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दो नाम है सिर्फ इस दुनिया में

मेरे घर में एक बड़ा दरवाज़ा था. उसके पिछले भाग पर एक श्वेत श्याम तस्वीर चिपकी हुई थी. उसमें मुस्कुराती हुई लड़की ज़ेबा बख्तियार थी. हिना फ़िल्म की नायिका. हमारे घर में फ़िल्में एक वर्जित विषय था. इस तरह किसी नायिका की तस्वीर का लगा होना अचरज की बात थी. घर के कई कोनों और आलों में रखी हुई तस्वीरें या तो पुरखों की होती या फिर क्रांतियों के जननायकों की. इन सबके बीच ज़ेबा एक अकेली लड़की थी, जो सदा मुस्कुराती रहती थी. ऐसा इसलिए था कि अमित ने बोम्बे जाते ही पहला काम यही शुरू किया कि वह फ़िल्म दफ्तरों के चक्कर काटने लगा. उसे तुरंत समझ आ गया था कि बिना किसी टैग के हर बार प्रवेश आसन नहीं होता. इसलिए उसने कई जगह काम खोजे. मराठी में प्रकाशित होने वाले अखबार महानगर के हिंदी संस्करण में उसे काम मिल गया था. उसने अपनी प्रिय बीट फ़िल्म को चुना. वह जब काम माँगने गया तब अपने साथ फ़िल्मी ज्ञान को लिखित में लेकर गया था. उसने कुछ फिल्मों की समीक्षाएं भी लिखी थीं. उसकी समझ को देखकर अखबार का प्रबंधन ने उस पर यकीन कर लिया था. 

अब वह फ़िल्मों के प्रमोशन के कार्यक्रमों का हिस्सा हुआ करता. वहाँ सबको एक लिफाफा मिलता ही है जिसमें फ़िल्म के प्रचार की सामग्री होती. इसी तरह उसे हिना फ़िल्म की नायिका की अलग अलग तस्वीरें मिलीं थी. उनमें से एक को उसने मुझे भेज दिया था. पहली बात ये थी कि वह लड़की की तस्वीर थी, दूसरी कि वह सुन्दर भी थी तीसरी कि उसे अमित ने भेजा था. इस तरह जननायकों की तस्वीरों के बीच एक सुन्दर बाला ने प्रवेश पा लिया था. ये घटना हमारे परिवार के आदर्शों में सेंध की तरह थी मगर अमित के नाम के कारण इस पर कोई प्रतिक्रिया न हुई.

ज़ेबा बख्तियार जैसी किसी लड़की का मुझे इंतज़ार न था. कुल जमा कॉलेज के दिनों में एक लड़की ने दो बेनाम खत लिखे थे. उनके पीछे लिखा था “गेस हू?” मैंने कुछ बढ़ी हुई धड़कनों के बीच एक दो दिन बेचैनी में बिताए मगर ये असर ज्यादा कामयाब न हो सका. मेरे दोस्त उस अंतर्देशीय पत्र को लेकर घूमते रहे. वे हेंड रायटिंग के सहारे उस लड़की को खोज लेना चाहते थे. वह चिट्ठी असल में मैंने ढंग से पढ़ी भी नहीं. मेरी इमेज किसी प्रेमी के जैसी न होकर एक एक्टिविस्ट जैसी थी. मैं उस ख़त को हासिल करता उसी बीच एक वर्कशॉप के सिलसिले में दिल्ली चला गया. 

मैं पांच दिन एक वर्कशॉप में रहा. वहां मैंने ये सीखा कि जन आन्दोलनों में गीतों और नाटक की क्या भूमिका हो सकती है. मुझ बेसुरे को वहाँ कोई सुर पकड़ न आया. मैंने नाटक करने के कार्य को भी अपनी समझ से परे जाना. उस कार्यशाला ने मेरा ऐसे गीतों से परिचित करवाया जो मेरे साथ आज भी उदासी में चलते हैं. तूँ ज़िंदा है ज़िंदगी की जीत पर यकीन कर अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर. दिल्ली में मेरे दिमाग ने फिर से रिफिल होने का मौका पा लिया और मैं फिर से खेतों और जोहड़ों के लिए संघर्षरत किसानों के बीच जाने लगा. इन आयोजनों का हिस्सा होने के लिए मुझे माँ से रुपये मिल जाते थे. मुझे सिर्फ किराया चाहिए होता. पापा कहते इसे सौ रूपये और दे देना. मेरा प्रेम मेरे जन आंदोलन ही थी. अमित का प्रेम था फ़िल्मी संसार.

