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मुझे सब मालूम है

मुझे सब मालूम है। इतना कह कर चुप हो जाती है। 
मैं कुछ लिखने, कुछ सुनने या ऐसे ही किसी किताब को पढ़ते हुये पूरा दिन घर के ऊपरी माले में बिता देता हूँ। ये महेन का कमरा है। वह आजकल यहाँ नहीं रहता। उसकी पोस्टिंग जयपुर में है। उसकी अनुपस्थिति से घर का हूलिया बिगड़ जाता है। वह जब भी इस घर में होता है, घर भरा पूरा लगता था। मनोज की पुलिस की नौकरी ऐसी है कि हम सब मान चुके हैं कि उसे छुट्टी नहीं मिलेगी। हम कभी सोच नहीं पाते हैं कि बहुत सारे दिन उसके साथ बिता पाएंगे। लेकिन महेन के जाने के बाद से अब केक, कॉफी, चाय, पार्टी, खाना यानि सब कुछ ऐसे होता है जैसे हम अकेले हों। एक माँ, दो हम और दो हमारे बच्चे। चाय का वक़्त हुआ सेल फोन की रिंग बजी, खाने का वक़्त हुआ सेल फोन फिर से बजा। रात के वक़्त देर से छत पर टहल रहा हूँ कि फिर टिंग की आवाज़। सेल फोन की रिंग वही है। मगर एक सेंस है जो पहले से ही बता देता है कि ये उसने आवाज़ दी है। फोन को बाद में देखता हूँ, दिमाग में आभा का नाम पहले चमकने लगता है। वैसे ही जैसे पुराने नोकिया वाले फोन में एक नाचती हुई रोशनी हुआ करती थी। किसी शादी ब्याह में लगे हुये लट्टू जैसी। ऐसे ही उसका नाम ब्लिंक करता है। मैं जिस हाल में होता हूँ अपने सामान को समेटने लगता हूँ। अगर ये शाम की आखिरी आवाज़ है तो फिर अपने प्याले को देख कर फैसला करता हूँ कि कितनी देर में नीचे आ सकूँगा। फोन उठा लूँ तो उसको लगता है कि अब गयी आधे घंटे की। बिना उठाए काट दूँ तो वह सीढ़ियों पर पाँवों की आवाज़ गिनते हुये पता लगा लेती है कि मैं किस पल दरवाज़े के पास दिखाई दूंगा। वह भी मुझे देखे बिना ही कहती है। आज बड़ी देर लगाई। वही जो कहती है, मुझे सब मालूम है।

कुछ रोज़ से झगड़ा चल रहा था। उसके खत्म होने की मियाद जा चुकी थी। हम दोनों चुप थे। हमारे झगड़े की वजहें ऐसी होती है जैसे काले नीग्रो लोगों को मार कर अमरीका नए गोरे लोगों का देश बन जाता है। जैसे जंगलों से हिरणों को खत्म करके साफ सुथरे बड़े बड़े गोल्फकोर्स जैसे मैदान बनाए जाते हैं। मैं इसके विरोध में खड़ा रहता हूँ। टेम्स नदी में बढ़ते हुये कचरे के खिलाफ़ जिस तरह लोग कोक और पेप्सी के खाली केन्स की ड्रेस पहन कर वाक करते हैं। उसी तरह के विरोध प्रदर्शन पर उतर आता हूँ। अक्सर जिस बात के लिए रूठे होते हैं, उसके बारे में हम दोनों को मालूम होता है कि इसका मोल क्या है। मगर हम दोनों उस एक मामूली बात के आस पास कई सारी फालतू की बातें जमा करके उसे बड़ा आकार देने लगते हैं। छोटी छोटी बातों को आसानी से सुलझा लेने से समझदार होने की, आत्मसम्मान से भरे होने की और अस्तित्व की लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती है। हमारी असल लड़ाई की वजह लोमड़ी जैसी होती है कि खुद तो पाव भर की लेकिन उसकी पूंछ दो किलो की। 

