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ट्यूशन की नदी के इस और उस पार

भेलीराम की चाय की थड़ी उन दिनों स्कूल के अध्यापकों की भी खूब प्रिय जगह थी. जब कभी स्कूल के टी क्लब में चाय बनाने वाला अनुपस्थित होता या फिर शिक्षकों को कुछ ऐसी बातें करनी होती जो विद्यालय प्रबंधन से किसी तरह जुडी हुई हों तब अध्यापक चाय पीने भेली राम के यहाँ पहुँच जाते थे. ये बहुत खतरे की बात थी. मैं वहाँ ढाबे पर रोज़ हो नहीं सकता था. इसलिए जब भी वक्त मिलता हम अपनी सायकिल लिए हुए नये ठिकानों की तलाश में घूम फिर कर घर लौट आते.

हर माँ बाप जिस खतरे से सदियों से डरते आए हैं, मैं उस खतरे की ज़द में था. ये खतरा था रुलियार फिरने का यानी आवारगी का. सायकिल पर पेडल मारते हुए किसी दोस्त के घर तक जाना और वहाँ से शहर की सड़क पर फेरा देना उस ज़माने का सबसे बड़ा एब था. इससे भी बड़ा एब था गलियों के चक्कर काटना. हर माँ बाप अपने ही नहीं दूसरे परिचितों के बच्चों पर कड़ी नज़र रखते थे. उनका सूचना तंत्र इतना मजबूत था कि शाम को घर आते ही हर बच्चे से उसके पापा पूछ रहे होते कि आज फलां गली में किस लड़के के साथ घूम रहे थे. क्या वहाँ अपने बाप का नाम रोशन कर रहे थे. इस लताड़ के बाद उस पर नमक और मिर्च भी छिड़कते कि वो लड़का कितना अच्छा पढता है. मालूम है उसके टेस्ट में कितने नंबर आते हैं. कस्बे के सारे निम्न और मध्यम दर्ज़े के नौसिखिए आवारा होने को आतुर लड़के सर झुकाए हुए अपने पिताजी की घुड़की सुनते जाते. इस दौरान वे उन कमीने जासूसों के बारे में भी कयास लगाते कि किसने ये बात पापा को बताई होगी.

ये ज्ञान, मेरे अंदर उन दिनों किस रास्ते से आया था ये मुझे याद नहीं. मेरी याद में बस स्टेंड के पास वाले रेलवे के फाटक की ढलान भर बची है. पहली बार जब अमित घर आया था तो पक्की दोस्ती का प्रदर्शन करने के लिए मैं उसे कुछ दूर तक विदा करने के लिए गया. वह रेलवे फाटक की चढाई के आते ही सायकिल से उतर गया. पैदल चलता हुआ फाटक की चढाई चढ़ने लगा. मुझे लगा कि वह बहुत आलसी किस्म का है हालाँकि फाटक की चढाई खूब खड़ी चढाई थी. शहर के बीच की बापू कॉलोनी के नौजवान अपनी सायकिल लेकर नेहरू नगर आया करते थे. फाटक से उतरना शुरू होते ही अच्छी सायकिलें एफसीआई तक बिना पेडल मारे चलती जाती थी. लेकिन बापू कॉलोनी के बाशिंदे स्टेडियम रोड आते ही अपनी सायकिल के पहियों को ब्रेक से जाम कर देते थे. आगे पांचवीं दुकान सायकिल की दूकान थी. लेकिन वहाँ कच्ची शराब मिला करती थी. दुकान के आगे बबूल के नीचे एक घड़ा मिटटी में दबा रहता था. ये लोकल फ्रीज़ का काम करता था. जो भी आता दो रुपये देकर एक लोटा शराब पी सकता था. बच्चन की मधुशाला जो भेद मिटाती है, वही पावन कार्य उगम जी के यहाँ हुआ करता था. बापू कॉलोनी के बाशिंदे लोटा पीकर वापस लौटते तो उनका पॉवर फाटक की चढाई खत्म होने से पहले हर हाल में टूट जाता और उनकी सायकिल लुढकती हुई फिर उसी दुकान तक आ जाती. शाम को दो चार लोग सफाई का कचरा ढोने वाला हाथ ठेला लेकर आते और कुछ ज़िंदा खूबसूरत लोगों को बेरहमी से उसमें पटक कर बापू कॉलोनी तक ले जाते. अमित के इस तरह सायकिल से उतरने ने मुझे उसके शराबी हो जाने की आशंका से भर दिया.

