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तनहा खड़े पेड़ पर खिली हुई कोंपल.

व्यापार सबसे बड़ी विधा है। इसलिए कि ये हर विधा को अपना हिस्सा बना कर उसका उपयोग कर सकती है। इस तरह की खूबी के कारण इसका आचरण भी स्वछंद हो जाता है। मैंने सुना है कि प्रेम, दया, करुणा और रिश्ते जैसी अनुभूतियों तक में व्यापार का आचरण आ जाता है। मैं एक ऐसी किताब के बारे में बात करना चाहता हूँ। जिस विधा को व्यापार ने निगल लिया है। इस किताब को हाथ में लेने पर मुझे बेहद खुशी हुई और आपका भी हक़ है कि आप इसी खुशी के साझीदार हो सकें और इसे अपना बना सकें। यह किताब इसलिए महत्वपूर्ण और संग्रहणीय है कि इस किताब ने फीचर विधा के खत्म न हो जाने की उद्घोषणा की है। 

फीचर उस समाचार को कहते हैं जो तथ्यों के साथ मानवीय अनुभूतियों और संवेदनाओं को प्रभावी ढंग से रेखांकित करे। समाचार की नीरसता में जीवन का रस घोल सके। मैंने सबसे पहले रांगेय राघव के लिखे हुये फीचर पढे थे। उनमें मानव जीवन के दुखों की गहनतम परछाई थी और ये भी था कि जीवन फिर भी वह नदी है जो सूख कर भी नहीं सूखती। इसके बाद मुझे नारायण बारेठ के लिखे हुये फीचर पढ़ने को मिले। वे सब पत्रिका के कोटा संस्करण और कुछ मासिक साप्ताहिक पत्रिकाओं में छपे थे। इसके बाद कई सालों तक एक आध फीचर पढ़ने के लिए जनसत्ता और नवभारत टाइम्स जैसे समाचार पत्रों का इंतज़ार करना होता था। रेडियो प्रसारण में फीचर आकाशवाणी और बीबीसी पर खूब लोकप्रिय रहे। इन माध्यमों ने समाचार पत्र-पत्रिकाओं से बेहतर फीचर बुने लेकिन जो सुख फीचर को छपे हुये कागज पर पढ़ने को मिलता है, वह मुझे कहीं और नहीं मिला। 

हाल के समय में व्यापार ने समाचार पत्रों, पत्रिकाओं और सभी तरह के माध्यमों ने फीचर की हत्या कर दी है। मैंने फीचर के लिए संघर्ष करते हुये आखिरी आदमी रविश कुमार को देखा। "रविश की रिपोर्ट" को देखते हुये टीवी के अत्याचार से मुक्ति मिल जाती थी। जिस तरह की खबरों के जरिये टीवी ने दर्शकों को प्रताड़ित किया उसी के बीच ये फीचर सुख का कारण रहे। मुझे मालूम नहीं कि फिर उसका क्या हुआ मगर ये सच है कि वह आखिरी कार्यक्रम था जिसने मुझे टीवी के सामने खुशी से बैठने को प्रोत्साहित किया। इसके सिवा मेरी नज़र में सिर्फ एक ही आदमी है, पृथ्वी परिहार। आप पीटीआई के लिए काम करते हैं। इस किताब को ज़रूर पढ़ा जाना चाहिए। जो दोस्त कभी पत्रकार बनना या स्वतंत्र लेखन करना चाहते हैं, उनकी किताबों की अलमारी में इस किताब को ज़रूर होना चाहिए। किताब है, कांकड़। इसके प्रकाशक हैं, बोधि प्रकाशन। इसका मूल्य है दस रुपये किन्तु ये दस किताबों के सेट का हिस्सा है। इसे आप किस तरह पा सकते हैं ये जानने के लिए इस नंबर पर फोन कर सकते हैं। 082900 34632

कांकड़, आत्मा की खिंची हुई एक अदृश्य लकीर है. जिसके इस पार ह्रदय से बंधी हुई गाँव के जीवन की उदात्त और गुनगुनी आवाज़ें हैं और उस पार शहर के जीवन का आरोहण करते हुए अपने साथ चले आये स्मृतियों के लम्बे काफ़िले हैं. समय की अपरिभाषित गति की कसौटी पर छीजते जा रहे दृश्यों और अनुभवों के कोलाज में बचे हुए रंगों को सहेज लेने का एक ठिकाना है. इस अविराम निष्क्रमण में गाँव की सचमुच की भौतिक कांकड़ को डिजिट्स में बदल देने का अनवरत काम है. इसकी खुशबुएँ रेगिस्तान में बहते हुए पानी, आँखों के सूखे हुए पानी और दिलों के उजड़े हुए पानी की कहानी भी कहती हैं. यह जितना आत्मीयता से भरा है, उतना ही इसके खो जाने के डर और फिर उसे बचा लेने के हौसले से भरा हुआ है. यह रेगिस्तान के जीवन की कला, संस्कृति, साहित्य और जिजीविषा का एक रोज़नामचा भी है. इसमें जो कुछ भी दर्ज़ है, वह सब ब्योरे न होकर एक आर्द्र पुकार है. यह अपने अनूठे रिवाजों, अनछुई निर्मल बोलियों और रेत के स्वर्ण रंग में भरे हुए असंख्य रंगों की झलक से भरी हुई एक तस्वीर है.
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मैं इसके पहले पाठकों में हूँ. मेरे भीतर के खिले हुए रेगिस्तान ने कांकड़ को पढ़ते हुए पाया कि ऊँटों के टोले और लोकगीतों के काफ़िले चले आ रहे हैं. लोक कविता और कहानी के लम्बे सिलसिले हैं. कोई बदलते हुए रेगिस्तान की कहानी कह रहा है और मैं सुनता जा रहा हूँ. मैंने चाहा कि इस कांकड़ पर बार बार लौट कर आना चाहिए. यहीं दिखाई देगी रेत के धोरे पर तनहा खड़े हुए पेड़ पर खिली हुई नई कोंपल.

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