कल का दिन बड़ा सख्त था। परसों रात को हम फिर मुंह फेर कर सो गए थे। उसने कहा नहीं मगर मैंने सुना था कि उसने कहा है- मुझे सब मालूम है। रात को तीन बजे तक जागता रहा। छत पर लेटे हुये अच्छी हवा में भी नींद न आई। उठ कर नीचे चला आया। मैं गुस्से या प्रेम में क्या कर सकता हूँ, लिखने के सिवा। मैंने बीस एक दिन पहले एक कहानी लिखना शुरू किया था किन्तु कुछ वजहों से उसे रोक दिया है। सोचा इसी कहानी को कुछ लिख लूँ। फिर खयाल आया कि प्रेम और नफरत के बारे में सोचते हुये ज़िंदगी का ये लम्हा जा रहा है। इसलिए अगले साल का कुछ प्लान किया जाए। मैंने अपने पाँव टेबल पर रखे और लेपटोप की स्क्रीन को ऐसे देखने लगा जैसे कि बारिश से उकताया हुआ आदमी खिड़की से बाहर बारिश को ही देख रहा हो। इस बीच लगा कि किसी ने आवाज़ दी है। ये आवाज़ हमारे फ्लेट के कमरे से आई थी। जबकि मैं रेगिस्तान में कुर्सी पर किसी मुड़ी हुई ककड़ी की तरह लटका हुआ था। मुझे याद आया वही सफ़ेद पतली रज़ाई, वही सर्द दिनों की ठंडी हवा, वही प्रेम में डूबे हुये बालकनी में बैठे रहने के दिनों की आवाज़। मैंने उदास प्रेम की सारी प्रॉपर्टी को लिखा। विगत के प्रेम में एक उदास रूमान होता है। आप याद करते हैं और फिर बड़े हो जाने को बददुआ देने लगते हैं। हाय किसलिए हो गए बड़े। 

कल दिन में उसकी किसी सहेली के बच्चे का जन्मदिन था। उसकी सहेलियाँ कौन है? सब उसके साथ काम करने वाली या काम कर चुकी मेडम्स। मैं उनमें से दो तीन को ही जानता हूँ। शायद वे दो तीन ही होंगी। यूं भी वह इस रेगिस्तान में मेरे कारण आई और रह रही है। "हमें तुमसे प्यार कितना ये हम नहीं जानते मगर जी नहीं सकते तुम्हारे बिना" ये हम दोनों के बीच की पहली और आखिरी लिखित पंक्ति थी। जो साफ थी। बाकी सब बातें हमें खुद ही समझनी होती थी। सब पति पत्नी यूके के अलिखित संविधान की तरह बिना बोले एक दूसरे से संवाद करते रहते हैं। इस संवाद में अक्सर कोई तीसरा पक्ष उपस्थित हो तभी मुंह खोल कर एक दूजे को बताना होता है कि ये क्या है और इसका क्या करें? हम बड़े मॉल में होते हैं तब चीजों को देखते हुये चलते रहते हैं। फिर हमारी चाल ही बता देती है कि क्या लेना है। कई बार बिना बोले ही चीजों को नकार दिया जाता है या उनके लिए सहमति बन जाती है। किसी चीज़ को किस तरह पकड़ा हुआ है ये देख कर मैं बता सकता हूँ कि वह इसे लेने वाली है या नहीं। उसे मेरी चाल देख कर मालूम हो जाता है कि मैं आज विस्की पीने के लिए छत पर जाने वाला हूँ या नहीं। ऐसे ही उसने बेटे को मेरे पास भेजा- पापा मम्मा कह रही है कि हम दोनों रेखा मौसी के घर भैया के बर्थडे में जा रहे हैं। इतने लंबे सफाई भरे वाक्य को सुन कर मैं सिर्फ हाँ में सर हिलाता हूँ और अंदाज़ा लगता हूँ कि लड़ाई खत्म होने का समय आस पास ही है।

