Skip to main content

लगा लो होठों से

इतनी कसमें न खाओ घबराकर 
जाओ हम एतबार करते हैं.

उस आखिरी कश में क्या होता है? अक्सर मैं मांग लेता हूँ. उसने शेयर करना जाने कब का छोड़ दिया होगा कि देने से पहले एक सवालिया निगाह उठती है. उसने ज़रा सा जाने क्या सोचकर अपनी अंगुलियाँ आगे कर दी.
यही कोना है, मेरा. ऐसा सुनते हुए मैं उसकी अँगुलियों से आखिरी कश चुन लेता हूँ. क्या उसके लबों को छूकर ठहरी चीज़ें बेशकीमती हो जाती हैं. हो ही जाती होंगी कि मैं अपनी नादानी पर चुप रखे हुए धुएं को रोशनदान से बाहर जाते हुए देखता हूँ.
आह ! किस चीज़ को किस चीज़ से मिला रहा हूँ मैं. 

कभी किसी परिंदे का मन भी उस बाग़ से भी उठ जाता होगा. जिस बाग़ से सुकून और अपनेपन की आस रहती थी. कई बार वे रास्ते भी फीके लगते हैं, जिनपर चलते हुए वक़्त जाने कहाँ चला जाता था. कई बार खिड़कियाँ वहीँ रहती हैं मगर बाहर के सब दृश्य गुम हो जाते हैं. कई बार हम वो नहीं होते जो कभी थे. 
इसी होने और बदल जाने के बीच, अतीत को धन्यवाद. 
अगर वह सबकुछ न जीया होता. तकलीफें हिस्से न आई होती. वो बना ही रहता अपने आवरणों के भीतर और सजा आगे खींचती ही जाती. तो क्या कर सकते थे. उस रोज़ धूप ज्यादा थी मगर लगी नहीं. इसलिए कि कड़ी तपिश से बाहर आ जाने पर कुछ चीज़ें आसान लगने लगती हैं. असल में खुले पाँव और खुली आत्मा हज़ार अनचाहे हाल बरदाश्त कर सकते हैं.  और आप एक सूने अनजाने रास्ते पर आगे बढ़ सकते हैं. कहीं जाने का तय न हो. कहीं कोई न हो, तब भी. 
फिर मैं उसी तलब से घिरता हूँ इसे लिखते हुए. हाँ वही धुंआ.रुखसारों को चूमता. आँखों में चुभता. खिड़की के रास्ते बाहर जाता हुआ धुंआ. एक शाम के अहसास का धुंआ. कि इस वक़्त यहाँ की सीली ठंडक में ज़रा सी तपिश घुली है. ये तरतीब से रखी चीज़ें और इनके सामने खड़ी हुई बेतरतीब ज़िन्दगी. 

लगा लो होठों से, ये एक हसरत है. शुक्रिया. 

Popular posts from this blog

मन में छुपे बुलावे

टूटे पंख की तरह  कभी दाएं, कभी बाएं  कि कभी हवा में तैरता मन। 
आँखें पास की दीवार, छत, पेचदार सड़क या खुले आसमान की ओर रह जाती है जबकि मन चुपके से कहीं दूर निकल जाता है। मैं उसी जगह बैठा हुआ पाता हूँ कि खोया हुआ मन जहां गया है, वह कोई चाहना नहीं है। मन का जाना ऐसा है जैसे वह निरुद्देश्य भटक रहा है। 
मैं उसे पकड़कर अपने पास लाता हूँ। उसी जगह जहां मैं बैठा हूँ। वह लौटते ही मुझे उकसाता है। अब क्या करें? मैं भी सोचता हूँ कि क्या करें? कुछ ऐसा कि नींद आ जाए। थकान आँखें बुझा दे। कोई मादक छुअन ढक ले। कोई नशा बिछ जाए। ये सब हो तो कुछ ऐसा हो कि जागने पर नींद से पहले का जीवन भूल सकें। 
यही सोचते, मन फिर बहुत दूर निकल जाता है। * * *
पर्दा हल्के से उड़ता है  जैसे कोई याद आई और झांककर चली गयी। 
हम किसी को बुलाना चाहते हैं मगर ऐसे नहीं कि उसका नाम पुकारें। हम उसके बारे में सोचते हैं कि वह आ जाए। वह बात करे। किन्तु हम इन बुलावों को मन में ही छुपाए रखना चाहते हैं। 
कभी-कभी हम इस चाहना से शीघ्र मुक्त हो जाते हैं और कभी हम सोचने लगते हैं कि किस तरह उसे बुला लिया जाए और साथ ही ये भी न लगे कि हमने बुलाया ह…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

सपने में गश्त पर प्रेम

होता तो कितना अच्छा होता कि हम रेगिस्तान को बुगची में भरकर अपने साथ बड़े शहर तक ले जा पाते पर ये भी अच्छा है कि ऐसा नहीं हुआ वरना घर लौटने की चाह खत्म हो जाती. 
अक्सर मैं सोचने लगता हूँ कि
क्या इस बात पर विश्वास कर लूँ?

कि जो बोया था वही काट रहा हूँ.
* * *

मैं बहुत देर तक सोचकर
याद नहीं कर पाता कि मैंने किया क्या था?

कैसे फूटा प्रेम का बीज
कैसे उग आई उस पर शाखाएं
कैसे खिले दो बार फूल
कैसे वह सूख गया अचानक?
* * *

कभी मुझे लगता है
कि मैं एक प्रेम का बिरवा हूँ
जो पेड़ होता जा रहा है.

कभी लगता है
कि मैं लकड़हारा हूँ और पेड़ गिरा रहा हूँ.
मुझे ऐसा क्यों नहीं लगता?

कि मैं एक वनबिलाव हूँ
और पाँव लटकाए, पेड़ की शाख पर सो रहा हूँ.
* * *

प्रेम एक फूल ही क्यों हुआ?
कोमल, हल्का, नम, भीना और मादक.

प्रेम एक छंगा हुआ पेड़ भी तो हो सकता था
तक लेता मौसमों की राह और कर लेता सारे इंतज़ार पूरे.
* * *

जब हम बीज बोते हैं
तब एक बड़े पेड़ की कल्पना करते हैं.

प्रेम के समय हमारी कल्पना को क्या हो जाता है?
* * *

प्रेम
उदास रातों में तनहा भटकता
एक काला बिलौटा है.

उसका स्वप्न एक पेड़ है
घनी पत्तियों से लदा, चुप खड़ा हुआ.

जैसे कोई मह…