हाय सच क्या उम्र थी सिर्फ चौदह पन्द्रह साल. अल्लाह तौबा क्या उम्र थी जिज्ञासाओं से भरी हुई.

हमारे जीवन की सीमा रेखा में हर वक्त कोई न कोई नई चीज़ संक्रमण कर रही होती है. इस क्रिया के अनेक लक्षण प्रत्यक्ष होते हैं. हम समझ रहे होते हैं किन्तु हमारा मन एक स्वीकृति के साथ उनको प्रवेश करने देता है. मैं अमित को अपनी दुनिया में आने दे रहा था. उसकी उपस्थिति से एक खास किस्म का सौहार्द्र अनुभूत होता था. इसलिए उसके होने से खुशी होती थी. लेकिन उसका होना, होने की कामना का अल्पांश भर हो सकता था. मैं सुबह स्कूल जाता और लौट कर घर पर ही रहता. घर मुझे खूब अच्छा लगता था क्योंकि वह अक्सर खाली होता. पापा स्कूल होते और माँ अपना काम करके पड़ोसी औरतों के साथ गली में किसी घर के बाहर बैठ कर दोपहर को जी रही होती. दोपहर बाद मैं नानग दास धारीवाल सर के पास ट्यूशन पढ़ने जाया करता था. नेहरू नगर से प्रताप जी प्रोल तक रोज़ आना जाना. वहाँ बटर पेपर जैसे पन्नों के बीच पांच सात कार्बन डाल कर सर गणित पढ़ाते थे. वे जो लिखते उनकी एक एक कॉपी सब बच्चों को मिल जाती. मुझे वहाँ पढ़ी गयी भौतिकी गणित और अंग्रेजी की कोई याद नहीं. मुझे याद है कि लोक कथाओं में धारीवाल सर दो सिगरेटों को नीम के एक बारीक तिनके से एक साथ जोड़ कर सिगरेट पिया करते थे. इस कथा में कुछ लड़के खूब अचरज से दावा करते थे कि धारीवाल सर के लिए दो सिगरेट से दो कश ही हो पाते हैं. वे एक सन्यासी किस्म के आदमी लगते थे. सुबह स्कूल, दोपहर घर में पपलू और शाम को ट्यूशन पढाया करते. वो हमारे समय के अनूठे क्रांतिकारी इंसान थे. उन्होंने वणिक पुत्र होते हुए भी बोर्डर के मुस्लिम बहुल इलाके के राजनेता अब्दुल हादी साहब के बेटे गफ़ूर को अपने घर में रखा था. हादी साहब चाहते थे कि किसी तरह उनके साहबजादे दसवीं पास कर सकें. गफ़ूर एक निहायत शरीफ और सीधा सादा लड़का हुआ करता था. उसका खाना पीना रहना सब एक जैनी के यहाँ होता था. जबकि तीस साल बाद आज भी रुढियों और बेड़ियों में जकड़े हुए समाज में, ये किसी जैनी के बस की बात न होगी कि वह किसी मुस्लिम को अपने घर में बच्चे की तरह रख सके. धारीवाल सर मेरे लिए ज़िंदा भगत सिंह थे.

