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शौक़ जीने का है मुझको, मगर...


सुबह ज़रा सी ठंडी थी। रंगों वाला त्योहार निकट आ रहा था। सबसे पहली हलचल रेगिस्तानों इलाकों में ही हुआ करती है। मौसम बदला और दिन में आँधी चलने लगी। रेगिस्तान और धूल भरी आँधी का साथ अटूट है। मैंने पहले माले के कमरे की एक खिड़की बंद करते देखा कि बाहर का दृश्य भी परिवर्तित हो रहा है। सर्द दिनों में ये गलियाँ उन किनारों पर लोगों से भरी रहती हैं, जहां धूप का कोई टुकड़ा आ गिरता हो या कहीं अलाव जल रहा हो। लोग सारे दिन अपने काम करते हुये ऐसी जगहों पर आते जाते रहते हैं। रेगिस्तान का जीवन सुकून का जीवन है। यहाँ आदमी एक संतोष के साथ पैदा होता है। कुदरत ने यहाँ के लिए जो ज़रूरी काम तय किया है वह है पानी का प्रबंध करना। आज़ाद भारत ने इस मामले में आशातीत सफलता अर्जित की है। ये सफलता पीने के पानी की है। खेती के लिए इस तरह की सफलता अभी बहुत दूर है कि हर आदमी को अपनी मांग के अनुरूप खेत जोतने को पानी मिलता रहे। मैं उम्मीद करता हूँ कि अगर आबादी पर कुछ अंकुश लग सका और लोग पढ़ लिख कर ये समझने लगे कि विकास और आबादी का रिश्ता क्या है तो ज़रूर इस देश का भविष्य चमकते हुये सूरज की तरह होगा। गली में लोगों की बेहिसाब भीड़ जो धूप सेकती हुई बैठी रहती थी वह गायब थी। यानि गरम रुत के इन पहले ही दिनों में लोगों ने धूप से बचाने के लिए छाया वाली जगहों का रुख कर लिया था। मुझे सूनी गलियाँ बड़ा डराती हैं। ये अच्छा नहीं लगता कि जहां देखो वहाँ बंद दरवाजे और बंद खिड़कियाँ। मैं किसी की तलाश में भटक रहे प्रेमी के जैसा खुद का हाल पाता हूँ। कि खोजना जारी रखना है देखना है किसी दिव्य दृष्टि से बंद दरवाजों और खिड्कियों के भीतर। मैंने तेज़ चलती हवा से उड़ कर आती हुई मिट्टी से बचने के लिए खिड़की को बंद कर दिया।

सुबह के वक़्त चाय पीने का हिसाब कुल मिलाकर बेहिसाब है। जिन घरों में चाय पी जाती है, वहाँ केतली और आग दोनों मिलकर प्रेम का आसव बनाते रहते हैं। मैं कई दिनों से उद्विग्नता से ग्रसित हूँ। इसे अँग्रेजी भाषा में एंजायटी कहते हैं और उर्दू में इज़्तराब। ये मानसिक रूप से उलझनों में घिरे होने के शब्द हैं। हमारे मस्तिष्क के तरल द्रव में कब किस तरह की क्रिया प्रतिक्रिया के कारण क्या हो जाए कह पाना संभव नहीं है। हम कब इस उद्विग्नता के रास्ते होते हुये निराशा, हताशा और अवसाद के घर पहुँच जाएँ कहा नहीं जा सकता है। मैं खुद को कई सारी बातें समझा रहा था लेकिन बेअक्ली को अक्ल का आसरा नहीं मिल सकता है। ये ज्ञान अक्सर सिर्फ दूसरों को देने के काम आता है। हम खुद के लिए सिर्फ इतना कर सकते हैं कि जीवन जीने के तरीकों में छोटे छोटे किन्तु ज़रूरी बदलाव लेकर आयें। मैंने घर के बहुत सारे काम करने शुरू किए। उन कामों में खुद को व्यस्त रखा और सुबह को बिता दिया। ऐसे काम करते हुये हो सकता है कि हमें लगता रहे कि कोई फायदा नहीं हुआ है, लेकिन हमें ये याद रखना चाहिए कि जितनी देर हमने काम किया वह वक़्त तो सुकून से बिता। हम जिस चिंता के फेर में थे उसे ज़रा सा भूल तो सके। ज़रा सा काम बहुत बार होकर एक बड़ा काम हो जाता है। जिस तरह मैंने अपनी चिंताओं का पोषण किया है उससे ज्यादा वक़्त उनको हटाने ले लिए करना होगा इसलिए ये तय है कि इसमें वक़्त भी ज्यादा लगेगा।

