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ये सिस्टम किसका सिस्टम है?

जिस काम को एक साल पहले पूरा हो जाना चाहिए था। वह काम अभी तक प्रगति पर है। इस तेल नगरी में विकास की असीमित संभावनाएं हैं। इसलिए जिस तरह नए खिल रहे फूलों के आस पास अनेक कीट पतंगे, उन कीटों के लिए अनेक चिड़ियाएं और उन चिड़ियाओं के लिए अनेक मँझले शिकारी पक्षी जमा हो जाते हैं। वैसे ही यहाँ लाभ के चाहने वालों का बड़ा जमावड़ा है। जो निरंतर बढ़ता ही जा रहा है। शहर एक ऐसी दुकान हो गया है। जिसमें सामान ज्यादा और जगह कम है। धन दौलत के मुरीद इस शहर में आए तो अपने साथ एक कारवां लेकर आए। अब ये गाड़ी घोड़े इस ढब और आकार के निकले कि शहर की गलियाँ तंग हो गयी। शहर को दो भागों में बांटने वाली रेल पटरी के दोनों तरफ जाम लगने लगा। इस पटरी को पार करना थके हुये चेतक के नाले के पार जाने से पहले का हाल बन जाता रहा। लोगों ने आंदोलन किए। ज्ञापन दिये। मांगों के समर्थन में चिट्ठियाँ लिखी। तब जाकर सरकार को मालूम हुआ कि इस कस्बे में गुज़रने वाली रेल को दोनों तरफ ट्रेफिक जाम हो जाता है। 

जहां कहीं कोई जन समस्या है उसकी सूचना देना और उसके निस्तारण के लिए लड़ना जनता का काम हो गया है। गलियों में सफाई नहीं होने से लेकर जीवन रक्षा के लिए बने अस्पतालों में चिकित्सकों की कमी के बारे में भी जनता को ही बताना पड़ता है। मैं सोचता हूँ कि अगर किसी अस्पताल में मरीजों के अनुपात में चिकित्सक कम है तो ये खयाल रखना किसका काम है? कोई ऐसा सिस्टम तो ज़रूर होगा जो अस्पतालों में इस हिसाब को देखता और और उसके अनुरूप कोई व्यवस्था करता होगा। लेकिन ऐसा कभी सुनने और देखने में नहीं आता कि मरीज किसी कतार में खड़ा हुआ इंतज़ार नहीं कर रहा है। आम आदमी से जुड़े हर ज़रूरी मसहले का हाल यही है। कतार है बस एक न खत्म होने वाली कतार। सिस्टम जाने किस कम के लिए बना है। उसमें हर स्तर के अधिकारी जाने किस चीज़ की निगरानी करते हैं। वे क्या ऐसा बनाते हैं जिससे कतारों में बढ़ोतरी होती जाती है। 

आप पढे लिखे हैं। एक ओवरब्रिज बनना था, कई सालों से अटका ही पड़ा है। आपके पास इंजिनयरिंग कि आला डिग्रियाँ हैं, आपने वास्तुकला को सीखा है, आपकी इन सब योग्यताओं के कारण ही आपको सरकार के उच्च पदों पर आसीन किया है। फिर एक बात बताइये कि जो काम दो साल में पूरा होना होता है वह चार साल तक क्यों लटका रहता है? क्या इसमें आपको किसी से कोई उम्मीद है, कोई इसको रुकवाता है? और ऐसा कुछ होता है तो क्या उसकी कहीं शिकायत करने और जनता को कष्ट देने के बदले किसी सज़ा का प्रावधान है या नहीं। लेकिन सच तो ये है कि जनता अगर आंदोलन न करे तो समस्या की जूं भी सिस्टम के कान पर नहीं रेंगती। ये ऐसा सिस्टम किसने बनाया है? ये ऐसा सिस्टम किसके लिए बनाया गया है। 

