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एक चोर दांतों वाली लड़की की याद

And if I could
I'd throw away this world
I'd dress you all in pearls
I'd give you what you wanted

You're all I notice
In a crowded room
Your vacant motives
Unmoved, revealed

Medellia of my eyes
You're the emptiness of I
You're the reason that I drive
And if you say you will
I would love you still

And if I just could
Be anything for you
Just anyone at all
Anything that mattered, washed out

POSTED BY COREY AT 11:37 AM

मैं कल रात से एक तन्हा आदमी की डायरी को पढ़ रहा था। मैंने कुछ कवितायें और कुछ अर्ज़ियाँ कई कई बार पढ़ी। इस आदमी के बारे में जुलाई 2001 से फरवरी 2003 के बीच का अक्स दिखाई देता है। हम कहाँ से आते हैं और कहाँ खो जाते हैं। हम किन शब्दों से बनते हैं और किन शब्दों के साथ खत्म हो जाते हैं। मुझे नहीं मालूम कि आप कभी दूसरों की खुली ज़िंदगी में झांकना पसंद करते हैं या नहीं। इसलिए भी कि तनहाई जितनी खौफ़नाक है उतनी ही हमदर्द भी हुआ करती है।

इस ब्लॉग का लिंक मैंने रात को अपने फेसबुक पेज़ शेयर किया था। इसलिए कि शायद रात के वक़्त आप जागे हुये हैं और रोने के लिए महबूब के घुटने तलाश रहे हैं। या शायद आपकी जो हवस है उसी से डर कर आपने एक भले मानुष के पर्दे की ओट ले रखी है। आपकी खिड़की से बरसात के गिरने की आवाज़ आ रही है मगर शायद आप डर रहे हों कि पानी के साथ आपका रंग उतर न जाए और प्रेम जिसे नाम दिया है उस वहशत देख कर दुनिया से भाग जाने का सिरफिरा खयाल न घेर ले।
* * *

हवा की सरगोशी की शक्ल में वक़्त का एक लम्हा मेरे कान के पास से गुज़रा। पैमाने में बस ज़रा सी वोदका और ज़रा सा पानी बचा हुआ था। मैंने उसे छत के बीच उछाल दिया। बरसात से पहले, हवा शायद इसे उड़ा ले जाएगी। साथ ही एक चोर दांतों वाली लड़की को याद करके मुसकुराना भी...

फिलहाल ऊपर देखो तो कुछ बरसे हुये बादल हैं जैसे रात की सलवटों से भरा लिहाफ़ आसमान में टंगा है।
* * *

पश्चिम से आती हवा से मुंह फेरते हुये उसने सुना।

क्या पत्थरों, ताबीजों और किताबों से ही मुकम्मल हो जाता है कोई? उस घड़ी, जब एक बार उसने बावजह छू जाने दिया था। उससे बड़ा सुकून का सबक कोई क्यों न रहा ज़िंदगी में। तुम्हें मालूम है खत्म कुछ नहीं होता। हम किसी फरवरी महीने की एक गुनगुनी नज़र को गरम दिनों की धूप में भी ज़िंदा कर सकते हैं। जैसे किसी ने हाथ आगे बढ़ा कर खींच लिया हो।

तुम कहाँ पड़े होते अगर उसने गले न लगाया होता। कि गले लगाने के लिए सचमुच का बाहों में भर लेना ज़रूरी नहीं होता। कई छोटे छोटे संदेशे ये काम बखूबी कर लेते हैं। जब आप पाएँ कि आप लगातार उसी तरफ देख रहे हैं, उसी को सोच रहे हैं और उसी से कोई ख़्वाहिश भी नहीं है तब आप उसके सच्चे प्रेम में होते हैं।

ये सब कौन किससे कह रहा था। हवा अब भी पश्चिम से ही आ रही है मगर दिखता कोई नहीं।

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…