Skip to main content

कासे में भरा अँधेरा

“माँ, तुम मेरी चिंता करती हो. एक आदमी की प्रतीक्षा करती हो. एक मूरत पर विश्वास करती हो.”

रेहा के कहने का ढंग चुभ गया था या इस बात को माँ सुनना नहीं चाहती थी. उनका चेहरा कठोर हो आया था. “जो बातें समझ न आये वे नहीं करनी चाहिए”

“समझने के लिए ही पूछा है”

माँ कुछ नहीं कहती पहले रेहा की तरफ देखती है फिर दीवार के कोने में झाँकने लगती हैं. चेहरा स्थिर से जड़ होता जाता है. रेहा पास सरक कर माँ के कंधे पर अपनी हथेली रखती है. “बुरा न मानों माँ. ऐसे ही कई बार लगता है कि तुमसे पूछूं. तो आज पूछ लिया”

“तुम्हें मालूम है? तुम्हारी उम्र क्या है? इस साल तुम पंद्रह की हो जाओगी” 
“हाँ तो?”
“तो ये एक आदमी की प्रतीक्षा क्या होता है? कैसे बोलती हो?..”

रेहा ने माँ को कभी ऐसे नहीं सुना. वे शांत रहती हैं. उनका चेहरा ठहरा रहता है. उनके चेहरे की लकीरें, रंगत, फिक्र, ख़ुशी कभी नहीं बदलती. लेकिन उन्होंने चिढ कर कहा था. इस चिढ में दुःख भी था. उन्होंने अपने हाथ भी कुछ इस तरह उठाये जैसे जो बात शब्दों से न कही गयी उसे इशारे से कहना चाहती हों.

“माँ.” रेहा ने आहिस्ता से कहा. इसमें एक अर्ज़ भी थी कि दुखी न होइए.

“हम कैसे थे? ये समझ नहीं पाए थे. हमको वे चीज़ें समझने में वक़्त लेने की जगह सही वक़्त पर फैसले करने थे. जब तुम चौथे साल में तभी सब सब्र टूट गया था. मुझे मालूम हो गया था कि हम एक साथ रहने को नहीं बने हैं. मैंने ही उनसे कहा था कि हम एक ही छत के नीचे रह सकते हैं. उनको नहीं रहना था.”

“माँ क्या मैं पूछ लूँ कि ऐसा क्या था?”

“एक रोज़ सब मिट जाता है. बोलने में अपरिचय घुल जाता है. हम उसको सुनते हैं मगर लगता है कि शब्द ठंडे और ज़रूरत के हैं. छूने में वो बात नहीं होती. वो जिससे आपको लगे कि कोई आपका अपना है. वे इस तरह पास आते जैसे कोई काम था और... और हो गया...”

“क्या वे प्यार करते थे?”

“हाँ, अपनी सहूलियत का.”

“तो आपने क्यों नहीं किया?” रेहा माँ की आँखों में देखती है. “और मैं कहती हूँ कि किसकी प्रतीक्षा करती हैं तो इस तरह डांटने लगती हैं”

दो चिड़िया खिड़की के रास्ते उडती आई. छत पंखे का फेरा देकर परदे पर बैठ गयी. माँ ने चिड़ियाँ नहीं देखी. वे दीवार को देखती रही. रेहा ने चिड़ियाँ देखी. उनकी तेज़ बातें सुनी. फिर माँ की ओर मुंह करके बोली- “माँ बताओगी क्यों नहीं किया?”

“जिस दिन तन मिल जाता है उस दिन मन भर जाता है”

एक चिड़िया परदे के पास रखे मिट्टी के सांवले रंग के गुलदस्ते पर बैठी और वह गिर पड़ा. टूटे गुलदस्ते के कुछ टुकड़े रेहा के पाँव के पास आकर गिरे. कागज़ के फूलों से लदी टहनियां दरवाज़े के पास बिखरी गयी. बैंगनी और गुलाबी रंग एक साथ अच्छे दिख रहे थे. भले ही वे फर्श पर पड़े हुए थे.