मैं धारीवाल सर के यहाँ से ट्यूशन पढकर जेठू सिंह माडसाब के घर चला जाया करता. वहाँ भरत और अशोक के पास खूब सारे खरगोश थे. उन खरगोशों से जी भरकर खेल लेने के बाद, उनकी लाल आँखों से आँखें मिला लेने के बाद, उनको जी भरकर प्यार कर लेने के बाद हम जेठू सिंह जी माडसाब के घर से बाहर निकलते.  नरगासर के देवीय कृपा वाले पानी में पड़ी हुई भैंसे, किनारे पर चद्दरें धोते खत्री और पास ही अमर बकरों की अद्वितीय गंध के बीच शाम डूब जाती थी. मैं नेहरू नगर से ट्यूशन पढ़ने अपने दोस्तों के पास आता था और सब्जीमंडी से प्रताप जी की प्रोल तक की सब जगहें हमारी प्रिय जगहें थीं. अमित राय कॉलोनी के आगे सूजेश्वर जाने वाली सड़क के मार्ग पर ही अपने दोस्तों के साथ घूमता रहता था. इसलिए हमारे मिलन के बारे में शीन काफ निज़ाम साहब के शेर की ये टूटी फूटी पंक्तियाँ माकूल हैं. "मैं बहता हुआ दरिया तूँ वादी का सीना, जाने कैसे मिलन होगा हमारा तुम्हारा” हम नहीं मिलते थे. नहीं मिल पाते थे. या ये कुछ ऐसा था कि अमित ने मेरे भीतर थोड़ा सा इन्वेस्ट कर दिया था और उसे रिजल्ट का इंतज़ार था.

और रिजल्ट खूब उदास करने वाला आया.

अमित को फ़िल्में देखने का खूब शौक था और मेरे लिए सिनेमा हाल के आस पास देखा जाना असमय मृत्यु का कारक हो सकता था. मेरे ताउजी पुलिस में थानेदार साहब थे और वे अच्छे पिता की तरह एक कांस्टेबल को फिल्म देखने भेजते. वह आठवीं पास कांस्टेबल फिल्म समीक्षक बन कर लौटता और पूरी फिल्म की कहानी बताता. इसमें हिरोइन और हीरो के बीच के दृश्यों पर सेंसर बोर्ड ने कहीं लचीला रुख तो नहीं अपनाया है? इस बात पर विचार विमर्श होता. आखिर सब फ़िल्में ख़ारिज होती जाती. एक फिल्म एप्रूव हुई थी “बिन माँ के बच्चे”. पुलिस की जीप में बैठकर हम मोहन जी के सिनेमा पहुंचे. वहाँ खूब मान सम्मान से हमें अंदर बिठाया गया. उस फिल्म में एक पिता अरसे बाद घर लौट कर दरवाज़े पर लगी ऊपर वाली कुण्डी को हथोड़े से तोड़ता है. वह जब अंदर देखता है तो सूना घर. बच्चे नहीं है. सिर्फ खालीपन. मैं उसे देखते हुए मन ही मन रोने लगा. मैंने चाहा कि बाहर भाग जाऊं. मैंने सोचा कि मेरे भाई बहनों ने मुझे इस तरह रोते हुए देखा तो मेरी खूब बे इज्ज़ती हो जायेगी. मैं सिनेमा का भगोड़ा था.

इस तरह सेंसर पर सेंसर होकर देखी जाने वाली फिल्मो से ये सबक आया कि कभी सिनेमा हाल के पास देख लिए गए. किसी ने पापा को बता दिया तो तय था कि मेरे जीवन का हाल परमारों की शापित राजधानी किराडू जैसा होता. मैं अपने आप को किराडू के भग्नावेशों की तरह देखने लगता. कोई मुस्लिम आक्रांता मुझे रोंदता हुआ गुज़र रहा है. मेरे सौंदर्य के हर एक अक्स को तोडा जा रहा है. मैं टूटी हुए टांगें लिए बिस्तर पर पड़ा हूँ या फिर अपने छोटे भाइयों की नज़रों के सामने घर के ही आँगन में मुर्गा बना हुआ हूँ. इसलिए मैंने अमित से साफ़ कहा कि मैं फिल्में नहीं देखता हूँ. अमित के लिए फ़िल्में न देखने वाला इंसान दुनिया का दोयम दर्ज़े का अधूरा इंसान होता था.

हमारे एक साथ होने की एक वजह इस तरह कट गयी जैसे गाँधी खानदान के एक पुराने युवराज ने आपातकाल में देश की आबादी पर अंकुश पाया था.
* * * 
आगे की बात अगली कड़ी में

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