सिस्टम को गरियाने वाले लोगों को कुछ लोग ये कह कर भी गरियाते हैं कि आप खुद सिस्टम को ऐसा बन जाने देते हैं। डॉ अशोक चौधरी आज कल एक नीली जींस और कुर्ता पहने हुये नागौर और आस पास के गांवों के विध्यालयों, पंचायतों, जोहड़ों और जनता के भले से जुड़ी सभी जगहों पर जाते हैं। आप पेशे से डॉक्टर हैं। भारतीय पोस्टल से सेवा के उच्च अधिकारी रहे हैं। अब आम आदमी की अबखाइयों को दूर करने के लिए उस बड़ी सरकारी कुर्सी को छोड़ चुके हैं। पिछले साल के आखिर में अभिनव राजस्थान नामक आंदोलन को संबोधित करते हुये उन्होने कहा कि आम आदमी ने मान लिया है कि सिस्टम किसी और का है, वह भूल चुका है कि सिस्टम उसका है। इस सिस्टम की देखभाल के लिए कुछ नौकर रखे हुये हैं, जो जनता के पैसे से पगार पाते हैं। डॉ चौधरी के आंदोलन का मुख्य लक्ष्य स्थानीय रोजगार के साधनों को लघु कारखानों में बदलना है। अपने पैसे को बाहर जाने देने की जगह बाहर का पैसा अपने यहाँ लाना है। यही विकास का सच्चा मार्ग है। 

हमें अपने देश से प्रेम हैं। हम अपने इस देश को सबसे सुंदर देखना चाहते हैं। लेकिन हम करते क्या हैं। हम विध्यालयों को शिक्षा का मंदिर मानते हैं लेकिन निजी विध्यालयों के प्रचार के पोस्टर हमारे शहीदों की स्मृति में बने स्मारकों, संतों और देशभक्तों की प्रतिमाओं पर चिपके होते हैं। ये विध्यालय के प्रतिनिधि जो किसी शहीद का सम्मान करना नहीं जानते हैं वे उस विध्यालय में बच्चों को क्या पढ़ाएंगे। इन्हीं स्मारकों में से एक सीमावर्ती जिले के शहीद स्मारक को पोस्टरों से इस कदर ढक दिया गया कि शहीदों के नाम लालच की भूख के नीचे दब गए। ये स्मारक नगर परिषद की देख रेख में है। माने नगर परिषद का है। हमारा इससे क्या मतलब हम तो जैसा चाहें वैसा सुलूक करें। 

इन स्मारकों की देखभाल के लिए कोई सिस्टम दिखाई नहीं देता है। आखिर कुछ रोज़ पहले एक शहीद की बेटी ने अपनी सखियों के साथ मिल कर शहीद स्मारक को लालच और गंदगी से मुक्त करवाया। वे नन्ही लड़कियां धूप से भरी दोपहर में पसीने से भीगी हुई मेहनत करती रही। तब भी किसी सिस्टम को याद नहीं आया कि इन बच्चियों को शाबाशी दी जाए और ये काम उनसे करवाया जाए जिनका ये जिम्मा है। दो दिन बाद शाम के वक़्त दफ़्तर से लौट रहा था। विवेकानंद सर्कल पर वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी इंद्र प्रकाश पुरोहित अपने दोस्तों के साथ काम में लगे हुये थे। मैंने उनके पास रुक कर देखा। वे कहते हैं देखो सिस्टम का हाल क्या है। जो लोग अभी सुराज संकल्प यात्रा के जरिये नए राज के लाने की बात कर रहे हैं। सबसे ज्यादा उन्हीं के पोस्टर इस संत की प्रतिमा को भद्दा किए हुये हैं। मैं सोचता हूँ कि इन्दु जी और उनके दोस्त कितनी बार इस गंदगी को साफ करके नए सुंदर देश को तामीर करने की कोशिश करेंगे। जबकि जो भी राज करना चाहता है उसका पहला मकसद सबकुछ मिटा कर खुद को बनाना है। 

देश का विकास और उसकी सुंदरता कुछ गिने चुने लोगों का ख्वाब भर है।

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
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उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
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नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…