अधिग्रहण किया है, उसके लिए चुकाए गए मूल्य में दो गुने से ज्यादा अंतर है। ऐसा क्यों है? सरकार वही, कंपनी वही और ज़मीन भी वही। क्या ये तंत्र किसी बड़े के फायदे के लिए छोटे को छल लेने को जायज समझता है। ऐसा कैसे हो सकता है कि सरकार अपने किसान की जगह कंपनी की पक्षधर बन जाए। इसलिए कुछ किसान अब भी न्यायालय की शरण में हैं। उनकी भूमि पर सरकारी ज़ंजीर की आवाज़ दूर तक दौड़ चुकी है। ऐसे सभी किसानों और भविष्य में अवाप्त होने वाली लीलाला के किसानों की ज़मीन के बदले भी उचित मुआवजा मिलना चाहिए था। उनको कृषि योग्य ज़मीन कहीं और सरकार की तरफ से ऐलोट की जानी चाहिए थी। वह सपना टूट चुका है। इस सपने को तोड़ने वालों की पहचान के लिए ज्यादा सोचने की ज़रूरत नहीं है। ये वो लोग हैं जो एसयूवी पर सवार हवा से बातें करते हैं। इनके मक़सद कुछ और हैं।

अब जो नया आंदोलन चल रहा है, क्या उसकी मंशा किसानों को उनका हक़ दिलवाने की है? या इसके पीछे भी वैसे ही लोग हैं और उनकी सूरतें अलग अलग हैं। अब जो आंदोलन है वह कहता है कि रिफायनरी को बायतु से जाने नहीं देंगे। आने नहीं देंगे से जाने नहीं देंगे तक के सफर में नेतृत्व परिवर्तन हो चुका है। जबकि लीलाला, बायतु और तेल कुओं के आस पास का किसान अब भी उसी बदहाली में जी रहा है। उनके पास किसी से कोई उम्मीद नहीं है। विकास की राह में विकास होने की जगह आम आदमी को सपने दिखा कर उनको तोड़ने का काम प्रगति पर है। कुछ ज़मीन की खरीद फ़रोख्त से जुड़े लोग हैं। कुछ वे हैं जिंहोने किसानों से सस्ते दामों में प्रस्तावित रिफायनरी के आस पास की ज़मीन खरीदी और उसका बड़ा मुनाफा चाहते हैं। इस सारे घटनाक्रम को देखते हुये मैं सोचता हूँ कि अगर आम किसान सागर सिद्धिक़ी के इस शेर पर आ जाए तो जाने इन लीडरान साहेबो का हाल कैसा हो। सिद्दीक़ी साहब कहते हैं-

तेरी सूरत जो इत्तिफाक़ से हम, भूल जाएँ तो क्या तमाशा हो 
ये किनारों से खेलने वाले, डूब जाएँ तो क्या तमाशा हो

July 3, 2013

एक मरा हुआ आदमी कई बार सचमुच मरा हुआ नहीं होता है।

एक आदमी एक कहानी लिखता है। खिड़की से हवा का झौंका आता है और रुक कर सोचता है अगर मेरे हाथ में कुदरत एक हुनर रख दे कि मैं अतीत के रास्तों को अपनी इच्छा से मोड़ दे सकूँ। तो क्या उन रास्तों को अपने दिल के हिसाब से तरतीब में लाऊँ या फिर कुछ चीज़ें नज़रों से दूर कर दूँ और उनको कभी अपने करीब से न गुज़रने दूँ। 

उसने कुछ रात पहले तय किया कि ऐसी नंगी कहानी, जिसे पढ़ कर पत्नी और बच्चे नए सिरे से रिश्तों को समझने देखने लगें। जिसे पढ़ कर वे कुछ ऐसा पाएँ कि एक पीतल का बरतन था दूर से सोने सा चमकता था। इसके बाद उससे कोई सवाल करें कि तुम ऐसे क्यों थे? जब तक होश है इस कहानी को कहना मुमकिन नहीं है इसलिए वह इस कहानी को लिख कर इन्टरनेट पर प्रकाशित होने के लिए शेड्यूल कर देता है। यानि ये अगले साल छपेगी। वक़्त बीतता जाएगा और वह इसे रिशेड्यूल करता जाएगा। जिस दिन मर गया उसके कुछ महीने बाद कहानी होगी मगर किसी की बात सुनने के लिए वह आदमी न होगा। 

