मैं उस रोशनी में जाकर क्या करूंगा

सबसे ऊंचे टीले पर मैंने रेत के बीच बनाया है एक गोल छोटा प्यारा सा ट्रेप। और मैं चुप होकर कर बैठ गया हूँ इसके नीचे रेत में छुप कर। इसके पास से गुज़रते ही मेरे दिल की बारीक मिट्टी तुमको खीच लेगी गहरी गोल खाई में। मैंने अपने दांत तोड़ दिये हैं, मैंने सिर्फ कोमल रोएँ वाली भुजाएँ बचा कर रखी है। कि जब तुम फंस जाओगे मेरे इस जाल में तब रेत के नीचे ठंडे अंधरे में तुमको बाहों में भरे आहिस्ता आहिस्ता छूकर प्रेम कर सकूँ।

मैं दुआ करता हूँ कि एक दिन बेखयाली में जो तुमने सोचा था, वह सच हो जाए।

[1]

मैं उस रोशनी में जाकर क्या करूंगा
जहां रंग बिरंगे कागज़ों के टुकड़े
और आवाज़ों के शोर की मजलिस।

कि ऐसा वो मंज़र
जहां हर कोई भूला हो खुद की ही दुनिया
देख न सके कोई दिल की हालत है कैसी
और न सोचे कोई
कि मन में ये कैसी खामोशी गूँजती है
वहाँ मैं क्या करूंगा और तुम क्या करोगे।

आओ कि
इस अंधेरे में भी तुम्हारे होने को सोच कर
मेरे दिल को भी सुकून रहेगा
तुम भी खुश ही रहोगे मेरी बेकसी देख कर।

आओ ! मेरी इस छत पर बैठो
कि तनहाई फिर भी यहाँ कायम रहेगी
एक मुद्दत से तुम तो यूं भी मुझसे बोलते नहीं हो।

[जब रगों में दौड़ते खून में एल्कोहल कम हो जाता है तब बस इतना ही प्यार आता है।]

[2]

शाम उतरती देख गली में
सोचोगे तुम तनहा बैठे
ये किसके डूबे दिल की परछाई है।

कौन अभी तक आना है बाकी
किसकी नाम की ताज़ा सदाएं
टंगी हुई है पीपल की शाखों पर।

ये कौन रात में चुप रोता है।

तुम आए ही नहीं, अब क्या कहना
कोई जाता होता तो उसको रोक भी लेते

[उदासी एक अंतहीन उत्सव है, खुशी पल भर का तमाशा है। इंतज़ार एक लंबी ज़िंदगी का नाम है।]
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