मैं चाय छान रहा था। मैंने देखा कि चाय की छलनी ने चाय की पत्तियों और कूटी हुई अदरक को रोक लिया और चाय के आसव को नीचे मग तक जाने दिया। ये कोई महान वैज्ञानिक आविष्कार नहीं है। हमने छलनी इसी लिए बनाई है। लेकिन मेरे मन में खयाल आया कि मेरा मन इस मग के जैसा हो गया है। जो सब चीजों को रोक कर बैठा है और पूरी तरह भरा हुआ है। इसमें अब कोई नयी चीज़ नहीं आ सकती है अगर हमने कुछ और भरने की कोशिश की तो ये छलक जाएगा। इसके विपरीत छलनी ने ज़रूरी और गैर ज़रूरी को अलग कर दिया। मैंने चाय के मग को देखते हुये सोचा कि मेरा मन भी छलनी की तरह हो सके तो कितना अच्छा हो। मैं जिस हताशा और नाउम्मीदी को इकट्ठा कर के बैठा हूँ उसे छान कर फेंक सकूँ। इससे मेरे मन के मग में भरा हुआ बोझ भी हल्का और मीठा जो जाएगा। सारी कड़वाहट दूर हो जाएगी। लेकिन ये सब बहुत आसानी से नहीं हो सकता है। समय और बहुत सारा परिश्रम चाहिए। मेरे सेल फोन में नुसरत साहब की सूफी क़व्वालियाँ हैं। अब कहा जा सकता है कि वे थी। क्योंकि मैंने उनको कुछ समय के न समझ आने वाले अँग्रेजी गीतों से रीप्लेस कर दिया है। इसलिए कि जीवन के गहनतम विचारों को सुनने और समझने के लिए स्वस्थ मस्तिष्क की आवश्यकता होती है। सूफी संगीत वैराग्य बुनता है। वह जीवन को आनंद से बिताए जाने और दुखों से मुक्ति के लिए खुद को कुदरत को सौंप देने का आह्वान करता है। इसे सुनते हुये कई बार इसके अर्थ और प्रभाव आपको, आपकी ही नासमझी के कारण उल्टे रास्ते भी ले जा सकते हैं।

ज़िंदगी सबके लिए भारी होती है। अगर हम उसका सही तरीके से उपयोग न करें तो वह जो आशा का दीया है उलट कर तेल बिखेर सकता है, बाती को मिट्टी में डाल सकता है। हमें अपनी ज़िद से परे, सबसे बेहतर हाल चुनना चाहिए। जैसे कि मैंने तुमसे प्रेम करना चुना तो उसके साथ बेचैनी चुनने की जगह इंतज़ार चुनना चाहिए था। अब खुद की गलती को सही कर रहा हूँ। मगर दिल है कि मुज़फ्फ़र वारसी के इस शेर की तरह ज़िद को छोड़ना नहीं चाहता है। "ज़िंदगी तुझसे हर एक सांस पर समझौता करूँ, शौक़ जीने का है मुझको मगर इतना भी नहीं"। 

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मैं कितना नादान था।

आवाज़ का कोई धुंधला टुकड़ा भीतर तक आता है. उस बुझी हुई आवाज़ वाले टुकड़े से अक्सर रोना सुनाई देने लगता है. मैं वाशरूम में एक जगह ठहर जाता हूँ. रोना धीरे सुनाई पड़ता है मगर मन तेज़ी से बुझने लगता है. शावर से पानी गिरता रहता है. वाशरूम की दीवारों को देखने लगता हूँ. वे सुन्दर हैं. इनकी टाइल्स नयी और चमकदार है. दीवार पर लगा पंखा भी अच्छा है. छत पर ज़रूर कहीं कहीं पानी की बूंदें सूख गयी हैं. 
पहले माले पर कुछ नयी आवाजें आने लगती हैं. पहले की उदास आवाज़ चुप हो जाती है. नयी आवाज़ का शोर चुभने लगता है. आँखें बंद करके लम्बी साँस लेना चाहता हूँ. भीगे सर को पंखे के सामने कर देता हूँ. इंतज़ार. और इंतज़ार मगर बदन ठंड से नहीं भर पाता. कुछ देर बाद पाता हूँ कि आवाज़ें बंद हो गयी हैं. भीगे बदन बाहर आता हूँ. 
दुनिया वहीँ है.

उदासी की आवाज़ों का झुण्ड धीरे-धीरे क्षितिज से इस पार बढ़ता जाता है. जैसे शाम की स्याही बढती है. जैसे मुंडेरों से उतर कर नींव के उखड़े पत्थरों तक चुप्पी आ बैठती है. नीली रौशनी वाला तारा टूटता है. जैसे किसी ने एस ओ एस भेजा है कि किसी ने संकेत किया है बस यहीं दाग दो.  * * *
मेरी आँखों में
मेरे हो…

नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
इस पर भी अगर आप
दो कदम और चल सकें तो  मिट सकता है भरम  कि ईश्वर कोई चीज़ नहीं होती, दुख भी कुछ नहीं होता।
* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…