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सामने खड़ी पीछे छूटी हुई चीज़ें

तुम दो बरस का मतलब जानते हो?

कल की दोपहर मुझसे यही पूछती रही. रेगिस्तान की हवा खिड़कियों के रास्ते धूल लिए चली आ रही थी. हवा की आवाज़ में सिहरन थी मगर मन इस सांय-सांय से बेखबर अपने दूजे ख़यालों में डूबा रहा. एक सूखा पत्ता सोने के कमरे में पलंग के पांवों तक चला आया. साफ़ आँगन में बारीक धूल की परत पर पड़ा हुआ सूखा पत्ता. जब मौसम शबाब पर होता है तब दीवारों के पार तक आता है. पतझड़ भी आँगन, बरामदे के रास्ते होता हुआ कहाँ तक न पहुंचा. एक बार मन हुआ कि इस पत्ते को उठा लूँ. लेकिन फिर टूटी हुई चीज़ों को सहेजने की तकलीफ के दिन याद आये. मैंने जो हाथ उस पते की तरफ बढाया न था, उस हाथ को वापस खींच लिया.

पल, घडी, दिन, रात और बरस.

तुम देख रहे थे. तुम पढ़ रहे थे. तुम समझ रहे थे. क्यों फिर इस तरह आँख मूंदे रहे. क्यों तुमने चुना कि आँखों में धोखे का सम्मोहन भरो और बने रहो.

एक धुंधलाती हुई शाम है. एक सुल्फी है. माने चिलम है. एक तम्बाकू की पोटली है. जले हुए तम्बाकू की गंध से भरा पैरहन है. एक ऊंट है. और एक वीराना है. उसने पूछा- "ये कैसी गंध है?" मैं अपने बाजू को उठाता हुआ सूँघता हूँ. वहां सिर्फ पसीने और बीते सफ़र की गर्द की गंध है. मैं बहुत दूर चला आया हूँ. पीछे की ओर देखता हूँ. एक ठिकाना याद आता है. कोई कह रहा था- "तुम बिन न जीया जायेगा" मैं अपना थैला उठाकर, उसका लम्बा पट्टा गले में पहन लेता हूँ. मेरी कमर के दायीं तरफ भूरे रंग का थैला लटका रहता है. आखिरी बार लगातार कुछ एक पल उसकी तरफ सख्त निगाह से देखता हूँ. एक भीगी उदास आवाज़ आती है- "मैंने किया कुछ न था. वो बस यूं ही मिला करता था"

दो पट्टियों वाले सेंडल में पाँव रखता हूँ. मेरे लम्बे पांवों पर हल्का सा पानी बचा हुआ है. मैं जब भी नहाकर आता हूँ, तोलिये से पाँव नहीं पोंछ पाता. वे भीगे ही रहते हैं. तलवे अक्सर भीगे हुए सेंडल या जूतों को पहन लेते हैं. सीलापन तलवों से आँखों तक. सेंडल की पट्टी को कसते हुए आखिरी बार उसकी तरफ देखता हूँ. उसकी आँखों में एक अफ़सोस दीखता है. अपने किये का नहीं, मेरे वहां से जाने का.

तीन बार सीढियों पर मुड़ते हुए एक खुली सड़क आ जाती है. मेरे पास सिर्फ एक थैला है, बाकी सबकुछ मैंने छोड़ दिया. मैं राह चलता हुआ दुकानों के भीतर झांकता हूँ. क्या मुझे कुछ खाना चाहिए? मुझे बहुत दूर तक सफ़र करना है. मैं एक-दो दुकानों के आगे रुकता हूँ मगर नहीं रुकता. मन खाने का नहीं है. दिमाग कहता है- खा लो. पहले मोड़ पर पान की दूकान पर रुकता हूँ.- "क्लासिक" दूकान वाला इशारा करता है. सामने सफ़ेद और सोने के रंग वाली पेकिंग रखी थी. मैंने सोने के रंग वाली पेकिंग की तरफ इशारा किया. बैग की जेब टटोलता हूँ.

लाइटर पीछे छूट गया था. 

एक फ़ाइल में कुछ एक तस्वीरें थी. वे अनायास गिरीं. उसने मेरा थैला खोला और लाइटर लेकर, वे तस्वीरें जला दी.

बस अपने नियत स्टॉप्स पर रूकती रही. जितनी सवारियां चढ़ीं उससे ज्यादा लू चढ़ी. खिड़कियों के कांच ताप गए. ख़यालों में खोये हुए. सड़क के किनारे खड़े दरख्तों के साए में बैठे लड़के लड़कियों को देखते हुए मैं आख़िरकार उस क़स्बे तक आ गया जहाँ नौकरी के लिए रहता था. अपने कमरे तक पहुंचा तो देखा कि जीप बेहद बुरे हाल में है. उसको कहीं से भी छू सकना संभव नहीं है. उसका आर्मी वाला रंग पूरी तरह धूसर हो चुका है. कमरे की कुण्डी खोलकर अन्दर गया तो वही धूसर रंग पसरा हुआ था. एक कोने में पड़े बिस्तर पर गर्द ही गर्द थी. आलों में रखी किताबें, अलगनी से टंगे कपड़े और ऑडियो प्लेयर भी उदास धूल से सने थे. वहां रुकने का मन न था. मैं जिस तरह सफ़र से आया था उसी तरह बाहर निकल गया. सोचा कई बार कि फिर से नहा लूँ. नहीं नहाया कि सुबह ही तो नहाया था. उसके लम्बे चौड़े वाशरूम में कुछ देर ये सोचना कितना कठिन था कि अब कभी न आऊंगा. मन रोया या उदास था मालूम नहीं मगर वहां खड़े होना और ये सब सोचना अच्छा नहीं था.

स्टेरिंग थामे हुए रेगिस्तान  के धोरों, कहीं-कहीं दीखते दरख्तों, गाँवों के बाज़ारों से होकर गुज़रती सडकें देखता रहा. सब कुछ चुप पीछे छूटता जाता था. मन के किसी कोने में एक ही बात बार-बार फिरती. किसलिए? क्यों हमारी गुज़र किसी एक के साथ नहीं हो सकती. पसीना, लू और सूनापन. तीन-एक घंटे बाद हाथ थक जाते हैं. एक्सीलरेटर वाला पाँव अकड़ जाता है. सड़क किनारे के छाँव के पास गाड़ी रोक देता हूँ. कुछ एक बेतरतीब पड़े पत्थरों में भी एक लय थी. शायद कोई पहले भी यहाँ बैठा था. क्या इसी तरह हताशा से भरा हुआ या किसी के इंतजार में? नहीं मालूम. कि वो जो था जा चुका था.

जो जा चुके हों उनका क्या होता है?

कल शाम फिर बेहिसाब अपनी खुद की याद आई. लानतें दी, कोसने भेजे. बहुत साल पहले तुमने तय किया था कि एक ज़िन्दगी में दो साल बहुत बड़े होते हैं. तुम कैसे इनको बर्बाद कर सकते हो. और बाद सालों के तुमने फिर से यही किया है. तुम अंधे हो. तुम बहरे हो. तुम मूर्ख हो.

एक आखिरी ठोकर मारो खुद को कि 

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
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मेरी आँखों में
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नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
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