जो आप जी रहे हैं वही सत्य है, जो नहीं जीया वह असत्य। 

मरा हुआ आदमी किसी के सवालों के जवाब नहीं दे सकता है। इसलिए इस कहानी में वास्तविक नाम, जगह, दिन, घटनाओं के गवाह और बीस एक फोन नंबर, जो कहानी से वास्ता रखते हैं, उन सबको पूरा लिखता है। ताकि कोई भी मरे हुये आदमी की कहानी पर झूठ होने का दावा करने से पहले हक़ीक़त को जांच सके। लिखता है कि जो इस कहानी के किरदार हैं, वे जिनके साथ जीते हैं, उनको क्या सोचते हैं। सिवा इसके कि किसी के साथ सोना एकदम दो लोगों के बीच का निजी मामला है। इसमें चरित्र का कोई प्रश्न नहीं है। 

पाँच सितारा होटल में खाना खाकर बिल चुकाने की हैसियत रखने वाले आदमी का चोरी से एक चमच जेब में रख लेना। जानबूझ कर किया हुआ काम है। चोरी है मगर कुछ अच्छे मनोवैज्ञानिक इसे एक मामूली व्याधि बताकर चोरी के आरोप को नकार देंगे। इसलिए भी कहानी लिखने वाला आदमी खुश है कि कहानी की ऐसी घटनाओं को नज़रअंदाज़ कर दिये जाने की अपेक्षा रखता है। बाकी जिस तरह कहानी लिखने वाला आदमी अपने अतीत को बदल नहीं सकता है वैसे ही बाकी लोग भी उसी तरह बंधे हुये हैं। वे सिर्फ मुंह फेर सकते हैं। 

एक मरा हुआ आदमी कई बार सचमुच मरा हुआ नहीं होता है। 

हवा अब भी काफी तेज है। बादलों की छांव हैं। एक ऐसी छांव जिसका अगले कुछ पलों में टूट जाना तय है। जैसे प्रेम की छतरी हुआ करती है। 
* * *


घर में हुआ कुछ नहीं है।

दीवारें, जिन के ऊपर से
कूद कर भाग जाते थे वे ऊंची हो गयी हैं।

कद बढ़ गया लेकिन नीम के तने के पास
खड्डा हो जाने से
टहनी अब भी उतनी ही ऊंची रह गयी है।

पतले पहियों वाली सायकिल
जेब में रखने वाला रेडियो
बेटरी से चलने वाला वाल्कमेन
फोर्स टेन के सफ़ेद जूते, ओकजमबर्ग की सलेटी जींस
एक माउथ ऑर्गन और कुछ चवन्नी अठन्नियाँ
सब कुछ खो गया है
हालांकि घर में हुआ कुछ नहीं है।

एक लड़की सुबह
सायकिल पर सोजती गेट जाया करती थी
उसके लिए हॉस्टल के कमरे में सुबह जल्दी हो जाती थी।

कहना होता था
इधर कहीं अकेले में मिलो
कि तुमको बाहों में भर कर चूमने का मन है
मगर न देखा न छुआ न चूमा
न मिले कभी और न ही बिछड़े
फिर भी फ़ैज़ दिल में गाते रहते थे, आपकी याद आती रही रात भर।

मौसम आए गए,
बरस दर बरस गिरते गए
अनगिनत सूरतें खो गयी अतीत की गर्द में
और मुसाफिर दिल ने छोड़ दिया दुनिया का कारवां
कि अचानक तुम मिले।

तुम मिले तो सोचा कि कहाँ रखूँ
तुम गए तो सोचा कि कहाँ से खोज लाऊं।

इन शामों में थोड़ी कम कम पीता हूँ
ऐसा करने से दर्द कुछ ज्यादा ज्यादा होता है
मगर मुसलसल गुज़र रही है दुनिया, चल रहा है ज़िंदगी का कारोबार

देख रहा हूँ अपनी दो आँखों से कुछ रीत रहा है
एक उन दिनों से पहले, एक उन दिनों के बाद
और घर में हुआ कुछ नहीं है।
* * *

डरते हैं बंदूकों वाले