दिन भर मेरा हाल अच्छा नहीं रहा। मैं ठीक ढंग से खाना नहीं खा पा रहा हूँ। पिछले एक महीने में मैंने पाँच किलो वजन खोया है। मैं पचहतर से लुढ़क कर सत्तर के नीचे आ गया हूँ। वह रोज़ पूछती है कि हुआ क्या है? मैं कहता हूँ कि मुझे राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी दोनों ही पसंद नहीं है। वह खुद का उपहास किए जाने जैसे भाव से देखती है। ऐसा मुंह बनती है जिस पर लिखा हो आपसे बात करना ही बेकार है। मैं उसकी चुप्पी के बीच कहता हूँ दोनों ही खुश नसीब आदमियों के बीवी नहीं है। दोनों को ही उनकी पसंद के लोग देश का प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं। देखो उनके इस सुख से ईर्ष्या होती है। लेकिन ये बातें हम सिर्फ खुश होने के दिनों में ही कर सकते हैं। हम सब कुछ न कुछ फॉर ग्रांटेड लेते हैं। इस दुनिया की बुराई ये है कि जो भी आदमी या औरत कुछ भी जान लेता है, वह उसका फायदा उठाना शुरू कर देता है। मैं इसकी भरपाई करने में सावधानी बरतता हूँ। वह रसोई में मेरे आने की आहट सुनते ही कुछ ऐसी चीज़ खोजने लगती है जिसे हाथ में पकड़ कर दिखाया जा सके। मेरे से दूर रहना। मैं काम कर रही हूँ। 

मुझे साफ घर अच्छा लगता है। इतना अच्छा कि खुद भी साफ करना पड़े तो भी कोई हर्ज़ नहीं। एक बार गुरविंदर मेरे कमरे पर आया तब मैं पोचा लगा रहा था। उसने कहा- भाई तेईस साल की उम्र में बिना बीवी और महबूबा वाले घर में एक बार झाड़ू मार लो तो भी काम चल सकता है। ये बात उसने अपने दिल को बड़ा करके कही थी कि उसके कमरे में सप्ताह में एक बार ही झाड़ू लगता था। एफएम के स्टूडियो से बाहर निकल कर मैं अपने कमरे तक आता और साफ कमरे के बाहर फैली हुई रेत में बैठ कर विस्की पिया करता था। मुझे साफ चीज़ें खूब पसंद है, जैसे ये रेगिस्तान की रेत। मैं जाने कब से पी रहा हूँ। मेरे परिवार में शराब कभी टेबू नहीं रही। मैंने शराब को हर सामाजिक आयोजन का ज़रूरी हिस्सा पाया है। मुझे शराब पीने में मजा आता रहा है कि ये एक हाइप देती है। ज़रा खुल कर पाँव पसारने का हौसला देती है। इसके बिना दिन ऐसे बीतता है जैसे सचमुच के ज़िंदगी के नौकर ही हैं। उसे शराब पसंद नहीं है। उसने कभी नहीं पी। मैंने कभी कहा नहीं। खैर मैं सब चीजों को करीने से रखने का पक्षधर हूँ। इसलिए घर भर के कपड़े धो लेने, झाड़ू और पौचा कर लेने में खुशी मिलती है। उसे ये सब काम करते हुये देख कर अच्छा नहीं लगता। मैं कहता हूँ मैं तेरे लिए थोड़े ही कर रहा हूँ। मैं तो उनका जीना मुश्किल कर रहा हूँ, जो पड़े पड़े खाते हैं। मेरे आस पास रहने वाले चचेरे भाई, पड़ोसी और कुछ मेरी उम्र के गरीब लोगों की बीवियाँ देखती हैं। रेडियो का प्रजेंटर इस तरह के कामों में लगा है। मैं शान से कपड़े सुखा रहा होता हूँ। मैं अक्सर रसोई में खड़ा हुआ सब्जी छौंक रहा होता हूँ। ज़िंदगी काम करने के लिए ही बनी है। 

