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सब कुछ उसी के लिए



धरती और स्वर्ग के बीच की जगह में उड़ते हुये गोता लगा कर चिड़िया, बादल से बरसी बूंद को चोंच में भर लेती है। उसी तरह प्रेम, महबूब को बसा लेता है अपने दिल में, और बचा लेता है नष्ट होने से।

आह ! कितनी उम्मीदें हैं, एक तुम्हारे नाम से।
* * *

उसकी डायरी में थी
एक मुंह छिपाये हुये निर्वस्त्र नवयौवना
चिड़ियाएं नीले सलेटी रंग की और कुछ शब्द।

मेरी डायरी में भरी थी, कच्ची शराब।
* * *

मेरा दिल बना है किसी के लिए
मेरे होने के मक़सद है कुछ और
शुक्रिया ओ मुहब्बत
तुम्हारे दिये इस हाल का।

कुछ सज़ाएँ होती है उम्र क़ैद से भी लंबी।
* * *
उसके होठों पर बचे थे
थोड़े से सितारे, थोड़ा रंग गुलाबी।

मेरे पास बची है उसकी यही छवि।
* * *

ज़मीन, पानी, हवा और रोशनी
है उनके लिए जो जन्मते और मर जाते हैं।

प्रेम के बीज को इनमें से कुछ नहीं चाहिए।
* * *

लज्जा भरे गुदगुदे गालों पर ज़रा सी हंसी
और होठों ने दबा रखी है, बातें सब रात की।

सुबह आई है, हैरत के आईने से उतर कर।
* * *

कोयल भूल गई है लंबा गाना
कूकती है जैसे पुकार रही हो तुम्हारा नाम

हर सुबह, जो सुबह है तुम्हारे बगैर।
* * *

झाड़ियों के झुरमुट में सोये परिंदो को जगा कर
सुबह उठी आसमान में कुछ और ऊंची।

प्रेम में जीए जाना, सबसे बड़ी बात होती है।
* * *

सफ़ेद कबूतर आसमान का फेरा देकर
आ बैठा अपने ही मचान पर।

कोई रात भर सोकर जागा उसी की याद में।
* * *

लाल पंखों से झाड़कर आलस्य
नृत्य मुद्रा में उड़ गया परिंदा।

तप में बैठे किसी सन्यस्त टिड्डे ने
अपना एंटीना किया सुबह की ओर।

मेरी हथेलियों की रेखाओं से उगा
एक नया दिन, तुम्हारे नाम का।
* * *

उधड़ी हुए चुप्पी जितने खिले
फूल का फेरा दे, चला गया श्याम।

प्रिय सखी से रात वादा था
जाने किस गंध, मकरंद का।
* * *

आज की सुबह देखा मैंने
हैरत के बोझ से झुक गयी थी
लज्जा भरे फूलों की उनींदी शाख
अधजगे बागीचे पर बिखरी हुई थीं
बेढब लताएँ, तुम्हारे बालों की तरह।

आज कि शाम पाया मैंने
आसमान में दूज के मुबारक चाँद को
तुम्हारी कमर की तरह बल खाये हुये।

तुम्हारे बिना अपने कमरे में तन्हा
जब कभी जागूँ हूँ दोपहर की नींद के बाद
होता है सुबह होने का गुमा
जैसे कोई लौट आया बिना बताए।

अब
आहिस्ता से उतर रही है, याद की गहरी स्याही
झुक कर छत की मुंडेर पर
देखना कुछ ऐसे कि नीचे गली में खड़े हो तुम।

कि याद को लिखना,
सिर्फ उदासी लिखना नहीं होता, हर बार।
* * *

अज़ानों से बेपरवाह
ओंकार नाद से बहुत दूर
चलता हुआ मुसाफ़िर ज़िन्दगी का।

सुख, जैसे छांव की तलछट
सूरत, किसी बेढब आईने का बयान
और एक कुफ़्र जैसे मुहब्बत का खयाल।

और कभी कभी कोई देता है थपकी
जैसे हवा ने पहने हों हाथों में पंख।
याद आता है, बिछड़ने के वक़्त
तुम्हारी आँखों के
ठहरे हुए पानी पर लिखा था खुशी।

जाने क्यों है यकीं तुम्हें इस बात का
कि ज़िंदगी फिर से मिला देगी हमें।

मैं ठिठक कर देखता हूँ
आसमान पर बादलों की लहरें उकेरता
रेगिस्तान की नकल बनाता है ख़ुदा।
* * *

घूम फिर कर वहीँ आकर बैठ जाता है
प्यास का मारा हुआ हिरन
हरी झाड़ियों के पार देखता है, अकूत रेगिस्तान।

ज़िंदगी एक सूरज है
सर पर चमकता हुआ
मौत की पगडंडी पर वक़्त का अदीठ फासला है।

प्यास का खाली पैमाना है, प्रेम की दस्तक।
* * *

और देखो ऐसे छू रहा है कौन मुझे
कि आलाप में ये किसकी खुशबू है।

जबकि, तुम दुनिया की आखिरी ख़्वाहिश हो।
* * *

तुम नहीं हो
स्वर्ण-मृग के छलावे में
जटायु की मर्मांतक पुकार में।

तुम यहीं हो
दिल के कोने में गुलाब के कांटे से।
* * *

ऐ दिन ! अब उठता हूँ
इस दिल में सुबह का जाम भर कर
तुम भी तपो, मेरी तक़दीर की तरह
मैं भी बरदाश्त करूँ जो लिखा है मुकद्दर में।
* * *

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नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
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ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

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* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…

मन में छुपे बुलावे

टूटे पंख की तरह  कभी दाएं, कभी बाएं  कि कभी हवा में तैरता मन। 
आँखें पास की दीवार, छत, पेचदार सड़क या खुले आसमान की ओर रह जाती है जबकि मन चुपके से कहीं दूर निकल जाता है। मैं उसी जगह बैठा हुआ पाता हूँ कि खोया हुआ मन जहां गया है, वह कोई चाहना नहीं है। मन का जाना ऐसा है जैसे वह निरुद्देश्य भटक रहा है। 
मैं उसे पकड़कर अपने पास लाता हूँ। उसी जगह जहां मैं बैठा हूँ। वह लौटते ही मुझे उकसाता है। अब क्या करें? मैं भी सोचता हूँ कि क्या करें? कुछ ऐसा कि नींद आ जाए। थकान आँखें बुझा दे। कोई मादक छुअन ढक ले। कोई नशा बिछ जाए। ये सब हो तो कुछ ऐसा हो कि जागने पर नींद से पहले का जीवन भूल सकें। 
यही सोचते, मन फिर बहुत दूर निकल जाता है। * * *
पर्दा हल्के से उड़ता है  जैसे कोई याद आई और झांककर चली गयी। 
हम किसी को बुलाना चाहते हैं मगर ऐसे नहीं कि उसका नाम पुकारें। हम उसके बारे में सोचते हैं कि वह आ जाए। वह बात करे। किन्तु हम इन बुलावों को मन में ही छुपाए रखना चाहते हैं। 
कभी-कभी हम इस चाहना से शीघ्र मुक्त हो जाते हैं और कभी हम सोचने लगते हैं कि किस तरह उसे बुला लिया जाए और साथ ही ये भी न लगे कि हमने बुलाया ह…