और कुछ याद, दाल और तुरई की


इस वक़्त हल्की फुहारें गिर रही हैं। छत पर एक दीवार के सहारे टेबल रखी है। इस पर एक हरे रंग की पर्ल पेट की पानी बोतल, एक बोरोसिल का काँच का ग्लास, एक ब्लेकबेरी का फोन, एक लेनोवो का टूटा फूटा लेपटोप, दो रीबॉक के घिसे हुये काले सेंडल जो मेरे पाँवों में हैं, रखे हुये हैं।

ये सब इस दुनिया की चीज़ें हैं। मैं कहाँ हूँ, मालूम नहीं।
* * *

ऐसा नहीं है
कि सब आसान है इस चुप्पी में।

इसमें खिली हुई है
बिना अदरक वाली
कुछ चाय की प्यालियाँ
और कुछ याद, दाल और तुरई की।

बाकी जो है
उसका हिसाब मिल नहीं रहा
वरन मैं आवाज़ देता तुमको फिर से।

कहो ये भी क्या ज़िंदगी है दो दिन की ?
* * *

सिर्फ तुमको ही कहानी सुनना चाहता हूँ।

कुछ गए गुज़रे आवारा लड़कों से गलियों में रौनक थी और कुछ दरीचों से झाँकती हुई बेशर्म लड़कियों से ज़ीनत। इन दो चीज़ों के होने से ही बूढ़ी औरत रास्ते में पड़े पत्थर के टुकड़ों को ठोकर से उड़ा देती। फिर ज़रा झुक कर अपनी पगरखी की नोक को देखती। कहती- काना मोची आज तूँ फिर बच गया। अगर जूती का चमड़ा गया तो तेरी जान भी चली जाएगी।

तुम नहीं हो इसलिए सांस लेते ही टूट गयी कहानी। 

[Photo : Ruth E Hendricks]

Popular posts from this blog

पतनशील पत्नियों के नोट्स

चुड़ैल तू ही सहारा है

मैं कितना नादान था।