अट्ठारहवीं शताब्दी की ऐतिहासिक पानीपत की लड़ाई की तरह हमारी सबसे भयानक लड़ाई शादी के चार साल बाद लड़ी गयी थी। ये अमेरिका और रूस के बीच वाले शीत युद्ध जैसी थी। हम सचमुच का प्यार करते हैं इसलिए हम कभी एक दूजे को धक्का भी नहीं दे पाये। इतने सालों में हजारों मुद्दों पर अबोले होकर ही लड़े हैं। हम अगर मुगलिया ज़माने में पैदा हुए होते तो भी अपने मुर्गों को भी कुछ इस तरह लड़ाते कि वे दोनों मुर्गे एक दूसरे को उड़ कर चौंच मारने की जगह मुंह फेर के बैठ जाते। जो भी पहले सामने देखता या जिसके भी चहरे पर पहले मुस्कान आ जाती वह हार जाता। इस बार की लड़ाई के खत्म होने का वक़्त करीब ही था मगर मुंह फेर का बैठे रहने का फायदा ये हुआ कि महेन के कमरे में टीवी देखते हुये मैंने अपनी पीठ का सेक किया। इससे मांस पेशियों को खूब आराम आया। टीवी पर कुछ फूहड़ हास्य देखने से या जेठा भाई की बबीता जी पर नज़र को देखते हुये मैं चौंकता रहा कि वह मेरे बिस्तर के पास ही खड़ी है और कह रही है। मुझे सब मालूम है। 

सेल फोन पर एक दोस्त ने पूछा- दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की कहाँ है? मैंने कहा रसोई में चाय बना रही है। लेकिन उसने मुझे चाय नहीं पिलाई। वह ऊपर वाले माले में आई तो मैंने कहा भाई चाय न पिलाने की लड़ाई थोड़े ही है। वह बोली आपने कहा नहीं। मुझे अचानक याद आया कि उसने चाय बनाई ही न होगी। वह अकेली पी ही नहीं सकती है। वह आज अपनी किसी देवरानी के पास भी नहीं जाएगी। ये सब याद आते ही मेरी शाम बहुत सुंदर हो गयी थी। मैंने कुछ सुकून को आते हुये देखा। एक यकीन को दोहराया। कुछ चीजों को आज़ादी दी। फिर रात आठ बजे तक माँ भी आ रही थी। मैं रेलवे स्टेशन चला गया। मैं आठवीं कक्षा तक रेलवे स्कूल में ही पढ़ा हूँ। इन रेल की पटरियों पर इंजन बन कर चलते हुये खूब मजा उठाया है। मैंने पाया कि वक़्त का दरिया बहुत बह चुका है। रेल की पटरियों के पास बिखरा रहने वाला सूनापन किसी और जगह की तलाश में चला गया है। लोगों की भीड़ बढ़ती ही जा रही है। मैंने माँ से पूछा था कि आप मेरे साथ पैदल चलकर आना पसंद करेंगी? माँ ने कहा- हाँ बहुत आराम से। मुझे पैदल चलने में सुख होता है। मैं और माँ एक दूजे के बराबर चलते हुये घर तक आ गए। माँ है तब तक जाने कितनी ही चीज़ें बची हुई है। एक वह चीज़ भी जिससे आप खूब डरते रहते हैं, बड़ा हो जाने वाला डर। 