बोम्बे में अमित के दो साल पूरे होने से पहले ही उसे कई बार याद दिलाया जा चुका था कि तुमको घर आना चाहिए और अपनी नव विवाहिता की खबर लेनी चाहिए. पहले उसने हॉस्टल के फ़ोन अटेंड करने वाले को कहलवाया कि मेरा कोई फ़ोन आए तो बात करवाने की जगह फ़ोन करने वाले का नंबर पूछ लेना और कहना कि मैं ही वापस फ़ोन करूँगा. वह वापस उन्हीं लोगों को फ़ोन करता था जिनसे उसका बात करने का मन होता. या इसे ऐसे ही समझा जाये कि जो उसे बाड़मेर लौट आने और घर बसाने की बात न कहे. उसके पिताजी की आशंकाएं बढती जा रही थी. वे इस मामले में पीछे नहीं हट सकते थे. समाज और इज़्ज़त ही उनके लिए प्राथमिकताएं थीं. वे अमित को इस बंधन में बांध कर वास्तव में खुद बंध चुके थे. उन पर लड़की के परिवार का दबाव बढ़ता जा रहा था. दो साल निकलते ही दबाव प्रत्याशित रूप से बढ़ा. समझौता की अवधि खत्म हुई. आशंकाएं बलवती हुईं कि लड़का बोम्बे भाग गया है. बोम्बे गए हुए के लौटने की उम्मीद नहीं होती. अमित के बोम्बे के प्रेम में फंस जाने से कुछ नये ख़तरे थे. एक था कि छोटे भाइयों का विवाह रुक जाता. कोई स्वजातीय अपनी बेटी देने को तैयार न होता. इस तरह से घर का नाश होने का सोचते हुए खुशालाराम जी और अधिक परेशानी में घिरा हुआ पाते. वे किसी भी तरह अमित को अपने घर में चाहते थे. उन्होंने आखिरी बात कही कि बेटा मैं कमाऊंगा और तुम घर बैठकर खाना मगर लौट आओ.

खुशालाराम जी का सहारा भी आखिर फ़िल्मी चीज़ ही बनी. उन्होंने संदेसा करवाया कि तुम्हारी माँ को एक बार देख लो. अमित जिस माँ की कहानी लिखता था, उसी को खो देने के डर से बाड़मेर आया. आते ही गिरफ्तार कर लिया गया. उसके घर पर साफे बांधे हुए रिश्तेदार और ससुराल वाले बैठे रहते थे. छोटे भाई इस तमाशे के कारण असहज होते और अमित को दोष देते. माँ असहाय अमित के कमरे से पिताजी के कमरे के बीच चक्कर काटती रहती. अमित एक गिनी पिग था. हर कोई उस पर अपनी 'प्रवचन प्रेक्टिस' कर रहा था. जो आता सलाह की एक सुई चुभो कर चला जाता. अंदर हर कोई प्रेम भरा और कमरे से बाहर आते ही कहता- "इसका दिमाग सरक गया है." लोगों के मजे थे. असल फंदा बाप बेटे को कस रहा था.

इसी दबाव में अमित मर गया. उसने नींद की गोलियाँ खाकर आत्महत्या कर ली.




पन्द्रह दिन बाद मुझसे मिला. कहने लगा- "मौत ने धोखा दिया. माँ का रोना देखा नहीं जाता. भाइयों की बेरुखी पर अफ़सोस होता है. पिताजी बात करते नहीं. मैं अब कारखाने में रणदा लगाऊंगा. ट्रकों की बॉडी बनाऊंगा. ओवर दी टॉप फ़िल्म का सिल्वेस्टर स्टोन मेरी बनायी हुई ट्रक को चलाता हुआ इस दुनिया के बेरहम लोगों को रोंद देगा." इतना कहते हुए उसने सिगरेट जला ली. इस दौर में इतनी मुश्किलों के बीच खुली आँख में बचे हुए सपने फ़िल्मी ही थे. सिल्वेस्टर स्टोन की याद थी. उसके दिल में उगे हुए बेरुखी के पेड़ के तने की छाल सख्त होने लगी थी.

कई दिनों बाद अचानक मुझे उसका ख़त मिला. बोम्बे से आया हुआ खत. मैं खूब अचरज में पड़ गया कि ये फिर बोम्बे भाग गया. ख़त का मजमून कुछ इस तरह का था जैसा कि जासूसी नोवेल का होता है. उसमें लिखा था. समझौते से जो खेल शुरू किया उस को एक नये समझौते से आगे बढ़ा रहा हूँ लेकिन इस बार दो महीने बाद फिर से मेरी खोजबीन होने लगी है. एक दोस्त के कमीने भाई यहीं बोम्बे में रहते हैं. मेरे बारे में पिताजी को अफवाहें सुनाते हैं. मैं इन सबके हाथ नहीं आने वाला हूँ. इस तरह वह सुकून की तलाश में लगातार भागते जा रहा था. 