[कागज़ के दो कप में स्ट्राबेरी फ्लेवर वाली आइसक्रीम- तीन]

तस्वीर सौजन्य : सुनयना खोत 

Popular posts from this blog

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

मन में छुपे बुलावे

टूटे पंख की तरह  कभी दाएं, कभी बाएं  कि कभी हवा में तैरता मन। 
आँखें पास की दीवार, छत, पेचदार सड़क या खुले आसमान की ओर रह जाती है जबकि मन चुपके से कहीं दूर निकल जाता है। मैं उसी जगह बैठा हुआ पाता हूँ कि खोया हुआ मन जहां गया है, वह कोई चाहना नहीं है। मन का जाना ऐसा है जैसे वह निरुद्देश्य भटक रहा है। 
मैं उसे पकड़कर अपने पास लाता हूँ। उसी जगह जहां मैं बैठा हूँ। वह लौटते ही मुझे उकसाता है। अब क्या करें? मैं भी सोचता हूँ कि क्या करें? कुछ ऐसा कि नींद आ जाए। थकान आँखें बुझा दे। कोई मादक छुअन ढक ले। कोई नशा बिछ जाए। ये सब हो तो कुछ ऐसा हो कि जागने पर नींद से पहले का जीवन भूल सकें। 
यही सोचते, मन फिर बहुत दूर निकल जाता है। * * *
पर्दा हल्के से उड़ता है  जैसे कोई याद आई और झांककर चली गयी। 
हम किसी को बुलाना चाहते हैं मगर ऐसे नहीं कि उसका नाम पुकारें। हम उसके बारे में सोचते हैं कि वह आ जाए। वह बात करे। किन्तु हम इन बुलावों को मन में ही छुपाए रखना चाहते हैं। 
कभी-कभी हम इस चाहना से शीघ्र मुक्त हो जाते हैं और कभी हम सोचने लगते हैं कि किस तरह उसे बुला लिया जाए और साथ ही ये भी न लगे कि हमने बुलाया ह…

सपने में गश्त पर प्रेम

होता तो कितना अच्छा होता कि हम रेगिस्तान को बुगची में भरकर अपने साथ बड़े शहर तक ले जा पाते पर ये भी अच्छा है कि ऐसा नहीं हुआ वरना घर लौटने की चाह खत्म हो जाती. 
अक्सर मैं सोचने लगता हूँ कि
क्या इस बात पर विश्वास कर लूँ?

कि जो बोया था वही काट रहा हूँ.
* * *

मैं बहुत देर तक सोचकर
याद नहीं कर पाता कि मैंने किया क्या था?

कैसे फूटा प्रेम का बीज
कैसे उग आई उस पर शाखाएं
कैसे खिले दो बार फूल
कैसे वह सूख गया अचानक?
* * *

कभी मुझे लगता है
कि मैं एक प्रेम का बिरवा हूँ
जो पेड़ होता जा रहा है.

कभी लगता है
कि मैं लकड़हारा हूँ और पेड़ गिरा रहा हूँ.
मुझे ऐसा क्यों नहीं लगता?

कि मैं एक वनबिलाव हूँ
और पाँव लटकाए, पेड़ की शाख पर सो रहा हूँ.
* * *

प्रेम एक फूल ही क्यों हुआ?
कोमल, हल्का, नम, भीना और मादक.

प्रेम एक छंगा हुआ पेड़ भी तो हो सकता था
तक लेता मौसमों की राह और कर लेता सारे इंतज़ार पूरे.
* * *

जब हम बीज बोते हैं
तब एक बड़े पेड़ की कल्पना करते हैं.

प्रेम के समय हमारी कल्पना को क्या हो जाता है?
* * *

प्रेम
उदास रातों में तनहा भटकता
एक काला बिलौटा है.

उसका स्वप्न एक पेड़ है
घनी पत्तियों से लदा, चुप खड़ा हुआ.

जैसे कोई मह…