कल रात उसने रिंग नहीं की। उसने बेटे को भेजा। मम्मा आपका वेट कर रही है। हमने खाना खाया और छत पर सोने चले आए। बच्चों को ज़रा झपकी आई होगी कि मैंने उसके हाथ को छुआ। वह किसी बॉलिंग गेम के बाल वे पर बॉल की तरह लुढ़क गयी। मैं बॉलिंग पिन की तरह चित्त हो गया। इस ज़िंदगी में उसकी कोई बॉल भी खाली नहीं गयी है। उसने हमेशा टेन-पिन स्कोर किया है। मैंने कहा- तुमको ऐसा नहीं करना चाहिए था। उसने कहा- रहने दीजिये। वह कुछ उदास होने का मुंह बनाती या शिकायत करती उससे पहले ही मैंने कहा- मुझे सब मालूम है। वह भूल गयी कि बच्चे सो रहे हैं। उसकी आवाज़ ऊंची हो गयी। उसने कहा- आपको कुछ नहीं पता, मुझे सब मालूम है। 

मैं मुस्कुराया - हे भगवान ये कहीं सही लड़की के बारे में न सोच रही हो। मगर लड़ाई इस बात की नहीं थी।
* * *

[तस्वीर : नौ फरवरी 2013, दिल्ली का प्रगति मैदान]

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नष्ट होती चीज़ों के प्रति

मरम्मतें मुकम्मल नहीं होती
कि जो एक बार टूट जाता है, बार-बार टूटता रहता है।

मैं भटकता रहा। देहगंध के लिए नहीं वरन अपनी तन्हाई की तलाश में। इस तलाश में मैंने कीकर पाए। कीकर के कांटों से बहुत गहरा प्रेम किया। उनकी चुभन आवरण में छुपने का अवसर नहीं देती। आप दूर से ही दिख जाते हैं, बिंधे हुए। दर्द से भरे। लड़खड़ाते चलते। मुझे ये अच्छा लगता है कि आदमी जैसा है, औरत जैसी है। वैसी रहे और दिखे भी।
मुझे उन लोगों से प्रेम न हुआ, जो किसी मजबूरी में रिश्ता ढोते गए। हालांकि जीवन में अगर आप अकेले होते तो भी कष्ट तो ऐसे ही रहते। इसलिए मैंने ख़ुद से कहा- "जीना मगर एज पर जीना। किसी के लिए बचना मत। कि जीवन को जब तक तुम किसी धार पर रखोगे, वह मरने से बचने की जुगत में लगा रहेगा। जिस दिन उसे बचाना चाहोगे, वह तुम्हारी आत्मा को चीरता हुआ नष्ट होने लगेगा।"
यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
तुम्हारी अंगुलियों की
खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
कि देखूँ   तुम्हें छूकर ढल जाए जाने किस रंग में।  * * *

विवेक से भरे दुख
और ईश्वर के बीच की दूरी बहुत कम होती है

इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
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* * *

मेरी नास्तिकता पर  तुम्हें दया आ सकती है
हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

मैं अगर तुमसे प्यार करता हूँ, तो इसके सिवा कुछ नहीं कर सकता।
* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
आस पास के लोग सिर्फ हिला सकते हैं गरदन
दूर बैठे हुये लोग भेज सकते हैं अफसोस से भर संदेशे
प्रेमी रो सकता है, उस दुख से भी…

मन में छुपे बुलावे

टूटे पंख की तरह  कभी दाएं, कभी बाएं  कि कभी हवा में तैरता मन। 
आँखें पास की दीवार, छत, पेचदार सड़क या खुले आसमान की ओर रह जाती है जबकि मन चुपके से कहीं दूर निकल जाता है। मैं उसी जगह बैठा हुआ पाता हूँ कि खोया हुआ मन जहां गया है, वह कोई चाहना नहीं है। मन का जाना ऐसा है जैसे वह निरुद्देश्य भटक रहा है। 
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यही सोचते, मन फिर बहुत दूर निकल जाता है। * * *
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कभी-कभी हम इस चाहना से शीघ्र मुक्त हो जाते हैं और कभी हम सोचने लगते हैं कि किस तरह उसे बुला लिया जाए और साथ ही ये भी न लगे कि हमने बुलाया ह…