बोम्बे में बाड़मेर के सुथार खूब रहते हैं. उन्होंने वहाँ फ्लेट खरीद रखे थे. उन्हीं फ्लेट्स को कारखानों में बदल लिया था. एक ही फ्लेट में आठ दस कामगार, युद्ध बंदियों की तरह काल कोठारी सा जीवन बिता रहे थे. उनके जीवन का ध्येय लकड़ियाँ छीलते जाना ही बचा रह गया था. ऐसे बोरियत भरे जीवन में उनके हाथ एक असल रोमांचकारी चीज़ लगी. अमित के घरवालों और ससुराल वालों की ओर से संदेशे भिजवाए गए थे. "एक समाज विरोधी आदमी भीखाराम जांगिड़, एक लड़की का जीवन तबाह करके मुम्बई की आवारा गलियों में कहीं खो गया है. उसका पता लगाना बहुत ज़रुरी है." अब सारे स्वजातीय बंधू इस सामाजिक दायित्व को निभाने के लिए काम से अवकाश होते ही बोम्बे की गलियों में जासूस बन कर भ्रमण करने लगे. अमित को जहाँ कहीं कोई मारवाड़ी चेहरा दीखता वह अपना मुंह किसी अख़बार के पीछे छिपा लेता. अमित के पास किताबें और अख़बार हुआ करते थे वह उनकी आड़ ले लेता मगर खातियों के पास कोई रणदा या करोती नहीं होती थी जिसके पीछे वे छुप सकें. 

इस तरह रेगिस्तान के जासूस अपने ही एक आदमी को खोज रहे थे. जो समाज का गद्दार था. जबकि गद्दार सिगरटें पीता हुआ जींस की जेबों में हाथ डाले, बेकार डायरियों को काला करते हुए सिनेमा के दफ्तरों में घूमता रहता था. एक बार कुछ खाती महानगर अख़बार के दफ्तर तक पहुँच गए. अमित का कहना था कि उनका आना ऐसा था जैसे शिव सैनिक आए हों. अखबार का प्रबंधन और स्थानीय पुलिस सावधान थी क्यों कि कुछ ही दिन पहले अख़बार के मालिक पर तांत्रिक जैसे दिखने वाले मराठी पत्रकार और शिव सेना के बाप ने मानहानि का दावा किया था. अमित को पकड़ने गए सिपाही खाली हाथ लौट आए. उनको अफ़सोस था कि काश कभी पांचवीं से आगे पढ़ाई की होती तो दफ्तर वाले उनको पहचान न पाते और इस समाज के दोषी को दस्तयाब किया जा सकता. 

आप जानते ही हैं कि मनुष्य समाज का इतिहास पांच हज़ार साल पुराना है और हिंदी का महज एक हज़ार साल. इसलिए हिंदी की हार हुई और समाज के आगे उसे घुटने टेकने पड़े. अट्टालिकाओं के शहर से बिछड़ कर अमित एक बार फिर रेगिस्तान की गलियों में था.

दो नाम है सिर्फ इस दुनिया में एक साक़ी का एक यज़दां का 
एक नाम परेशा करता है एक नाम सहारा देता है. 

इस दुनिया में दो ही नाम है एक जो शराब भर-भर कर पिलाये दूसरा वह जो दयालू है, एक नाम बिखेर देता है दूसरा संभाल लेता है. हम एक दूजे के कंधे से कंधा सटाए अपनी-अपनी जेब में रखे हिप फ्लास्क से दारू पीते हुए घूमते रहते थे. हम ही साक़ी थे, हम ही एक दूजे के लिए दयालू थे. अक्सर शाम को अमित आ जाता. स्टेडियम रोड के पास लुहारों के वास में मेरे घर से हम दोनों अपना सामान बाँध कर निकलते. स्टेडियम से सिन्धी कॉलोनी होते हुए बस स्टेंड और फिर महावीर पार्क. वहां से कलेक्ट्रेट के अंदर से होते हुए राय कॉलोनी की सड़क तक आते. हमारे फ्लास्क खाली हो जाते. अमित मुस्कुराता था. वह अपनी चमक भरी आँखों देखता. हर बार किसी प्रसिद्द साहित्यकार की कही कीमती बात कहता. फिर वह मुझसे पूछता- "तुम्हारे पास कोई नयी बात है कहने को?" मैं कहता नहीं वही बात है- "ज़िन्दगी एक भ्रम है और इसके टूट जाने तक इसे धोखा मत देना." 
* * *

बात जारी है.

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मैं कितना नादान था।

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नष्ट होती चीज़ों के प्रति

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यही हाल रिश्तों का है। लोग बचाने की पवित्र जुगत में ख़ुद को नष्ट करते जाते हैं। मुझे अब तक केवल ये समझ आया है कि नष्ट होती चीज़ों के प्रति उदासीन रहो। और कोई हल नहीं है।

भूल जाओ

कोई इतना पास से गुज़र जाए और देख न सकें उसकी सूरत तो दिल उदास हो जाता है। धूप के तलबगार छोटे छोटे दिन आने को हैं ताकि याद की लंबी रातों में की जा सके अतीत की लंबी जुगाली। और बहुत सारी बेवजह की बातें। 
भूल जाओ
पगडंडी के पत्थर से लगी चोट थी
वो बबूल का एक नुकीला कांटा था।

ये भी भूल जाओ कि तुमने ये बात पढ़ी।
* * *

ये रंग
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खुशबू बारे में कुछ नहीं कहता। 
ज़रा पास आओ।  * * *

इसलिए मेरी जिज्ञासा का रंग सलेटी है
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इसलिए तुम कहीं मत जाओ।  * * *
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* * *

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हो सकता है कि तुम मेरा सिर भी फोड़ दो।

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* * *
कोई समझ नहीं सकता किसी का दुख
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